लोकसभा में 50 प्रतिशत सीटें बढ़ाने के फार्मूले से दक्षिणी राज्यों, पूर्वोत्तर को होगा नुकसान : कांग्रेस
कांग्रेस ने इस प्रस्ताव पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि मोदी सरकार लोकसभा सीटों में 50 प्रतिशत बढ़ोतरी का बिल जल्दबाजी में पास कराने की कोशिश कर रही है।
नई दिल्ली: वर्तमान बजट सत्र के दौरान संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के आरक्षण को 2029 से लागू करने के लिए संविधान संशोधन लाने की योजना भले ही फिलहाल टल गई हो, लेकिन लोकसभा सीटों की संख्या में 50 प्रतिशत बढ़ोतरी के प्रस्ताव ने सियासी बहस को तेज कर दिया है। इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष आमने-सामने नजर आ रहे हैं, जहां कांग्रेस ने इस संभावित कदम पर गंभीर आपत्तियां जताई हैं।
क्या है लोकसभा सीटें बढ़ाने का प्रस्ताव?
सूत्रों के अनुसार, केंद्र सरकार लोकसभा की वर्तमान सीटों की संख्या में लगभग 50 प्रतिशत तक वृद्धि करने पर विचार कर रही है। इस प्रस्ताव के तहत देश के सभी राज्यों में मौजूदा सीटों की संख्या में समान अनुपात में बढ़ोतरी की जा सकती है। सरकार की ओर से अभी तक इस पर आधिकारिक विधेयक पेश नहीं किया गया है, लेकिन विपक्ष का आरोप है कि इसे जल्दबाजी में पारित कराने की तैयारी की जा रही है।
‘जबरन पारित कराने की तैयारी’
कांग्रेस ने इस प्रस्ताव पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि मोदी सरकार लोकसभा सीटों में 50 प्रतिशत बढ़ोतरी का बिल जल्दबाजी में पास कराने की कोशिश कर रही है। पार्टी के संचार महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए इस प्रस्ताव को “भ्रामक” और “दूरगामी असर वाला” बताया। उन्होंने कहा कि पहली नजर में यह प्रस्ताव सभी राज्यों के लिए समान लग सकता है, लेकिन इसके वास्तविक प्रभाव बेहद असंतुलित होंगे।
The Modi Govt is proposing to bulldoze a Bill to increase the size of the Lok Sabha by 50%. The number of seats allocated to each state is also proposed to be increased by 50%. The argument that a 50% increase in seats across-the-board is equitable is deceptive. Proportions may…
— Jairam Ramesh (@Jairam_Ramesh) April 1, 2026
प्रतिनिधित्व का असंतुलन?
जयराम रमेश ने उदाहरण देते हुए बताया कि वर्तमान में उत्तर प्रदेश के पास 80 लोकसभा सीटें हैं, जबकि तमिलनाडु के पास 39 सीटें हैं। यदि 50 प्रतिशत बढ़ोतरी लागू होती है, तो उत्तर प्रदेश की सीटें बढ़कर 120 हो जाएंगी, जबकि तमिलनाडु की सीटें केवल 59 तक पहुंचेंगी। इसी तरह, केरल की सीटें 20 से बढ़कर 30 होंगी, जबकि बिहार की सीटें 40 से बढ़कर 60 हो जाएंगी। कांग्रेस का दावा है कि इस प्रस्ताव से उत्तर भारत के राज्यों को अधिक लाभ मिलेगा, जबकि दक्षिणी राज्यों को अपेक्षाकृत कम फायदा होगा। रमेश के अनुसार, कुल मिलाकर दक्षिणी राज्यों को केवल 66 अतिरिक्त सीटें मिलेंगी, जबकि उत्तरी राज्यों को लगभग 200 सीटों का लाभ होगा। इससे संसद में क्षेत्रीय संतुलन प्रभावित हो सकता है।
छोटे राज्यों और पूर्वोत्तर पर भी असर
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह प्रस्ताव केवल उत्तर-दक्षिण के बीच असंतुलन पैदा नहीं करेगा, बल्कि छोटे राज्यों और पूर्वोत्तर क्षेत्र पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। उनके मुताबिक, जिन राज्यों की आबादी कम है, वहां सीटों में बढ़ोतरी सीमित रहेगी, जिससे उनकी आवाज संसद में अपेक्षाकृत कमजोर हो सकती है।
मनीष तिवारी की चिंता: ‘नया फॉर्मूला जरूरी’
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और चंडीगढ़ से सांसद मनीष तिवारी ने भी इस मुद्दे पर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि 50 प्रतिशत सीट बढ़ाने का मौजूदा प्रस्ताव व्यावहारिक और संतुलित नहीं लगता। तिवारी के अनुसार, दक्षिण, पश्चिम, पूर्व और उत्तर-पश्चिम के कई राज्यों जैसे जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली को भी संभावित परिसीमन में नुकसान हो सकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि या तो परिसीमन के लिए एक नया और संतुलित फॉर्मूला तैयार किया जाए या फिर वर्तमान स्थिति को कुछ समय के लिए फ्रीज कर दिया जाए, ताकि क्षेत्रीय असंतुलन से बचा जा सके।
परिसीमन और जनसंख्या का जटिल गणित
लोकसभा सीटों के पुनर्निर्धारण (परिसीमन) का मुद्दा हमेशा से संवेदनशील रहा है। भारत में सीटों का बंटवारा मुख्य रूप से जनसंख्या के आधार पर होता है, लेकिन 1976 से 2026 तक इसे फ्रीज रखा गया था, ताकि जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को नुकसान न पहुंचे। दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया है, जबकि उत्तरी राज्यों की जनसंख्या तेजी से बढ़ी है। ऐसे में यदि सीटों का पुनर्वितरण पूरी तरह जनसंख्या के आधार पर किया जाता है, तो दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व घट सकता है, यही विपक्ष की मुख्य चिंता है।
सरकार की चुप्पी, लेकिन बहस तेज
हालांकि केंद्र सरकार ने अभी तक इस मुद्दे पर विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन सियासी हलकों में इस प्रस्ताव को लेकर चर्चा तेज हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि लोकसभा सीटों में बढ़ोतरी एक जरूरी कदम हो सकता है, क्योंकि देश की जनसंख्या में भारी वृद्धि हुई है। लेकिन इसे लागू करते समय क्षेत्रीय संतुलन, संघीय ढांचे और सभी राज्यों के हितों का ध्यान रखना बेहद जरूरी होगा।