UGC Bill पर बढ़ा घमासान: सवर्ण असंतोष को लेकर सतर्क हुई भाजपा, विपक्ष भी साध रहा सियासी संतुलन

भाजपा को आशंका है कि यदि यह मुद्दा किसी ठोस चुनावी नैरेटिव में बदल गया, तो इसका सीधा असर आने वाले चुनावों पर पड़ सकता है। यही वजह है कि पार्टी नेतृत्व और सरकार, दोनों स्तरों पर डैमेज कंट्रोल की कोशिशें तेज कर दी गई हैं।

Update: 2026-01-28 22:15 GMT
लखनऊ। तीन कृषि कानून और ‘संविधान बदलने’ जैसे नैरेटिव से पहले ही राजनीतिक झटका खा चुकी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अब किसी नए विवाद को लेकर बेहद सतर्क नजर आ रही है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की नई नियमावली के खिलाफ प्रदेश में उठे विरोध, खासकर सवर्ण समाज के तीखे तेवर और जिला स्तर पर पार्टी पदाधिकारियों के इस्तीफों ने भाजपा नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है। हालात को संभालने के लिए पार्टी ने अब सन्नाटा तोड़ते हुए यह संदेश देने की कोशिश की है कि “किसी को नुकसान नहीं होने दिया जाएगा और सभी वर्गों का सम्मान रखा जाएगा।” भाजपा को आशंका है कि यदि यह मुद्दा किसी ठोस चुनावी नैरेटिव में बदल गया, तो इसका सीधा असर आने वाले चुनावों पर पड़ सकता है। यही वजह है कि पार्टी नेतृत्व और सरकार, दोनों स्तरों पर डैमेज कंट्रोल की कोशिशें तेज कर दी गई हैं।

भाजपा का दो दिन में सब ठीक होने का दावा

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने बुधवार को यूजीसी नियमावली को लेकर उठे विरोध पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि स्थिति जल्द सामान्य हो जाएगी। उन्होंने कहा, “दो दिन में सब ठीक हो जाएगा। नई नियमावली को लेकर कुछ लोग भ्रम फैला रहे हैं और बरगलाने का काम कर रहे हैं। नाराज सवर्ण नेताओं से बातचीत चल रही है।” पार्टी सूत्रों के मुताबिक, भाजपा नेतृत्व इस पूरे मामले को “कम्युनिकेशन गैप” मानकर चल रहा है और कोशिश की जा रही है कि नियमावली के वास्तविक प्रावधानों को स्पष्ट कर असंतोष को शांत किया जाए। हालांकि जमीनी स्तर पर जिस तरह से विरोध उभरा है, उसने पार्टी को सतर्क कर दिया है।

सवर्ण असंतोष, इस्तीफों की झड़ी

यूजीसी की नई नियमावली को लेकर प्रदेश में सवर्ण छात्रों के विरोध के साथ-साथ भाजपा के कई नेताओं ने भी खुलकर नाराजगी जाहिर की है। गोंडा से भाजपा विधायक प्रतीक भूषण सिंह और विधान परिषद सदस्य देवेंद्र प्रताप सिंह ने नियमावली को भेदभावपूर्ण करार दिया है। इतना ही नहीं, कई जिलों और मंडलों में भाजपा के पदाधिकारियों ने विरोधस्वरूप अपने पदों से इस्तीफे दे दिए हैं। पार्टी के लिए यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है, क्योंकि सवर्ण समाज लंबे समय से भाजपा का एक मजबूत वोट बैंक माना जाता रहा है। ऐसे में उसी वर्ग से खुले असंतोष के स्वर उठना पार्टी के लिए खतरे की घंटी है।

बृजभूषण शरण सिंह ने दी आंदोलन की चेतावनी

कैसरगंज के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने भी इस मुद्दे पर तीखा रुख अपनाया है। उन्होंने बुधवार को इंटरनेट मीडिया पर एक वीडियो और संदेश साझा करते हुए कहा कि यदि जरूरत पड़ी तो यूजीसी की नई नियमावली को वापस कराने के लिए व्यापक आंदोलन किया जाएगा। बृजभूषण ने कहा, “अगर आवश्यक हुआ तो केवल सवर्ण ही नहीं, बल्कि ओबीसी, एससी-एसटी वर्ग के भी प्रबुद्ध लोगों को शामिल कर आंदोलन होंगे। हमारे गांवों में सभी वर्गों के बच्चे हमेशा एक साथ खेलते हैं। क्या अब बच्चे जाति देखकर दोस्ती करेंगे? हम अपने शिक्षण संस्थानों को जातिगत युद्ध का केंद्र नहीं बनने देंगे।” उनका यह बयान संकेत देता है कि विरोध को केवल सवर्ण बनाम अन्य वर्ग के फ्रेम में सीमित नहीं रहने दिया जाएगा, बल्कि इसे सामाजिक समरसता के सवाल के रूप में पेश करने की कोशिश होगी।

