नई दिल्ली: भाजपा नेता और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्वतंत्रता दिवस के भाषण में इस्तेमाल किए गए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर स्पष्टीकरण की मांग की है। अमरिंदर सिंह ने कहा कि सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि इस शब्द से किस तरह के लोगों या विचारों का संकेत दिया जा रहा है और यह श्रेणी लोकतांत्रिक तरीके से असहमति जताने वाले नागरिकों से किस तरह अलग है।
‘नक्सल’ शब्द के इस्तेमाल में सावधानी जरूरी
अमरिंदर सिंह ने एक लेख में कहा कि ‘नक्सल’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल बहुत हल्के ढंग से नहीं किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक, जब किसी राजनीतिक बयान में ऐसे शब्द आते हैं और फिर राजनीतिक दल, टेलीविजन चैनल तथा सोशल मीडिया उन्हें लगातार दोहराते हैं, तो उनके मायने मूल संदर्भ से कहीं आगे तक फैल सकते हैं। उन्होंने कहा कि भारत को राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं है। दोनों के बीच संतुलन कायम किया जा सकता है और एक-दूसरे को मजबूत करने वाले सिद्धांतों के तौर पर देखा जाना चाहिए।
लाल किले से दिए बयान का किया जिक्र
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से दिए अपने संबोधन में कहा था कि हथियारों वाला नक्सलवाद कमजोर हो चुका है, लेकिन ‘दिमागी नक्सल’ अब भी अवसर की तलाश में है। प्रधानमंत्री ने इस वर्ग की पहचान कर उसे अलग-थलग करने की बात भी कही थी। अमरिंदर सिंह ने कहा कि लाल किले से बोले गए शब्दों का विशेष महत्व होता है। इसलिए आम नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि सरकार जिस श्रेणी की बात कर रही है, उसकी स्पष्ट परिभाषा क्या है।
युवाओं के प्रदर्शनों को लेकर भी दी सफाई
अमरिंदर सिंह ने अपने लेख में यह भी कहा कि प्रधानमंत्री ने युवाओं के हालिया प्रदर्शनों को सीधे तौर पर ‘दिमागी नक्सलवाद’ नहीं कहा था। हालांकि, उन्होंने आगाह किया कि राजनीतिक बयानों का प्रभाव अक्सर उनके मूल संदर्भ तक सीमित नहीं रहता। उन्होंने कहा कि अगर ‘दिमागी नक्सल’ का अर्थ ऐसे लोगों से है जो जानबूझकर माओवादी हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं, तो इस बात को स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए और कानून के मुताबिक कार्रवाई होनी चाहिए।
सरकार की आलोचना करना अपराध नहीं
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की आलोचना करना या उससे सवाल पूछना नागरिकों का अधिकार है। संविधान और कानून का पालन करना जरूरी है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि नागरिकों को मौजूदा सरकार के प्रति बिना सवाल किए वफादारी दिखानी होगी। उनके मुताबिक, अगर किसी व्यक्ति की गतिविधियां संगठित हिंसा को बढ़ावा देती हैं तो उस पर कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन केवल कट्टरपंथी, अलोकप्रिय या सरकार की कड़ी आलोचना करने वाली राय को उसी श्रेणी में रखना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं होगा।
असली विभाजन कहां होना चाहिए?
अमरिंदर सिंह ने कहा कि लोकतंत्र में विभाजन की रेखा वामपंथ और दक्षिणपंथ, सरकार और विपक्ष या राष्ट्रवादी और आलोचक के बीच नहीं होनी चाहिए। असली अंतर कानून के दायरे में रहकर असहमति जताने और जानबूझकर हिंसा को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों के बीच होना चाहिए। उन्होंने कहा कि नागरिक स्वतंत्रता को हिंसा के लिए ढाल नहीं बनाया जा सकता, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर वैध असहमति की जगह भी सीमित नहीं की जानी चाहिए।
पंजाब चुनाव से पहले बयान के सियासी मायने
अमरिंदर सिंह का यह बयान ऐसे समय आया है जब पंजाब में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं और भाजपा राज्य में अपने राजनीतिक आधार को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में उनके बयान को राजनीतिक और लोकतांत्रिक विमर्श के नजरिए से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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