धराली में अब भी ताजा हैं बर्बादी के निशान
एक साल पहले बड़ी प्राकृतिक आपदा का शिकार होने वाले उत्तरकाशी जिले के धराली में अब भी उस बर्बादी के निशान दिखते हैं.;
बीते साल पांच अगस्त को बड़े पैमाने पर प्राकृतिक आपदा का शिकार होने वाले उत्तरकाशी जिले के धराली कस्बे में अब भी उस बर्बादी के निशान साफ नजर आते हैं. आपदा के 15 महीने बाद भी इस गांव और इसके लोगों का जीवन मानो ठहरा हुआ है.
उस आपदा में अपनों और अपनी संपत्ति खोने वाले लोगों के जख्म अब भी रिस रहे हैं. लेकिन लगता है कि उत्तराखंड ने ऐसे तमाम हादसों से कोई सबक नहीं सीखा है. पर्यटन के बढ़ते दबाव के कारण पहाड़ियों पर निर्माण कार्य पहले के मुकाबले तेज हो गया है. हर जगह होटलों और होमस्टे के बोर्ड नजर आते हैं. इसके साथ ही खासकर चार धाम यात्रा के सीजन में सड़को पर वाहनों की लंबी कतारें और घंटों चलने वाला ट्रैफिक जाम भी अब आम है.
बीते साल पांच अगस्त को भारी बारिश के कारण खीरगंगा में आए उफान और मलबे के सैलाब ने कुछ ही पलों में इस इलाके का भूगोल बदल दिया था. उस हादसे में पचास से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी और कई दर्जन होटल और मकान बह गए थे. कभी जहां भरा-पूरा धराली बाजार हुआ करता था वो जगह अब भी रेगिस्तान नजर आती है. धराली को सामने पहाड़ी पर बसे मुखबा गांव से जोड़ने वाला एक ब्रिज अब भी टूटी हालत में है. हादसे के पंद्रह महीने बाद भी तस्वीर में खास बदलाव नहीं आया है. इस आपदा के कारण सैकड़ों तीर्थयात्री जहां-तहां फंस गए थे और चार धाम यात्रा भी प्रभावित हुई थी.
एक साल बाद कैसे हाल हैं धराली के
धराली जिला मुख्यालय उत्तरकाशी से गंगोत्री की ओर जाने वाले रास्ते पर है. ‘राम तेरी गंगा मैली' फिल्म से मशहूर हर्षिल घाटी से निकलते ही उस आपदा से होने वाली बर्बादी के निशान नजर आने लगते हैं. धराली के ठीक दूसरी ओर पहाड़ी पर बसे मुखबा गांव से बर्बादी ज्यादा भयावह और साफ नजर आती है. आपदा के समय मुखबा के लोगों के बनाए गए वीडियो और तस्वीरों ने ही पहली बार आपदा की भयावहता के बारे में देश और दुनिया को बताया था.
मुखबा गांव के एक पुरोहित हरीश नौटियाल उस आपदा के गवाह रहे हैं. उन्होंने भी आपदा के समय उसकी वीडियो बनाई थी. वो डीडब्ल्यू को बताते हैं, "उस भयावह दृश्य के बारे में सोच कर अब भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं. खीर गंगा घाटी से बेहद तेजी से आने वाली करीब साठ फीट ऊंची पानी, पत्थर और मलबे की दीवार ने महज तीन मिनट में इस गांव का भूगोल बदल दिया. सब कुछ इतनी तेजी से हुआ कि लोगों को बचाव का कोई मौका ही नहीं मिल सका."
धराली में 40 कमरों वाले एक होटल के मालिक जय भगवान पंवार डीडब्ल्यू को बताते हैं, "मेरी करोड़ों की संपत्ति बर्बाद हो गई. यहां मेरे पैतृक मकान के अलावा नया बना मकान, 40 कमरों का होटल और सेब के बागान थे. लेकिन सब कुछ बह गया."
सरकारी मदद में कोताही के आरोप
स्थानीय लोगों का कहना है कि एक साल से भी ज्यादा समय बीतने के बावजूद लोग अब भी उस आपदा से लगे झटके और नुकसान से नहीं उबर सके हैं. उनका आरोप है कि सरकार से पर्याप्त मुआवजा नहीं मिला है. इसमें कई विसंगतियां भी हैं. मिसाल के तौर पर जिनके पास चार कमरे थे उनको भी दस लाख का मुआवजा मिला है और 40 कमरों वाले होटल मालिक पंवार को भी इतनी ही रकम मिली है.
