खामेनेई के निधन पर भारत ने जताई संवेदना, विदेश सचिव ने ईरानी दूतावास में शोक पुस्तिका पर किए हस्ताक्षर

भारत ने कहा कि वह इस कठिन समय में ईरान की जनता और सरकार के साथ एकजुटता और सहानुभूति व्यक्त करता है। खामेनेई का निधन 28 फरवरी 2026 को हुआ था। उनकी मृत्यु अमेरिका और इजरायल के हवाई हमले में हुई थी।

Update: 2026-03-05 11:40 GMT
नई दिल्‍ली। India expresses condolences Ayatollah Ali Khamenei Death: ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन के बाद भारत ने आधिकारिक तौर पर शोक व्यक्त किया है। गुरुवार को भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास पहुंचकर शोक पुस्तिका (Condolence Book) पर हस्ताक्षर किए और भारत सरकार की ओर से ईरान के प्रति संवेदना प्रकट की। इस दौरान भारत ने कहा कि वह इस कठिन समय में ईरान की जनता और सरकार के साथ एकजुटता और सहानुभूति व्यक्त करता है। खामेनेई का निधन 28 फरवरी 2026 को हुआ था। उनकी मौत अमेरिका और इजरायल के हवाई हमले में हुई। 86 वर्षीय खामेनेई 1989 से ईरान के सर्वोच्च नेता के रूप में सत्ता में थे और लगभग चार दशकों तक देश की राजनीति और विदेश नीति पर उनका निर्णायक प्रभाव रहा।

भारत की प्रतिक्रिया

खामेनेई के निधन और पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच भारत ने सावधानीपूर्ण और संतुलित प्रतिक्रिया दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस पूरे घटनाक्रम पर चिंता जताते हुए क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने की अपील की है। उन्होंने कहा कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय विवाद का समाधान केवल सैन्य टकराव से नहीं हो सकता। प्रधानमंत्री के अनुसार, स्थायी समाधान के लिए संवाद और कूटनीति का रास्ता ही सबसे प्रभावी और टिकाऊ तरीका है। उन्होंने यह भी कहा कि पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक चिंता का विषय है।

खाड़ी देशों में भारतीयों की सुरक्षा पर नजर

पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष के बीच भारत सरकार खाड़ी क्षेत्र में रह रहे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर भी सक्रिय है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल के दिनों में खाड़ी क्षेत्र के आठ देशों के नेताओं से बातचीत की है। इन चर्चाओं का उद्देश्य क्षेत्रीय स्थिति का आकलन करना और वहां मौजूद भारतीय समुदाय की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। खाड़ी देशों में लगभग एक करोड़ भारतीय नागरिक काम करते हैं और यह क्षेत्र भारत के लिए आर्थिक, ऊर्जा और सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

विपक्ष ने उठाए थे सरकार की प्रतिक्रिया पर सवाल

खामेनेई के निधन के बाद भारत सरकार की शुरुआती प्रतिक्रिया को लेकर देश की राजनीति में भी चर्चा हुई। कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी और पार्टी नेता राहुल गांधी ने सरकार की कथित चुप्पी पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि इतने बड़े अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर भारत को स्पष्ट और संवेदनशील रुख अपनाना चाहिए। हालांकि, बाद में विदेश सचिव द्वारा ईरानी दूतावास में शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर करने के बाद भारत ने औपचारिक रूप से अपनी संवेदना व्यक्त कर दी।

भारत की कूटनीतिक रणनीति क्या है?

विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे संकट में भारत ने संतुलित और सावधानीपूर्ण कूटनीतिक रणनीति अपनाई है। भारत एक ओर ईरान के साथ अपने लंबे समय से चले आ रहे राजनयिक और आर्थिक संबंधों को बनाए रखना चाहता है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने रणनीतिक साझेदारी को भी संतुलित रखना जरूरी है। भारत की यह नीति इस बात को दर्शाती है कि वह क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के साथ-साथ अपने ऊर्जा, व्यापार और सुरक्षा हितों की रक्षा करना चाहता है।

पश्चिम एशिया में क्यों बढ़ रहा है तनाव?