भाजपा के भीतर भी बढ़ता दबाव

पूर्व मंत्री डॉ. रवींद्र शुक्ला ने तो यहां तक कह दिया है कि यदि नियमावली में बदलाव नहीं हुआ, तो वे भाजपा छोड़ने पर भी विचार कर सकते हैं। यह बयान पार्टी के भीतर बढ़ते दबाव को साफ दिखाता है। हालांकि सरकार के कुछ वरिष्ठ मंत्री इस मुद्दे पर बोलने से बचते नजर आए। परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह से जब इस पर सवाल किया गया, तो वे बिना कोई टिप्पणी किए निकल गए। हीं, उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने लखनऊ में आयोजित एक प्रेस वार्ता में इस विषय पर कोई प्रतिक्रिया देने से परहेज किया।

सरकार के समर्थन के साथ ‘सुधार’ का संकेत

गौतमबुद्धनगर से सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. महेश शर्मा ने यूजीसी के फैसले का समर्थन तो किया, लेकिन साथ ही यह भी जोड़ा कि अगर नियमावली में कोई त्रुटि होगी, तो सरकार उस पर जरूर विचार करेगी। उनका यह बयान भाजपा की उस रणनीति को दर्शाता है, जिसमें पार्टी खुलकर टकराव से बचते हुए सुधार की गुंजाइश बनाए रखना चाहती है।

अखिलेश का संतुलित बयान

यूजीसी नियमावली के मुद्दे पर विपक्ष भी पूरी तरह सक्रिय हो गया है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने समय की नजाकत को समझते हुए बेहद सधा हुआ बयान दिया है। उन्होंने कहा, “दोषी बचे न और कोई निर्दोष फंसे न।” अखिलेश का यह बयान न तो सीधे किसी वर्ग के खिलाफ जाता है और न ही खुलकर समर्थन या विरोध करता है, लेकिन यह संकेत जरूर देता है कि सपा इस मुद्दे को सामाजिक न्याय और निष्पक्षता के फ्रेम में उठाने की तैयारी में है।

तत्काल बदलाव की जरूरत

राजस्थान के पूर्व राज्यपाल कलराज मिश्र ने भी यूजीसी की नई नियमावली पर चिंता जताई है। उन्होंने इसे तत्काल बदले जाने की जरूरत बताते हुए कहा कि शिक्षा व्यवस्था में किसी भी तरह का भेदभाव स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। उनकी टिप्पणी को भाजपा के भीतर से उठी एक और असहमति के रूप में देखा जा रहा है, जो पार्टी नेतृत्व के लिए असहज स्थिति पैदा कर रही है।

अन्य सामाजिक और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं

इस मुद्दे पर किसान नेता राकेश टिकैत, ठाकुर पूरन सिंह और कवि डॉ. कुमार विश्वास ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी है। इन सभी ने यूजीसी के कदम को छात्रों के भविष्य के लिए घातक बताया है। दूसरी ओर, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती ने नियमावली का समर्थन करते हुए इसके खिलाफ हो रहे विरोध को अनुचित करार दिया है। उन्होंने दलितों और पिछड़ों को आगाह किया कि वे किसी की बयानबाजी में न आएं। मायावती के बयान के राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं, खासकर उनका यह कहना कि “सामान्य वर्ग के केवल जातिवादी मानसिकता के लोग ही इसका विरोध कर रहे हैं।” राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश यादव की तरह मायावती भी सवर्ण वोटों को पूरी तरह खोने के बजाय संतुलन साधने की कोशिश कर रही हैं।

भाजपा के लिए चुनौती और परीक्षा

कुल मिलाकर, यूजीसी की नई नियमावली भाजपा के लिए एक नई राजनीतिक चुनौती बनकर उभरी है। पार्टी को डर है कि कहीं यह मुद्दा भी कृषि कानूनों या संविधान बदलने जैसे नैरेटिव की तरह जमीनी स्तर पर पकड़ न बना ले। यही वजह है कि भाजपा “फूंक-फूंककर” कदम बढ़ा रही है और सभी वर्गों को साथ रखने का संदेश दे रही है। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि भाजपा इस असंतोष को बातचीत और संशोधन के जरिए शांत कर पाती है या नहीं। फिलहाल इतना तय है कि यूजीसी की नई नियमावली ने प्रदेश की राजनीति में जातीय, सामाजिक और चुनावी समीकरणों को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है।

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