संसद में दो-तिहाई बहुमत जुटा रही बीजेपी, स्टालिन को NDA में लाने पर चल रही बात

राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद कांग्रेस ने डीएमके से दूरी बनाते हुए विजय सरकार को समर्थन दे दिया है। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी अब डीएमके को अपने पाले में लाने की संभावनाएं तलाश रही है। राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, भाजपा की रणनीति सीधे गठबंधन से अधिक मुद्दों के आधार पर समर्थन जुटाने की है।;

Update: 2026-05-22 08:06 GMT

नई दिल्ली/चेन्‍नई। Tamil Nadu Politics: तमिलनाडु की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। राज्य की सत्ता से द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) के बाहर होने और टीवीके प्रमुख थलपति विजय के मुख्यमंत्री बनने के बाद राजनीतिक गठबंधनों का पूरा समीकरण बदलता नजर आ रहा है। इस बदलाव का असर केवल चेन्नई तक सीमित नहीं है, बल्कि दिल्ली की राष्ट्रीय राजनीति में भी इसकी गूंज सुनाई देने लगी है। राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद कांग्रेस ने डीएमके से दूरी बनाते हुए विजय सरकार को समर्थन दे दिया है। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी अब डीएमके को अपने पाले में लाने की संभावनाएं तलाश रही है। राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, भाजपा की रणनीति सीधे गठबंधन से अधिक मुद्दों के आधार पर समर्थन जुटाने की है।

कांग्रेस के फैसले से डीएमके को बड़ा झटका

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस का डीएमके से अलग होना पार्टी के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है। लंबे समय तक साथ रहने वाले दोनों दलों के रिश्तों में आई दरार ने विपक्षी गठबंधन की राजनीति पर भी असर डाला है। बताया जा रहा है कि कांग्रेस के नए राजनीतिक रुख के बाद डीएमके ने विपक्षी INDIA गठबंधन से खुद को अलग कर लिया है। इसके बाद संसद में भी डीएमके ने कांग्रेस से अलग बैठने का फैसला किया। इसके लिए पार्टी ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को औपचारिक पत्र भी भेजा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल सीटों या गठबंधन का मामला नहीं है, बल्कि दक्षिण भारत की राजनीति में नए शक्ति संतुलन का संकेत भी है।

भाजपा की नजर डीएमके के सांसदों पर

तमिलनाडु में बदले हालात के बीच भाजपा अब डीएमके के संसदीय समर्थन को लेकर सक्रिय दिखाई दे रही है। सूत्रों के मुताबिक, भाजपा की नजर डीएमके के 22 लोकसभा सांसदों और 8 राज्यसभा सांसदों पर है। माना जा रहा है कि भाजपा फिलहाल औपचारिक गठबंधन के बजाय “मुद्दों के आधार पर समर्थन” की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी का आकलन है कि संसद में बड़े संवैधानिक बदलावों और अहम विधेयकों को पारित कराने के लिए अतिरिक्त समर्थन की आवश्यकता पड़ सकती है। इसी वजह से भाजपा डीएमके के साथ संवाद की संभावनाएं तलाश रही है, भले ही दोनों दलों के वैचारिक मतभेद लंबे समय से मौजूद रहे हों।

सनातन विवाद के कारण औपचारिक गठबंधन मुश्किल

हाल के वर्षों में डीएमके नेताओं के सनातन धर्म को लेकर दिए गए बयानों ने राष्ट्रीय राजनीति में काफी विवाद खड़ा किया था। यही वजह है कि भाजपा और डीएमके के बीच औपचारिक गठबंधन की संभावना फिलहाल कम मानी जा रही है। हालांकि राजनीतिक रणनीतिकारों का मानना है कि संसद में संख्या बल बढ़ाने के लिए भाजपा पर्दे के पीछे से समर्थन जुटाने का रास्ता अपना सकती है। भाजपा के कुछ नेताओं का मानना है कि राष्ट्रीय मुद्दों पर डीएमके से सहयोग लिया जा सकता है, जैसा अतीत में अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ होता रहा है।

अटल सरकार में साथ रह चुके हैं भाजपा और डीएमके

राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो भाजपा और डीएमके पहले भी एक साथ काम कर चुके हैं। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में डीएमके सहयोगी दल के रूप में शामिल थी। इसी पुराने राजनीतिक अनुभव को आधार बनाकर भाजपा के रणनीतिकार वर्तमान परिस्थितियों में भी संवाद की संभावनाएं देख रहे हैं। हालांकि आज का राजनीतिक माहौल पहले से काफी अलग है और दोनों दलों के वैचारिक मतभेद भी ज्यादा स्पष्ट हो चुके हैं।

दो-तिहाई बहुमत पर भाजपा का फोकस

सूत्रों के अनुसार, भाजपा की सबसे बड़ी चिंता संसद में दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा हासिल करना है। सरकार के पास साधारण बहुमत तो मौजूद है, लेकिन कई बड़े संवैधानिक बदलावों के लिए लोकसभा और राज्यसभा दोनों में दो-तिहाई समर्थन जरूरी होता है। हाल के समय में परिसीमन, महिला आरक्षण, न्यायिक सुधार और ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ जैसे मुद्दों पर चर्चा के दौरान यह साफ हुआ कि सरकार कुछ मामलों में जरूरी संख्या से पीछे रह सकती है। ऐसे में यदि डीएमके जैसे क्षेत्रीय दल मुद्दों के आधार पर समर्थन देते हैं, तो सरकार के लिए बड़े विधेयकों को पारित कराना आसान हो सकता है।

क्षेत्रीय दलों के मॉडल पर काम कर रही भाजपा

भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि बीजेडी, वाईएसआर कांग्रेस और बीआरएस जैसे दलों की तरह डीएमके भी कुछ राष्ट्रीय मुद्दों पर समर्थन देने की भूमिका निभा सकती है। सूत्रों का कहना है कि भाजपा फिलहाल प्रत्यक्ष राजनीतिक गठबंधन की बजाय “कार्यात्मक सहयोग” की रणनीति पर विचार कर रही है। यानी जिन मुद्दों पर दोनों पक्षों के हित मिलते हों, वहां संसद में सहयोग संभव हो सकता है।

तमिलनाडु की राजनीति का राष्ट्रीय असर

तमिलनाडु में हुए इस राजनीतिक बदलाव ने यह साफ कर दिया है कि क्षेत्रीय राजनीति अब सीधे राष्ट्रीय सत्ता संतुलन को प्रभावित कर रही है। थलपति विजय के नेतृत्व में नई सरकार बनने के बाद राज्य की राजनीति पूरी तरह नए दौर में प्रवेश करती दिखाई दे रही है। वहीं दिल्ली में भाजपा और विपक्ष दोनों तमिलनाडु के बदलते समीकरणों को अपने-अपने नजरिए से देख रहे हैं। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि डीएमके विपक्षी राजनीति में नई भूमिका निभाएगी या संसद में मुद्दों के आधार पर सत्ता पक्ष के करीब जाएगी।

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