पिछले कुछ दिनों में पश्चिम एशिया के हालात तेजी से बिगड़े हैं। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान में सैन्य अभियान चलाए जाने के बाद दोनों पक्षों के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। लगातार हो रहे हमलों और जवाबी कार्रवाइयों ने पूरे क्षेत्र में अस्थिरता और अनिश्चितता पैदा कर दी है। कई देशों को आशंका है कि यदि स्थिति जल्द नियंत्रित नहीं हुई तो यह संघर्ष और बड़े क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय लगातार सभी पक्षों से संयम बरतने और शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में कदम उठाने की अपील कर रहा है।

ईरान की सत्ता के केंद्र में रहे खामेनेई

अयातुल्ला अली खामेनेई ईरान की धार्मिक और राजनीतिक व्यवस्था के सबसे शक्तिशाली स्तंभों में से एक रहे। 1989 में ईरान की इस्लामी क्रांति के संस्थापक रूहोल्लाह खोमैनी के निधन के बाद खामेनेई को देश का सर्वोच्च नेता बनाया गया था। उस समय कई विश्लेषकों ने उन्हें अपेक्षाकृत कमजोर और कम प्रभावशाली नेता माना था।  हालांकि समय के साथ उन्होंने अपनी सत्ता को मजबूत किया और ईरान की राजनीतिक प्रणाली में अपनी पकड़ बेहद मजबूत बना ली।

'कमजोर नेता' से ‘लौह पुरुष’ बनने तक का सफर

खामेनेई के शुरुआती राजनीतिक जीवन को कई चुनौतियों से गुजरना पड़ा। उनके पास न तो अपने पूर्ववर्ती खोमैनी जैसा धार्मिक कद था और न ही उतना करिश्मा। इसके बावजूद उन्होंने धीरे-धीरे सत्ता के विभिन्न संस्थानों पर प्रभाव बढ़ाया। उन्होंने विशेष रूप से ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) को मजबूत किया, जो समय के साथ उनके शासन का सबसे भरोसेमंद सुरक्षा तंत्र बन गया।

उनकी विचारधारा को अक्सर पश्चिम विरोधी माना गया, लेकिन कई मौकों पर उन्होंने व्यावहारिक रणनीति भी अपनाई। उदाहरण के तौर पर, उन्होंने 2015 के ईरान परमाणु समझौते को मंजूरी दी थी, ताकि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों में राहत मिल सके और देश की अर्थव्यवस्था को स्थिर किया जा सके। हालांकि 2018 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा उस समझौते से हटने के बाद खामेनेई ने फिर से कड़ा रुख अपना लिया।

सुरक्षा बल और आर्थिक नेटवर्क पर आधारित सत्ता

खामेनेई की शक्ति के पीछे दो प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं—रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) और उनका आर्थिक नेटवर्क ‘सेताद’। ‘सेताद’ एक विशाल आर्थिक संगठन है जिसकी संपत्ति अरबों डॉलर आंकी जाती है। यह संस्था सीधे सर्वोच्च नेता के नियंत्रण में मानी जाती है और इसके संसाधनों का उपयोग सुरक्षा बलों और राजनीतिक संरचना को मजबूत करने में किया जाता रहा है।

विरोध प्रदर्शनों पर सख्त रुख

खामेनेई के शासनकाल में ईरान में कई बड़े विरोध आंदोलन भी हुए। 2009 के विवादित राष्ट्रपति चुनाव के बाद हुए प्रदर्शन, 2022 में महसा अमीनी की मौत के बाद उठे व्यापक आंदोलन और हाल के आर्थिक विरोध इन सभी को सरकार ने कड़े सुरक्षा उपायों के जरिए नियंत्रित किया। इन परिस्थितियों में खामेनेई को उनके समर्थक एक ऐसे नेता के रूप में देखते थे जो किसी भी कीमत पर इस्लामी गणतंत्र की व्यवस्था को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध थे।

एक प्रभावशाली लेकिन विवादित विरासत

लगभग चार दशकों तक सत्ता में रहने वाले अयातुल्ला अली खामेनेई को ईरान के इतिहास के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिना जाता है। उनके समर्थक उन्हें ईरान की सार्वभौमिकता और क्षेत्रीय प्रभाव को मजबूत करने वाला नेता मानते हैं, जबकि आलोचक उनके शासन को राजनीतिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों पर कठोर नियंत्रण से जोड़ते हैं। उनकी मृत्यु ऐसे समय में हुई है जब पश्चिम एशिया पहले से ही गंभीर तनाव और अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में आने वाले समय में ईरान की राजनीति और पूरे क्षेत्र की भू-राजनीतिक स्थिति पर इसके व्यापक प्रभाव पड़ने की संभावना जताई जा रही है।

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