धराली संघर्ष समिति के अध्यक्ष सतेंद्र पंवार भी डीडब्ल्यू को बताते हैं, "प्रभावित परिवारों को मिलने वाली मुआवजे की रकम पर्याप्त नहीं है. घर बनाने के लिए भी पूरे पैसे नहीं मिले हैं. मृतकों या घायलों के तमाम मामलों में भी अब तक मुआवजे का इंतजार है.धराली बाजार के पुनर्निर्माण का काम भी शुरू नहीं हो सका है." उनका कहना था, "उस आपदा ने कई लोगों की रोजी-रोटी छीन ली. कुछ लोग कमाने के लिए उत्तरकाशी और देहरादून जैसे शहरों में चले गए हैं."नेपाल आपदा के बाद भारत ने हिमालय पर निगरानी बढ़ाई
दूसरी ओर, सरकार का कहना है कि विभिन्न विभागों की ओर से अब तक धराली के विकास और पुनर्वास के मद में 35 करोड़ करोड़ से ज्यादा की रकम खर्च की जा चुकी है. इनमें प्रभावित परिवारों को दी गई 17 करोड़ की वित्तीय सहायता भी शामिल है. मृतकों के परिजनों को पांच-पांच लाख का मुआवजा दिया गया है.
उत्तरकाशी के जिलाशासक प्रशांत आर्य ने हाल में पत्रकारों को बताया था, "जिन लोगों को घर पूरी तरह बर्बाद हो गए थे उनको शुरुआती राहत के तौर पर पांच-पांच लाख रुपए दिए गए थे. सरकार की पुनर्वास नीति के तहत उनको इतनी ही रकम और दी जाएगी. इसके अलावा होटल और व्यावसायिक प्रतिष्ठान मालिकों को 10 लाख रुपए तक की सहायता दी गई है."
हादसों से कैसे सबक लिए?
क्या अक्सर होने वाले ऐसे हादसों से किसी ने कोई सबक लिया है? सिक्किम से लेकर उत्तराखंड तक की पहाड़ियों को देखने पर ऐसा नहीं लगता है. पहाड़ियों पर पर्यटकों की बढ़ती संख्या को ध्यान में रखते हुए होटलों और होमस्टे का निर्माण तेज हो रहा है. वर्ष 1991 में बड़े पैमाने पर आने वाले भूकंप से तबाही की मार झेलने वाला जिला मुख्यालय उत्तरकाशी का चेहरा बड़े पैमाने पर होने वाले निर्माण ने बदल दिया है. भागीरथी नदी के दोनों किनारे बसा यह शहर छोटे-बड़े निर्माण से भर गया है.
वैज्ञानिकों का कहना है कि उत्तराखंड की सबसे बड़ी चुनौती अब छिटपुट आपदाओं से निपटना नहीं बल्कि तेजी से बदलते हिमालयी जलवायु से निपटने की तैयारी करना है. अब ऐसे हादसे और जल्दी-जल्दी होने लगे हैं और उनका स्वरूप भयावह हो रहा है. भूवैज्ञानिकों का कहना है कि वाहनों की बढ़ती संख्या से बढ़ने वाले दबाव और उनके कंपन के कारण भी पहाड़ियों को नुकसान हो रहा है और भारी बारिश की हालत में वो पत्थरों और मलबे के साथ नीचे आकर बड़े पैमाने पर तबाही मचाती है.
सिक्किम के पर्यावरण विशेषज्ञ प्रोफेसर बी. एन. प्रधान डीडब्ल्यू से कहते हैं, "सिक्किम से लेकर हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली बादल फटने और किसी खास दायरे में होने वाली भारी बारिश की घटनाओं के कारण बढ़ने वाले हादसों का एक सामान्य पैटर्न सामने आ रहा है. जलवायु परिवर्तन ने इन घटनाओं की भयावहता बढ़ा दी है."
हिमालय के संरक्षण की दिशा में काम करने वाले सिलीगुड़ी के एक गैर-सरकारी संगठन हिमालयन नेचर एंड एडवेंचर फाउंडेशन के संयोजक अनिमेष बसु कहते हैं, "अनियंत्रित पर्यटन की वजह से पहाड़ों पर तेजी से बढ़ते निर्माण ने इन हादसों को और जटिल व गंभीर बना दिया है. ऐसे हादसों को रोकने के लिए सरकार, गैर-सरकारी संगठनों और इलाके के आम लोगों को मिलकर काम करना होगा. नदी-नालों के रास्तों में होने वाले निर्माण के कारण जान-माल के नुकसान का खतरा कई गुना बढ़ गया है."