पेरिन दाजी को एक अलग अंदाज में किया गया याद
"सर, संसद बेलगाम न हो जाए, इसके लिए मैंने उनकी लगाम छोड़ दी;
इंदौर । "सर, संसद बेलगाम न हो जाए, इसके लिए मैंने उनकी लगाम छोड़ दी है।" यह सुनते ही नेहरूजी ठहाका मारकर हँसे और मेरी पीठ थपथपाकर अपने साथ वाले व्यक्ति से बोले, "देखो, ये तो दाजी से भी दो कदम आगे है।" ...जया इसे "यादों की रोशनी में" से पढ़कर यूँ सुना रही थीं कि लग रहा था जैसे सब सामने घट रहा हो। काकी के ऐसे अनगिनत किस्से जाने हम कितने दिनों तक एक दूसरे को सुनाकर उन्हें याद करते रहेंगे।
"काकी" मतलब फ़रोख, फ़िरोज़, और जया मेहता और कल्पना मेहता की काकी, मतलब सबके लिए "कॉमरेड पेरिन दाजी", मतलब सेंट रफ़ाइल्स के विद्यार्थियों की "दाजी टीचर" और इंदौर के सारे लोगों की "मम्मीजी"।
पेरिन दाजी का निधन 6 फरवरी को ही हुआ था। तब से अब तक कोई दिन नहीं बीताजब इंदौरवासी मजदूरों, महिलाओं, प्रबुद्धजनों ने अपनी प्यारी मम्मी, काकी, टीचर और कॉमरेड को उनकी सह्रदयता, संकल्प, संघर्षों के लिए याद न किया हो। रविवार 10 जनवरी को भी प्रेस क्लब सभागार में ऐसे ही एक आयोजन में पेरिन दाजी को संस्मरणों, तस्वीरों, जनगीतों के माध्यम से भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। राष्ट्रीय स्तर के नेताओं ने भी संदेश भेजकर अपनी वरिष्ठ साथी की स्मृतियों को लाल सलाम कहा।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और प्रेस क्लब के संयुक्त तत्वाधान में इंदौर प्रेस क्लब में "स्मरण पेरिन दाजी" कार्यक्रम उनकी यादों को सँजोए अन्य शोक सभाओं से एकदम अलग और अनूठा था बिल्कुल पेरिन की ही तरह। न तो लम्बे भाषण हुए न कोई ओपचारिकता। न ही तस्वीर को मालाएँ पहनाई गई। उन्हें उनके ही अंदाज में याद किया। इस पूरे आयोजन का संयोजन और परिकल्पना की थी जया मेहता ने। कार्यक्रम में पेरिन दाजी की दिलचस्प यादें तो साझा की ही गईं लेकिन साथ ही पेरिन दाजी को पसंद आने वाले गीतों और उनकी एक उपलब्ध गीत की रिकॉर्डिंग दिखाकर पूरे कार्यक्रम को ऐसा रोचक और आत्मीय बना दिया जिसमे औपचारिकता, नीरसता और शोक की जगह पेरिन दाजी के प्रति प्यार, उल्लास और उनके सिद्धांतों के प्रति सम्मान और दॄढ़ संकल्प ने ले ली।
आयोजन के प्रथम वक्ता इंदौर प्रेस क्लब के महासचिव नवनीत शुक्ला ने कहा कि दाजी परिवार ने राजनीति के उच्च मापदंडों को जीवन भर बनाए रखा। अब आने वाली पीढ़ी उनके संस्मरण किताबों में ही पढ़ेगी और सुनेगी। मैंने पेरिन दाजी को बिजली का बिल भरने की लाइन में घंटे भर खड़े देखा था। कॉमरेड दाजी ने सांसद - विधायक रहते हुए भी आम आदमी का जीवन जिया। शहर में उनकी स्मृति को बनाए रखने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए ताकि उनके प्रेरक व्यक्तित्व के बारे में आने वाली पीढ़ियाँ जान सकें।
शहर के वरिष्ठ एवं कवि सरोज कुमार ने पेरिन और होमी दाजी के संघर्षों को बयान करती स्वरचित कविता का पाठ करते हुए कहा कि
"कॉमरेड दाजी को शब्दों वाली कविता पसंद नहीं थी
वह अपनी कविता सड़कों और संघर्षों के माध्यम से व्यक्त करते थे।"
