महिला आरक्षण विधेयक पर सरकार की नई रणनीति, बदले राजनीतिक समीकरणों से बढ़ी उम्मीदें

इस वर्ष अप्रैल में बुलाए गए तीन दिवसीय विशेष सत्र के दौरान सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक और उससे जुड़े परिसीमन विधेयक को पारित कराने की कोशिश की थी। हालांकि संविधान संशोधन से जुड़े इस विधेयक को पारित करने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल सका।;

Update: 2026-06-05 07:02 GMT

नई दिल्ली: केंद्र सरकार संसद के आगामी मानसून सत्र में महिला आरक्षण विधेयक को एक बार फिर पेश करने की तैयारी कर रही है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद बने नए राजनीतिक माहौल ने सरकार को इस मुद्दे पर दोबारा पहल करने का अवसर दिया है। खासतौर पर तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणामों के बाद राजनीतिक दलों के बीच बदले समीकरणों को देखते हुए सरकार को उम्मीद है कि इस बार विधेयक को लेकर समर्थन का दायरा बढ़ सकता है। महिला आरक्षण विधेयक का उद्देश्य संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करना है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन के बाद इसे लागू करने की योजना बनाई गई थी, जिससे 2029 के लोकसभा चुनाव से महिलाओं को इसका लाभ मिल सकता था।

विशेष सत्र में नहीं मिल पाया था जरूरी समर्थन

इस वर्ष अप्रैल में बुलाए गए तीन दिवसीय विशेष सत्र के दौरान सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक और उससे जुड़े परिसीमन विधेयक को पारित कराने की कोशिश की थी। हालांकि संविधान संशोधन से जुड़े इस विधेयक को पारित करने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल सका। लोकसभा में हुई वोटिंग के दौरान विधेयक के पक्ष में 298 मत पड़े, जबकि 230 सांसदों ने इसके विरोध में मतदान किया। कुल 528 सांसदों ने मतदान में हिस्सा लिया था। आवश्यक संख्या से कम समर्थन मिलने के कारण विधेयक पारित नहीं हो पाया। उस समय विपक्षी दलों ने महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने और राज्यों पर इसके संभावित प्रभाव को प्रमुख मुद्दा बनाया था।

चुनाव परिणामों के बाद बदला राजनीतिक माहौल

अब परिस्थितियां पहले जैसी नहीं हैं। जिन राज्यों में चुनाव को लेकर विपक्षी दलों ने राजनीतिक तर्क दिए थे, वहां चुनावी प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। सरकार का मानना है कि अब महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने जैसे मुद्दे पर व्यापक सहमति बनाने की संभावनाएं पहले से अधिक हैं। सरकार की रणनीति यह है कि विपक्षी दलों को यह समझाया जाए कि महिला आरक्षण केवल राजनीतिक सुधार नहीं बल्कि लोकतांत्रिक भागीदारी को मजबूत करने वाला कदम है। इसके साथ ही दक्षिण भारत के राज्यों समेत विभिन्न क्षेत्रों के हितों को भी ध्यान में रखते हुए संवाद बढ़ाने की कोशिश की जाएगी।

तमिलनाडु की राजनीति में बदले संकेत

तमिलनाडु की राजनीति में हाल के घटनाक्रमों ने भी नई संभावनाएं पैदा की हैं। द्रमुक (DMK) लंबे समय से परिसीमन के मुद्दे पर अपनी चिंताएं व्यक्त करती रही है। पार्टी का तर्क रहा है कि परिसीमन की प्रक्रिया से तमिलनाडु जैसे राज्यों की लोकसभा सीटों की संख्या प्रभावित हो सकती है। हालांकि हालिया राजनीतिक परिस्थितियों में द्रमुक के रुख में बदलाव की संभावनाओं पर चर्चा शुरू हो गई है। पार्टी ने कुछ राष्ट्रीय विपक्षी गतिविधियों से दूरी बनाते हुए अलग राजनीतिक संकेत दिए हैं। ऐसे में यह माना जा रहा है कि संसद में महिला आरक्षण विधेयक पर उसके रुख को लेकर नई स्थिति बन सकती है। लोकसभा में द्रमुक के 22 और राज्यसभा में 8 सदस्य हैं, इसलिए उसका समर्थन या विरोध महत्वपूर्ण माना जाएगा।

बंगाल में टीएमसी की चुनौतियां और संसदीय असर

पश्चिम बंगाल में भी राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदली हैं। विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर उभरे असंतोष ने पार्टी नेतृत्व के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। विधानसभा में बड़ी संख्या में विधायकों के बागी रुख अपनाने के बाद राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि इसका असर संसद में भी दिखाई दे सकता है। चर्चा है कि पार्टी के कुछ सांसद भी नेतृत्व से असंतुष्ट हैं। हालांकि अभी तक किसी बड़े संसदीय विभाजन की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक हलकों में यह संभावना जताई जा रही है कि महत्वपूर्ण विधेयकों पर मतदान के दौरान अलग रुख देखने को मिल सकता है। लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के 29 और राज्यसभा में 13 सदस्य हैं, इसलिए उनकी भूमिका भी अहम रहेगी।

सरकार के लिए क्यों अहम है यह विधेयक

महिला आरक्षण विधेयक को सरकार अपनी प्रमुख राजनीतिक और सामाजिक सुधार योजनाओं में शामिल मानती है। सरकार का तर्क है कि इससे राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी और निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनका प्रतिनिधित्व मजबूत होगा। मानसून सत्र में यदि यह विधेयक फिर से लाया जाता है तो सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती आवश्यक संवैधानिक बहुमत जुटाने की होगी। इसके लिए उसे सहयोगी दलों के साथ-साथ कुछ विपक्षी दलों का समर्थन भी चाहिए होगा।

संसद में फिर होगी बड़ी राजनीतिक परीक्षा

आगामी मानसून सत्र केवल एक विधेयक पर बहस का मंच नहीं होगा, बल्कि यह विभिन्न राजनीतिक दलों की रणनीति और प्राथमिकताओं की भी परीक्षा बनेगा। बदले हुए राजनीतिक समीकरणों के बीच यह देखना दिलचस्प होगा कि कौन-कौन से दल महिला आरक्षण के पक्ष में खुलकर आते हैं और कौन अपने पुराने रुख पर कायम रहते हैं। संसद में होने वाली यह बहस आने वाले वर्षों की राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

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