रूस से एस-400 के 5 नए एयर डिफेंस सिस्टम खरीदेगा भारत, आपरेशन सिंदूर के दौरान निभाई थी अहम भूमिका

रक्षा अधिकारियों का कहना है कि नए सिस्टम को रणनीतिक दृष्टि से अहम पूर्वी और पश्चिमी सीमाओं पर तैनात किया जाएगा। इससे चीन और पाकिस्तान, दोनों मोर्चों पर भारत की हवाई सुरक्षा क्षमता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी।

Update: 2026-03-03 06:51 GMT

नई दिल्ली। भारत रूस से एस-400 ‘सुदर्शन’ एयर डिफेंस सिस्टम के पांच नए स्क्वाड्रन खरीदने की तैयारी में है। रक्षा मंत्रालय जल्द ही भारतीय वायुसेना के प्रस्ताव को उच्च स्तर पर मंजूरी के लिए आगे बढ़ा सकता है। सूत्रों के मुताबिक, पिछले वर्ष ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान एस-400 सिस्टम के प्रभावी प्रदर्शन के बाद इसकी अतिरिक्त खरीद का निर्णय लिया गया है। भारतीय सैन्य ढांचे में इसे ‘सुदर्शन चक्र’ के नाम से भी जाना जाता है। रक्षा अधिकारियों का कहना है कि नए सिस्टम को रणनीतिक दृष्टि से अहम पूर्वी और पश्चिमी सीमाओं पर तैनात किया जाएगा। इससे चीन और पाकिस्तान, दोनों मोर्चों पर भारत की हवाई सुरक्षा क्षमता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद तेज हुई प्रक्रिया

सूत्रों के अनुसार, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान एस-400 सिस्टम ने लंबी दूरी से हवाई खतरों का सफलतापूर्वक मुकाबला किया। सैन्य आकलन में यह सामने आया कि इस प्रणाली ने 300 किलोमीटर से अधिक दूरी पर दुश्मन के लड़ाकू विमानों और एक निगरानी विमान को मार गिराने में अहम भूमिका निभाई। वायुसेना ने इसे भारत की समग्र हवाई सुरक्षा रणनीति में “गेम चेंजर” करार दिया है। ऑपरेशन के दौरान पाकिस्तान ने भी चीन निर्मित एचक्यू-9 वायु रक्षा प्रणाली के अतिरिक्त स्क्वाड्रन तैनात किए थे। हालांकि, भारतीय अधिकारियों के अनुसार, वे भारतीय विमानों की सटीक कार्रवाई को प्रभावी रूप से रोकने में सफल नहीं हो सके।

मिसाइल और ड्रोन हमलों को भी किया नाकाम

ऑपरेशन के दौरान भारतीय वायु रक्षा प्रणालियों ने न केवल कई पाकिस्तानी विमानों को निशाना बनाया, बल्कि सीमा पार से दागी गई क्रूज और बैलिस्टिक मिसाइलों को भी इंटरसेप्ट किया। विशेषज्ञों का मानना है कि बहु-स्तरीय वायु रक्षा ढांचे में एस-400 की तैनाती से भारत को लंबी दूरी की निगरानी और त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता मिली है। इससे संभावित हवाई हमलों को सीमा से काफी पहले ही निष्क्रिय किया जा सकता है।

2018 का समझौता और मौजूदा स्थिति

भारत और रूस के बीच अक्टूबर 2018 में एस-400 ट्रायम्फ सिस्टम के पांच स्क्वाड्रन की खरीद के लिए लगभग 5.4 अरब डॉलर का समझौता हुआ था। अब तक इनमें से तीन स्क्वाड्रन भारतीय वायुसेना में शामिल होकर पूरी तरह ऑपरेशनल हो चुके हैं। शेष दो की आपूर्ति प्रक्रिया जारी है। रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि मौजूदा डिलीवरी शेड्यूल के साथ-साथ अतिरिक्त पांच स्क्वाड्रन की संभावित खरीद पर भी चर्चा आगे बढ़ रही है। इसके अलावा, वायुसेना एस-400 के लिए बड़ी संख्या में अतिरिक्त इंटरसेप्टर मिसाइलें खरीदने पर भी विचार कर रही है। इसके लिए रूस के साथ बातचीत जारी है और जल्द ही औपचारिक निविदा प्रक्रिया दोबारा शुरू की जा सकती है।

एस-400 क्या है और कैसे काम करता है?