उन्होंने कहा कि वर्तमान न्यूनतम सोच के युग में उच्चतम आदर्शों की प्रतीक थी पेरिन दाजी। उन्होंने पति की मृत्यु के पश्चात भी उनके संघर्षों से संबंध बनाए रखा। पेरिन और होमी दाजी की जुगलबंदी अनोखी थी। दाजी दंपत्ति को हम कभी भुला नहीं पाएंगे।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव मण्डल के सदस्य विनीत तिवारी ने आयोजन की रूपरेखा की जानकारी देते हुए बताया कि हमने इस कार्यक्रम में पेरिन दाजी की जिंदगी को चार हिस्सों में बाँटकर देखने की कोशिश की है। पहला हिस्सा था उनका परिवार, जिसकी पूरी ज़िम्मेदारी उन्होंने उठाकर अपने साथी कॉमरेड होमी दाजी को बड़े संघर्षों के लिए मुक्त कर दिया। दूसरा सेंट रेफियल्स स्कूल, जहाँ उन्होंने 6 बरस से पढ़ाई हासिल की और फिर वहीँ 42 वर्षों तक पढ़ाया भी। इस तरह वे 62 वर्षों तक एक ही स्कूल के साथ जुडी रहीं। तीसरा हिस्सा है कॉमरेड होमी दाजी के साथ बिताया गया गौरवपूर्ण किन्तु संघर्षयुक्त जीवन। और चौथा हिस्सा है कॉमरेड होमी के निधन के बाद सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में उनकी उपस्थिति। विनीत ने कहा कि पेरिन दाजी पर दुःखों के पहाड़ टूटे लेकिन उन्होंने अपने भीतर के बच्चे को कभी ख़त्म यही होने दिया। वे ख़ुशी का कारखाना थीं जिसमे वे किसी भी घटना को कच्चे माल की तरह इस्तेमाल कर ख़ुशी बना लेती थीं और सबको बाँट देती थीं। इससे ख़ुशी और बढ़ जाती थी।
पेरिन दाजी की जिंदगी के पन्नों को उसी तरह उलटते हैं हुए सबसे पहले सेंट रेफियल्स को सौंपी उनकी "मेरी अंतिम इच्छा" को पढ़कर सुनाया गया जो उन्होंने विनीत और जया के साथ मिलकर तैयार की थी। वन्दना दाजी, जो पेरिन की बहू होने के साथ-साथ सत्य सांई स्कूल की व्याख्याता भी हैं; ने उनकी इस अंतिम इच्छा का वाचन किया जिसमें उन्होंने सेंट रेफियल्स को अनुरोध करते हुए लिखा था कि "मैं चाहती तो थी कि अपनी जिंदगी के अंतिम समय तक मैं ब्लैक बोर्ड पर सफेद चॉक से लिखकर बच्चों को पद्धति हुई आखिरी साँस लूँ। लेकिन होमी दाजी की बीमारी और अन्य मजबूरियों के चलते ऐसा हो नहीं सका इसलिए मुझे मिला "नायिका लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड" मैं मृत्यु के बाद सेंट रेफियल्स को सौंपती हूँ ताकि वहाँ की हवा और मिटटी की खुशबू को मैं मरने के बाद भी महसूस करती रह सकूँ।"
उनके साथ शिक्षिका रहीं श्रीमति हक्सर ने अपनी यादें साझा करते हुए बताया कि मुझे उनके साथ केवल तीन वर्ष तक काम करने का मौका मिला। वे वरिष्ठ थीं लेकिन कनिष्ठ या नए सहकर्मियों से बहुत ही आदर और अपनेपन से बात करती थीं। वे कभी किसी विद्यार्थी को डाँटती नहीं थीं। उनकी सेवानिवृत्ति पर हुई पार्टी में उन्होंने गाना गाया था "उठे सबके कदम.." जिसका आशय था कि सब साथ चलें। वह सबको साथ लेकर चलने में विश्वास रखती थी। उनका हाल-चाल भी पूछो तो तुरन्त ही हाल पूछने वाले को बार-बार शुक्रिया कहतीं।
