आईआईटी में इंजीनियरिंग में दाखिले में लड़कियों ने बनाया रिकॉर्ड
इस साल पहली बार 10 हजार से ज्यादा लड़कियों ने भारत के प्रीमियर इंजीनियरिंग संस्थान आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में कामयाब होकर एक नया रिकार्ड बनाया है;
इस साल पहली बार 10 हजार से ज्यादा लड़कियों ने भारत के प्रीमियर इंजीनियरिंग संस्थान आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में कामयाब होकर एक नया रिकार्ड बनाया है.
भारतीय तकनीकी संस्थानों (आईआईटी) में प्रवेश परीक्षा आयोजित करने वाले ज्वाइंट एंट्रेंस बोर्ड ने लिंगानुपात को संतुलित करने के लिए वर्ष 2018 में सुपरन्यूमरी यानी लड़कियों के लिए अतिरिक्त सीटों का प्रावधान किया था. तब आईआईटी में छात्राओं की संख्या बढ़ाकर 20 फीसदी करने का लक्ष्य रखा गया था. लेकिन इस साल यह आंकड़ा लक्ष्य के पार चला गया है. लड़कियों की कुल संख्या के साथ ही प्रवेश परीक्षा में उनके कामयाब होने की दर भी बढ़ी है.
लड़कियों में टॉपर आरोही देशपांडे
पुणे की रहने वाली आरोही देशपांडे ने इस साल प्रवेश परीक्षा में छात्राओं में पहला स्थान हासिल किया है. उनकी प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए पूरा परिवार कोटा शिफ्ट हो गया था. आरोही ने नतीजों के बाद इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कहा, "परीक्षा के लिए लगातार कड़ी मेहनत के साथ ही एकाग्रता बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती थी. लेकिन परिवार के साथ रहने की वजह से मानसिक तौर पर काफी मजबूती मिली."
आरोही का कहना था कि आईआईटी में दाखिले तक का सफर सिर्फ पढ़ाई तक सीमित नहीं है. यह एक मानसिक और भावनात्मक यात्रा भी है.
बीते साल की प्रवेश परीक्षा में आईआईटी खड़गपुर जोन में पहले स्थान पर रहने वाली बंगाल के बर्दवान की देवदत्त माझी डीडब्ल्यू से कहती हैं, "आईआईटी में दाखिले के प्रति छात्रों में आकर्षण तो बढ़ा ही है, अभिभावक के नजरिए में भी काफी बदलाव आया है. इसकी सबसे बड़ी वजह ऐसे बेहतरीन संस्थान में पढ़ाई के बाद भविष्य में आसानी से करियर और शोध के बेहतर मौके मिलना है."
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अब दिखा सुपरन्यूमरी सीटों के प्रावधान का असर
साल दर साल बढ़ते आंकड़े कामयाबी की कहानी खुद बताते हैं. सुपरन्यूमरी सीटों का प्रावधान वर्ष 2018 में लागू किया गया था. उसके बाद 2019 में 6,356 छात्राओं ने प्रवेश परीक्षा पास की थी. लेकिन नौ साल बाद अब यह संख्या करीब 89 फीसदी बढ़कर 10,107 हो गई है. इसके अलावा वर्ष 2018 में जहां छात्राओं के प्रवेश परीक्षा में पास होने की दर महज 13.47 फीसदी थी वहीं इस साल यह बढ़ कर 24.9 फीसदी तक पहुंच गई है.
आंकड़ों के लिहाज से देखे तो वर्ष 2017 में जहां महज 995 छात्राओं को आईआआईटी में दाखिला मिला था वहीं सुपरन्यूमरी सीटों का प्रावधान लागू होने के बाद वर्ष 2018 में यह संख्या 1852 तक पहुंच गई. बीते साल यानी 2025 में 3,664 छात्राओं ने आईआईटी में दाखिला लिया था.
शिक्षाविदों का कहना है कि सुपरन्यूमरी सीटों के प्रावधान का असली असर अब दिख रहा है. इसके कारण अब गरीब और पिछड़े तबके की छात्राएं भी आईआईटी में पढ़ाई के अपने सपने को हकीकत में बदल रही है. इसके साथ ही इंजीनियरिंग की नई-नई शाखाओं और भविष्य में करियर के बेहतर अवसरों ने भी लड़कियों को आईआईटी के प्रति आकर्षित किया है.
कोलकाता के एक सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज में फिजिक्स की प्रोफेसर डॉ. देवस्मिता भट्टाचार्य डीडब्ल्यू से कहती हैं, "इन आंकड़ों ने साबित कर दिया है कि छात्राएं आईआईटी जैसे संस्थान की कठिन प्रवेश परीक्षा और पढ़ाई में प्रदर्शन में किसी से पीछे नहीं हैं. मौका मिलने पर वो हर क्षेत्र में कामयाबी के झंडे गाड़ सकती हैं. स्टेम यानी साइंस, इंजीनियरिंग, तकनीक और गणित में उनकी भागीदारी लगातार बढ़ रही है. यह देश के उज्ज्वल भविष्य का संकेत है."
इंजीनियरिंग है लड़कियों के लायक फील्ड
आईआईटी खड़गपुर के पूर्व प्रोफेसर डा. असित बी. चटर्जी डीडब्ल्यू से कहते हैं, "पहले लोगों में आण धारणा थी कि आईआईटी में इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल या सिविल इंजीनियरिंग जैसी शाखाओं में छात्राओं को कड़ी शारीरिक मेहनत करनी होती है और छात्राओं के लिए यह मुश्किल साबित होगा. कड़ी प्रतिस्पर्धा के कारण लड़कियों के लिए सीटें भी कम थीं और इंजीनियरिंग की शाखाएं भी. लेकिन अब कंप्यूटर साइंस के अलावा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डाटा साइंस, एनर्जी एंड एनवायरनमेंट, मशीन लर्निंग, क्लाउड कंप्यूटिंग और बेसिक साइंस जैसी शाखाएं शुरू होने के कारण छात्राओं और उनके अभिभावकों में आईआईटी के प्रति आकर्षण तेजी से बढ़ा है."
शिक्षाविदों का कहना है कि आने वाले वर्षों में आईआईटी में छात्राओं की संख्या और बढ़ेगी. इसके अलावा यह सामाजिक धारणा भी तेजी से बदल रही है कि इंजीनियरिंग सिर्फ लड़कों के लिए है. कोलकाता के एक निजी इंजीनियरिंग कालेज में कंप्यूटर साइंस पढ़ाने वाली प्रोफेसर रेखा बागची डीडब्ल्यू से कहती है, "हाल के वर्षो में इंजीनियरिंग के प्रति लड़कियों की दिलचस्पी तेजी से बढ़ी है. सीटें बढ़ने के कारण अब पिछड़े इलाकों की लड़कियां भी आईआईटी के सपने देखने और साकार करने लगी हैं. यही वजह है कि कई लड़कियां दुर्गम ग्रामीण इलाकों से निकल कर सीधे देश की किसी न किसी आईआईटी में पहुंच रही है."
हाल तक राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष रहीं लीना गांगुली डीडब्ल्यू से कहती हैं, "लड़कियां अब किसी भी क्षेत्र में लड़कों से पीछे नहीं हैं. उनको बस एक लेवल प्लेइंग फील्ड की जरूरत है. इस मामले में सुपरन्यूमरी सीटों ने उनको यह मौका दिया है. आप उनको पंजा टिकाने का मौका दे दें तो वो अपनी जगह खुद बनाने में सक्षम हैं."