SIR पर एसवाइ कुरैशी बोले, एक भी योग्य मतदाता का नाम सूची से हटना चुनाव आयोग के लिए कलंक

कुरैशी ने दावा किया कि ड्राफ्ट मतदाता सूची में 2024 के लोकसभा चुनाव की तुलना में मतदाताओं की संख्या करीब 15.7 प्रतिशत कम हुई है। उन्होंने इस गिरावट को बेहद गंभीर बताते हुए इसे ‘स्कैम’ तक करार दिया।;

Update: 2026-09-07 03:24 GMT

भुवनेश्वरः मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी (SY Quraish) ने चुनाव प्रक्रिया और मतदाताओं के अधिकारों से जुड़े गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि पुनरीक्षण के नाम पर अगर किसी एक भी योग्य नागरिक का नाम मतदाता सूची से हटता है तो यह चुनाव आयोग के लिए गंभीर विफलता होगी। आयोग को ऐसी स्थिति की जिम्मेदारी तय करनी चाहिए। भुवनेश्वर में रविवार को मीडिया से बातचीत में कुरैशी ने मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर कमी को लेकर चिंता जताई। उन्होंने प्रक्रिया को अतार्किक, अनुचित और मनमाना बताते हुए कहा कि किसी नागरिक के मतदान के अधिकार को किसी भी परिस्थिति में मनमाने तरीके से नहीं छीना जाना चाहिए।

मतदाताओं की संख्या में 15.7 प्रतिशत कमी पर सवाल

कुरैशी ने दावा किया कि ड्राफ्ट मतदाता सूची में 2024 के लोकसभा चुनाव की तुलना में मतदाताओं की संख्या करीब 15.7 प्रतिशत कम हुई है। उन्होंने इस गिरावट को बेहद गंभीर बताते हुए इसे ‘स्कैम’ तक करार दिया। उनके मुताबिक, देशभर में करीब 13 से 14 करोड़ नाम मतदाता सूची से हटाए जाने की बात सामने आ रही है। उन्होंने सवाल किया कि अगर इतने लोगों के नाम हटाए गए हैं तो नए मतदाताओं के नाम जोड़ने की प्रक्रिया उतनी ही महत्वपूर्ण क्यों नहीं है।

‘पलायन हुआ है तो नए स्थान पर नाम जुड़ना चाहिए’

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के आधार पर भी सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि क्या लोगों का केवल एक दिशा में ही पलायन हो रहा है? कुरैशी के अनुसार, यदि कोई मतदाता एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर बसता है तो उसका नाम नई जगह की मतदाता सूची में शामिल किया जाना चाहिए। केवल पुराने स्थान की सूची से नाम हटाना पर्याप्त प्रक्रिया नहीं हो सकती।

किसी समुदाय को निशाना बनाने से बचने की अपील

कुरैशी ने यह भी कहा कि SIR जैसी प्रक्रिया का इस्तेमाल किसी विशेष समुदाय को निशाना बनाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। ओडिशा लिटरेरी फेस्टिवल में बातचीत के दौरान उन्होंने विशेष रूप से आशंका जताई कि मुसलमानों को ‘बांग्लादेशी घुसपैठिया’ बताकर मतदाता सूची से बाहर करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि मतदान का अधिकार संविधान से जुड़ा अधिकार है और इसे किसी सरकार या संस्था की कृपा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। कुरैशी ने भारत की धर्मनिरपेक्ष पहचान का उल्लेख करते हुए कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सभी नागरिकों के अधिकारों की समान रूप से रक्षा जरूरी है।

2002 की मतदाता सूची पर भी उठाए सवाल

SIR प्रक्रिया में संदर्भ के तौर पर इस्तेमाल की जा रही 2002 की मतदाता सूची को लेकर भी कुरैशी ने सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि पुरानी मतदाता सूची को पूरी तरह त्रुटिरहित नहीं माना जा सकता। उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभव का उदाहरण देते हुए कहा कि 2002 की सूची में उनके पिता का नाम तक गलत दर्ज था। ऐसे में पुरानी सूची का इस्तेमाल संदर्भ के तौर पर किया जा सकता है, लेकिन उसे अंतिम और पूर्ण सत्य मानना उचित नहीं होगा।

लवासा भी उठा चुके हैं ‘प्रक्रिया’ का सवाल

SIR को लेकर पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा भी सवाल उठा चुके हैं। उन्होंने इसे लाखों नागरिकों पर थोपी गई प्रक्रिया बताते हुए कहा था कि किसी प्रक्रिया का कानूनी होना और उसका न्यायसंगत होना दो अलग बातें हैं। लवासा के मुताबिक, संस्थाएं अक्सर यह मान लेती हैं कि कानून के तहत की गई कार्रवाई अपने आप सही है। लेकिन न्याय का अर्थ केवल कानून के शब्दों का पालन करना नहीं, बल्कि उसकी भावना की रक्षा करना भी है।

मतदाता सूची की शुद्धता और अधिकार दोनों जरूरी

SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन और अधिक सटीक बनाना है। हालांकि, कुरैशी और लवासा की आपत्तियां इस बात पर केंद्रित हैं कि सूची को दुरुस्त करने की प्रक्रिया में किसी वास्तविक और योग्य मतदाता का अधिकार प्रभावित नहीं होना चाहिए। ऐसे में आने वाले समय में SIR के तहत नाम हटाने, जोड़ने और दावों-आपत्तियों के निपटारे की प्रक्रिया पर निगाह रहेगी। मामला केवल मतदाता सूची के आंकड़ों का नहीं, बल्कि नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकार और चुनाव प्रक्रिया पर भरोसे से भी जुड़ा है।

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