उनकी विद्यार्थी रहीं उषा कृष्णन जो अब स्वयं महाविद्यालय की प्राचार्या पद से सेवानिवृत्त हो चुकी हैं; ने उन्हें याद करते हुए बताया कि हम जो उनसे बचपन में पढ़े थे, वो भी उनके वात्सल्य को कभी नहीं भूल पाते थे। वे हमेशा हम सबसे अपने बच्चों की तरह प्यार करती थीं। एक शिक्षक के तौर पर हुई अंग्रेजी की ग्रामर ने मुझे हमेशा साथ दिया। पेरिन दाजी के भतीजे फिरोज दाजी ने बताया कि आमतौर पर कम्युनिस्टों को धर्म विरोधी मान लिया जाता है लेकिन पेरिन काकी रूसी, रोशनी, फारूख और मुझे पारसी संस्कृति से पेरिन काकी ने ही परिचित करवाया। उन्होंने हिन्दू, इस्लाम और ईसाइयत के बारे में भी हमें सिखाया। वे पारसी पारसी त्यौहार भी मनाती थीं जिससे हम बच्चे इन्हें जान सकें। हमारे पिता के गुजरने के बाद हम सब साथ ही रहते थे लेकिन उन्होंने हमारे साथ कभी भेदभाव नहीं किया। जिस स्कूल में उनके बच्चे पढ़े, वहीं उन्होंने हमें पढ़ाया। वे मुझसे हमेशा कहती थीं कि सब्जी के साथ हरा धनिया मुफ्त में मिल जाता है तू मेरे लिए वही मुफ्त का हरा धनिया है। मेरी तबियत खराब होने पर साइकिल पर मुझे डॉक्टर के यहाँ ले जातीं और मुझसे पूछतीं कि तू बड़े होकर मेरे लिए क्या करेगा और मैं झट जवाब देता की मैं भी तुम्हें साइकिल पर बैठाकर डॉक्टर के पास ले जाऊँगा। रूसी और रोशनी की मृत्यु के बाद मुझे ही उन्हें डॉक्टरों के पास ले जाना पड़ा। मुझे क्या पता था कि बचपन में कही बात सच ही हो जाएगी।
बानवे वर्षीय वरिष्ठ अभिभाषक एवं कॉमरेड दाजी के पड़ोसी रह चुके समाजसेवी आनंद मोहन माथुर ने अपनी स्मृतियों को पलटते हुए कहा कि आमतौर पर नेता वही बोलते हैं जो जनता को पसंद हो, लेकिन पसंद ना आने वाली बात भी बोलने का साहस होमी दाजी और पेरिन दाजी में था। जब दाजी विधानसभा में थे तब मंहगाई के विरुद्ध वे एक प्रस्ताव लाने वाले थे और उसके बाद कम्युनिस्ट पार्टी पूरे प्रदेश में ज़बरदस्त आंदोलन छेड़ने वाली थी। यह बात सीआईडी के ज़रिये सरकार को पता चली तो पुलिस के ज़रिये दबाव डालने के लिए सरकार उन्हें गिरफ्तार करवाना चाहा। दाजी को तो उनके बेटे ने पुलिस से छिपकर वापस भोपाल भेज दिया लेकिन पुलिस ने पेरिन दाजी और पूरे दाजी परिवार के साथ सभी कॉमरेडों को गिरफ्तार कर थाने में बंद कर दिया। थाने में पेरिन दाजी को विशेष कैदी की तरह अलग रखा था तो उन्होंने आंदोलन छेड़ दिया कि मुझे सबके साथ रखा जाए। जब सबके साथ रख दिया फिर उन्होंने अपने और अपने कॉमरेडों के लिए खाने की माँग करके पुलिस की नाक में दम कर दिया। पुलिस ने सराफे से खाना बुलाकर सब बंदियों को खिलाया तब पेरिन दाजी शांत हुईं। माथुर जी ने अपनी पत्नी कुंती माथुर और पेरिन दाजी की गहरी दोस्ती के भी अनेक संस्मरण सुनाए।
विख्यात अर्थशास्त्री जया मेहता का परिचय और घनिष्ठता दाजी परिवार से बचपन से ही था। जया मेहता के माँ इन्दु मेहता और पिता आनंद सिंह मेहता आज़ादी के आंदोलन में नेतृत्व में थे और आज़ादी के बाद माँ इन्दु मेहता ने कॉलेज प्रिंसिपल का पद छोड़कर सीपीआई की सदस्य बन गई थीं। जया ने पेरिन दाजी की लिखी और विनीत तिवारी द्वारा सम्पादित किताब "यादों की रौशनी में" में से एकप्रसंग पढ़कर सुनाया जिसमें पेरिन दाजी एक छोटी बची की उत्सुकता से भरकर राष्ट्रपति भवन में जाती हैं और डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद से हाथ मिलाती हैं, सर्वपल्ली राधाकृष्णन को राष्ट्रपति बनने पर बधाई देती हैं और नेहरू जी द्वारा होमी दाजी को कांग्रेस में शामिल होने का आमंत्रण देने पर दृढ़ता से नेहरू जी को जवाब देती हैं "एक ईमानदार कम्युनिस्ट कांग्रेस में आकर क्या करेगा, वो जहाँ है, वहीँ ठीक है।"