एस-400 ट्रायम्फ रूस का अत्याधुनिक लंबी दूरी का वायु रक्षा प्रणाली है, जिसे 2007 में औपचारिक रूप से सेवा में शामिल किया गया था। इसे दुनिया की सबसे उन्नत एयर डिफेंस प्रणालियों में गिना जाता है।

एक स्क्वाड्रन की क्षमता

एक एस-400 स्क्वाड्रन में आमतौर पर 256 मिसाइलें होती हैं। भारत के पास फिलहाल तीन सक्रिय स्क्वाड्रन हैं, जिन्हें अलग-अलग रणनीतिक दिशाओं में तैनात किया गया है।

बहु-स्तरीय सुरक्षा

एस-400 प्रणाली एक साथ कई प्रकार के हवाई लक्ष्यों को ट्रैक और नष्ट कर सकती है, जिनमें शामिल हैं-लड़ाकू विमान, स्टेल्थ फाइटर जेट, क्रूज मिसाइल, बैलिस्टिक मिसाइल, ड्रोन और यूएवी। इसकी अधिकतम मारक क्षमता लगभग 400 किलोमीटर तक बताई जाती है, जबकि यह 30 किलोमीटर से अधिक ऊंचाई तक के लक्ष्यों को भी निशाना बना सकता है। इसकी उन्नत रडार प्रणाली एक साथ सैकड़ों लक्ष्यों को ट्रैक करने और कई लक्ष्यों पर एक साथ मिसाइल दागने में सक्षम है।

चीन और पाकिस्तान के संदर्भ में रणनीतिक महत्व

भारत के लिए एस-400 की अहमियत दोहरे मोर्चे की चुनौती को देखते हुए और बढ़ जाती है।

पूर्वी सीमा

पूर्वी सेक्टर में चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियां और उसके उन्नत फाइटर जेट व मिसाइल सिस्टम भारत के लिए चुनौती बने हुए हैं। एस-400 की तैनाती से इस क्षेत्र में एयर डोमिनेंस और शुरुआती चेतावनी क्षमता मजबूत होती है।

पश्चिमी सीमा

पश्चिमी मोर्चे पर पाकिस्तान की वायु सेना और उसके मिसाइल कार्यक्रम को ध्यान में रखते हुए एस-400 एक मजबूत प्रतिरोधक (डिटरेंस) के रूप में काम करता है। इससे किसी भी आकस्मिक या योजनाबद्ध हवाई हमले को शुरुआती चरण में ही निष्क्रिय किया जा सकता है।

स्वदेशी विकल्प: ‘परियोजना कुशा’

जहां एक ओर भारत रूस से एस-400 की अतिरिक्त खरीद पर विचार कर रहा है, वहीं दूसरी ओर रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ‘परियोजना कुशा’ के तहत स्वदेशी लंबी दूरी की वायु रक्षा प्रणाली विकसित करने में जुटा है।

इस परियोजना का उद्देश्य 350-400 किलोमीटर तक की मारक क्षमता वाला स्वदेशी सिस्टम तैयार करना है, जो भविष्य में आयातित प्रणालियों पर निर्भरता कम कर सके। विशेषज्ञों का मानना है कि एस-400 और कुशा जैसी स्वदेशी परियोजनाएं मिलकर भारत को बहु-स्तरीय, एकीकृत और आत्मनिर्भर वायु रक्षा ढांचा प्रदान कर सकती हैं। 


वायु रक्षा नेटवर्क और मजबूत होगा

रक्षा मंत्रालय द्वारा प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बाद भारत-रूस के बीच नए समझौते पर औपचारिक बातचीत तेज हो सकती है। हालांकि, भू-राजनीतिक परिस्थितियों और वैश्विक प्रतिबंधों के संदर्भ में भुगतान और डिलीवरी तंत्र को लेकर भी सावधानीपूर्वक रणनीति अपनाई जाएगी। सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार, आधुनिक युद्ध में हवाई व मिसाइल खतरों की प्रकृति तेजी से बदल रही है। ऐसे में लंबी दूरी की उन्नत वायु रक्षा प्रणाली केवल सुरक्षा कवच ही नहीं, बल्कि रणनीतिक संतुलन का महत्वपूर्ण साधन भी है। यदि अतिरिक्त पांच स्क्वाड्रन की खरीद को अंतिम मंजूरी मिलती है, तो भारत का वायु रक्षा नेटवर्क और मजबूत होगा तथा दो मोर्चों पर संभावित खतरों से निपटने की क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

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