नीरजा भनोट: 23 साल की उम्र में आतंकियों के सामने बनीं ढाल, बचाईं सैकड़ों जिंदगियां

विमान की सीनियर फ्लाइट पर्सर नीरजा भनोट ने संकट की गंभीरता को तुरंत समझ लिया। उन्होंने सूझबूझ और हिम्मत से काम लेते हुए यात्रियों को संभालने की कोशिश की। उनकी सक्रियता के कारण विमान के अमेरिकी पायलट बाहर निकलने में सफल रहे। इसके बाद यात्रियों की सुरक्षा की बड़ी जिम्मेदारी नीरजा और केबिन क्रू के सामने थी।;

Update: 2026-09-06 06:57 GMT

चंडीगढ़ : नीरजा भनोट (Neerja Bhanot) का नाम भारतीय इतिहास में उस साहस की मिसाल के तौर पर दर्ज है, जिसमें एक युवा महिला ने अपनी जान की परवाह किए बिना दूसरों की जिंदगी बचाने का फैसला किया। 5 सितंबर 1986 को पाकिस्तान के कराची एयरपोर्ट पर पैन एम फ्लाइट 73 को आतंकियों ने हाईजैक कर लिया था। उस वक्त विमान में सैकड़ों यात्री सवार थे और हालात बेहद तनावपूर्ण थे। विमान की सीनियर फ्लाइट पर्सर नीरजा भनोट ने संकट की गंभीरता को तुरंत समझ लिया। उन्होंने सूझबूझ और हिम्मत से काम लेते हुए यात्रियों को संभालने की कोशिश की। उनकी सक्रियता के कारण विमान के अमेरिकी पायलट बाहर निकलने में सफल रहे। इसके बाद यात्रियों की सुरक्षा की बड़ी जिम्मेदारी नीरजा और केबिन क्रू के सामने थी।

करीब 17 घंटे तक यात्रियों का हौसला बढ़ाती रहीं

हाईजैक के दौरान नीरजा ने असाधारण धैर्य दिखाया। करीब 17 घंटे तक वह आतंकियों के बीच यात्रियों को संभालती रहीं। वह लगातार ऐसे मौके की तलाश में थीं, जब अधिक से अधिक यात्रियों को सुरक्षित बाहर निकाला जा सके। बताया जाता है कि जब विमान में अफरा-तफरी का माहौल बना, तब नीरजा ने बच्चों और दूसरे यात्रियों को सुरक्षित निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दूसरों को बाहर निकालते हुए वह खुद आतंकियों की गोलीबारी की चपेट में आ गईं। महज 23 साल की उम्र में उनकी जिंदगी खत्म हो गई, लेकिन उनका साहस हमेशा के लिए अमर हो गया।

भारत ही नहीं, पाकिस्तान में भी मिला सम्मान

नीरजा की बहादुरी ने सीमाओं की दीवारों को भी पीछे छोड़ दिया। भारत ने उन्हें मरणोपरांत देश के सर्वोच्च वीरता पुरस्कारों में शामिल अशोक चक्र से सम्मानित किया। पाकिस्तान ने भी उनकी मानवता और साहस को स्वीकार करते हुए उन्हें तमगा-ए-इन्सानियत से सम्मानित किया। यह सम्मान इस बात का प्रतीक बना कि नीरजा की बहादुरी केवल किसी एक देश की कहानी नहीं थी। उन्होंने मुश्किल घड़ी में इंसानियत और कर्तव्य को सबसे ऊपर रखा।

चंडीगढ़ से मुंबई तक का सफर

नीरजा का जन्म चंडीगढ़ में हुआ था और उनकी शुरुआती पढ़ाई भी यहीं हुई। बाद में उनके पिता के तबादले के कारण उनका परिवार मुंबई चला गया। यहीं से नीरजा के जीवन ने एक नया मोड़ लिया। उनके भाई अखिल भनोट के अनुसार, नीरजा बचपन से ही गलत बात के खिलाफ आवाज उठाने वाली थीं। किसी गलत चीज को देखकर चुप रहना उनके स्वभाव में नहीं था। यही व्यक्तित्व आगे चलकर संकट की उस घड़ी में उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।

संयोग से मॉडलिंग और फिर एयरलाइंस में पहुंचीं

नीरजा का मॉडलिंग की दुनिया में आना भी एक संयोग था। कॉलेज के बाहर खड़े होने के दौरान एक मैगजीन के फोटोग्राफर की नजर उन पर पड़ी और उन्होंने उनकी तस्वीरें एक लेख के लिए खींचीं। इसके बाद नीरजा को मॉडलिंग के प्रस्ताव मिलने लगे। एयरलाइंस में उनका प्रवेश भी कुछ इसी तरह हुआ। उनकी दोस्त निम्मी एयर होस्टेस के ऑडिशन के लिए गई थीं। नीरजा भी उनके साथ मेकअप के लिए पहुंचीं और संयोग से उनका भी चयन हो गया। बाद में वह पैन एम में सीनियर फ्लाइट पर्सर बनीं।

सदियों तक याद रहने वाली कहानी

नीरजा अपने 24वें जन्मदिन से महज दो दिन पहले शहीद हुई थीं। जिंदगी ने उन्हें ज्यादा वक्त नहीं दिया, लेकिन उन्होंने जितना जीवन जिया, उसमें ऐसा साहस दिखाया जो पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन गया। चंडीगढ़ की इस बेटी की कहानी आज भी बताती है कि असली बहादुरी केवल खतरे का सामना करने में नहीं, बल्कि संकट के समय दूसरों के लिए खड़े होने में है।

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