नीट-यूजी पेपर लीक पर संसदीय समिति में तीखी बहस, एनटीए ने कहा- ‘पेपर लीक नहीं, सिस्टम हुआ था कंप्रोमाइज’

बैठक की अध्यक्षता कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह कर रहे थे। उन्होंने एनटीए के दावों पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि परीक्षा के प्रश्न हूबहू बाहर पहुंचे और छात्रों तक पहुंचे, तो उसे पेपर लीक ही कहा जाएगा। दूसरी ओर भाजपा सांसदों ने इस मुद्दे पर अलग रुख अपनाया।;

Update: 2026-05-22 06:18 GMT

नई दिल्ली : मेडिकल स्नातक पाठ्यक्रमों में दाखिले के लिए आयोजित होने वाली राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट-यूजी) को लेकर गुरुवार को संसद की शिक्षा मंत्रालय संबंधी स्थायी समिति की बैठक में जोरदार बहस देखने को मिली। बैठक में नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) के वरिष्ठ अधिकारियों ने दावा किया कि नीट-यूजी का प्रश्नपत्र लीक नहीं हुआ था, बल्कि परीक्षा प्रणाली के कुछ हिस्सों में समझौता यानी ‘सिस्टम कंप्रोमाइज’ हुआ था। इस दावे को लेकर समिति के कई सदस्यों ने सवाल खड़े किए और बैठक के दौरान माहौल काफी गर्म हो गया।

दिग्विजय सिंह और भाजपा सांसदों के बीच तीखी नोकझोंक

बैठक की अध्यक्षता कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह कर रहे थे। उन्होंने एनटीए के दावों पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि परीक्षा के प्रश्न हूबहू बाहर पहुंचे और छात्रों तक पहुंचे, तो उसे पेपर लीक ही कहा जाएगा। दूसरी ओर भाजपा सांसदों ने इस मुद्दे पर अलग रुख अपनाया। भाजपा सांसदों का कहना था कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) की जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। बैठक के दौरान भाजपा सांसद संबित पात्रा ने दिग्विजय सिंह पर एजेंडा पहले से सार्वजनिक करने का आरोप भी लगाया। इसके बाद माहौल और अधिक तनावपूर्ण हो गया। भाजपा सांसद रविशंकर प्रसाद ने कहा कि मामले की जांच अभी जारी है और अंतिम रिपोर्ट आने से पहले किसी भी तरह की राजनीतिक टिप्पणी से बचना चाहिए।

एनटीए ने बताई ‘सिस्टम कंप्रोमाइज’ की थ्योरी

बैठक में एनटीए अधिकारियों ने विस्तार से बताया कि अंतिम प्रश्नपत्र का मराठी भाषा में अनुवाद करने के लिए कुछ शिक्षकों को प्रश्न दिए गए थे। एजेंसी के अनुसार, इन्हीं शिक्षकों ने प्रश्नों को याद कर लिया और बाद में उन्हें कागज पर लिखकर कथित ‘गेस पेपर’ के रूप में कुछ छात्रों तक पहुंचा दिया। हालांकि समिति के कई सदस्यों ने इस स्पष्टीकरण को स्वीकार नहीं किया। उनका कहना था कि जब वास्तविक प्रश्नपत्र के प्रश्न परीक्षा से पहले छात्रों तक पहुंच गए, तो इसे तकनीकी शब्दों में चाहे कुछ भी कहा जाए, आम तौर पर यह पेपर लीक की श्रेणी में ही आएगा। कुछ सदस्यों ने यह भी पूछा कि यदि सुरक्षा व्यवस्था इतनी मजबूत थी, तो प्रश्नों को याद कर बाहर ले जाना कैसे संभव हुआ।

एनटीए महानिदेशक से पूछे गए कई अहम सवाल

बैठक के दौरान समिति के सदस्यों ने एनटीए महानिदेशक अभिषेक सिंह से प्रश्नपत्र तैयार करने, अनुवाद प्रक्रिया, सुरक्षा प्रोटोकॉल और वितरण व्यवस्था से जुड़े कई सवाल किए। सूत्रों के मुताबिक, कई सवालों के जवाब में उन्होंने केवल इतना कहा कि मामले की जांच सीबीआइ कर रही है और विस्तृत जानकारी जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगी। अभिषेक सिंह ने यह भी कहा कि नीट जैसी राष्ट्रीय परीक्षा का पेपर पारंपरिक तरीके से लीक होना आसान नहीं है, क्योंकि इसके लिए कई स्तरों पर सुरक्षा व्यवस्था लागू रहती है। उन्होंने दावा किया कि एनटीए ने परीक्षा प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बनाने के लिए कई सुधार लागू किए हैं।

राधाकृष्णन समिति की सिफारिशों पर अमल का दावा

एनटीए महानिदेशक ने समिति को जानकारी दी कि परीक्षा सुधारों के लिए गठित राधाकृष्णन समिति की लगभग 70 प्रतिशत सिफारिशों को लागू किया जा चुका है। उन्होंने बताया कि प्रश्नपत्रों की सुरक्षा, डिजिटल मॉनिटरिंग, केंद्रों पर निगरानी और परीक्षा संचालन से जुड़े कई नए प्रोटोकॉल अपनाए गए हैं। बैठक में कुछ सदस्यों ने सुझाव दिया कि भविष्य में प्रश्नपत्रों के कम से कम 10 अलग-अलग सेट तैयार किए जाएं। इन सेटों को अलग-अलग राज्यों में मिलाकर भेजा जाए ताकि यदि कहीं कोई गड़बड़ी हो भी जाए, तो उसका असर सीमित क्षेत्र तक ही रहे और पूरी परीक्षा प्रभावित न हो।

विपक्ष ने पारदर्शिता पर उठाए सवाल

समिति की बैठक में विपक्षी सांसदों ने परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि देशभर के लाखों छात्र नीट परीक्षा में शामिल होते हैं और ऐसी घटनाओं से छात्रों का भरोसा कमजोर होता है। विपक्षी सदस्यों ने मांग की कि जांच पूरी होने के बाद सरकार और एनटीए को पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए ताकि छात्रों और अभिभावकों के मन में उठ रहे सवालों का जवाब मिल सके। नीट-यूजी विवाद अब केवल परीक्षा सुरक्षा तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता और सरकारी एजेंसियों की जवाबदेही से भी जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है।

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