मध्य प्रदेश भारतीय महिला फेडरेशन की राज्य सचिव सारिका श्रीवास्तव ने फेडरेशन की ओर से लाल सलाम समर्पित करते हुए लोगों को सभा में उपस्थित लोगों को उन बच्चों, महिलाओं और परिवारों से मिलवाया जिनके लिए पेरिन दाजी ने संघर्ष और उनकी सहायता की। सारिका ने कहा कि काकी ने अपने आप को पूरी तरह वंचित वर्ग के प्रति समर्पित किया था। वह सभी के साथ समान व्यवहार करती थीं। वे वर्गभेद नहीं करतीं थीं। उनके लिए सब बराबरी का दर्जा रखते थे चाहे सड़क पर तिपहिया वाहन पर चूड़ी, बिंदी बेचने वाली लक्ष्मी हो या उनके घर काम करने वाली कौशल्या जिसे वे बड़े प्यार से "मेरी बुड्ढी" कहा करती थीं, चाहे उनकी देखरेख करने वाली अंजली। सभी बराबर थे। पेरिन दाजी और जया मेहता ने जिस बच्चे के दिल में छेद होने पर उसके इलाज की ज़िम्मेदारी दस साल पहले ली थी, वो भी 15 वर्ष का स्वस्थ किशोर होकर सभा में मौजूद था।
इप्टा के अरविंद पोरवाल ने इप्टा के राष्ट्रीय सम्मेलन में संघ समर्थित असामाजिक तत्वों द्वारा विघ्न डालने की प्रयासों का जिक्र करते हुए बताया कि उस घटना के प्रभाव को कम करने के लिए काकी ने मंच पर चढ़कर अपने लिए जिए तो क्या जिए ..." गीत गाया। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी इंदौर इकाई के सचिव रूद्रपाल यादव, श्रमिक नेता मोहन निमजे, पारिवारिक मित्र शैला शिंत्रे, भारतीय महिला फेडरेशन इंदौर की सचिव नेहा, इप्टा कलाकार राज, महिमा, पेरिन की विद्यार्थी उषा कृष्णन ने भी अपनी यादों को ताजा किया। आयोजन में इप्टा कलाकारों ने जनगीत "जिंदगी ने एक दिन कहा कि तुम लड़ो तुम उठो... तुम उठो कि आसमान चूमले जमीन को ... तथा पेरिन दाजी के प्रिय गीत "अपने लिए जिए तो क्या जिए .." का गायन किया। कार्यक्रम में कामरेड दाजी दंपत्ति के पारिवारिक चित्र और संघर्षों को वीडियो के माध्यम से बड़े पर्दे पर दिखाया गया। कार्यक्रम में पूर्व विधायक अश्विन जोशी, वरिष्ठ अधिवक्ता श्री अनिल त्रिवेदी, वरिष्ठ बैंक यूनियन नेता अलोक खरे सामाजिक कार्यकर्ता शफी शेख, शब्बीर हुसैन, मुश्ताक़ हुसैन, अशोक दुबे, एस. के. दुबे, पंखुरी मिश्रा, सिद्धार्थ जैन, सम्यक जैन, शबाना पारेख, साहित्यकार रामआसरे पण्डे, केसरीसिंह चिडार आदि, राजनीतिक कार्यकर्त्ता कैलाश गोठानिया, कैलाश लिंबोदिअ, के. के. मिश्रा, आदि और मनोहर लिम्बोदिअ, अभय नेमा आदि पत्रकार साथी उपस्थित थे।
आयोजन में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के राष्ट्रीय महासचिव सुधाकर रेड्डी, भारतीय जन नाट्य संघ के महासचिव राकेश, श्रम संगठन एटक की महासचिव अमरजीत कौर, देश में महिला आंदोलन की प्रमुख कल्पना मेहता और अन्य श्रद्धांजलि संदेशों का वचन किया गया और जानकारी दी गई।