महुआ मोइत्रा पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से भड़का CJP, न्यायिक जवाबदेही पर उठाए सवाल

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी सामने आने के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने इसे न्यायिक जवाबदेही के मुद्दे से जोड़ दिया। पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके और सह-संयोजक सौरभ दास ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए अदालत की टिप्पणी पर सवाल उठाए।;

Update: 2026-08-08 06:01 GMT

कोलकाता/पुणे: तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा की पुलिस के सामने वर्चुअल पेशी की मांग पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को लेकर विवाद बढ़ गया है। पश्चिम बंगाल में अपने खिलाफ संभावित विरोध और पहले अंडे फेंके जाने की घटना का हवाला देते हुए मोइत्रा ने जांच अधिकारी के सामने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश होने की अनुमति मांगी थी। शुक्रवार को जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने इस मांग पर सुनवाई की। सुनवाई के दौरान अदालत ने नेताओं के सार्वजनिक जीवन और विरोध प्रदर्शनों का सामना करने को लेकर कड़ी टिप्पणी की। पीठ ने कहा कि एक सांसद को विरोध या अंडे फेंके जाने के डर से जांच प्रक्रिया से बचने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। अदालत ने स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष का उदाहरण देते हुए भी टिप्पणी की।

CJP ने अदालत की टिप्पणी पर जताई आपत्ति

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी सामने आने के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने इसे न्यायिक जवाबदेही के मुद्दे से जोड़ दिया। पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके और सह-संयोजक सौरभ दास ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए अदालत की टिप्पणी पर सवाल उठाए। अभिजीत दीपके ने सवाल किया कि क्या सुप्रीम कोर्ट की अपेक्षा यह है कि हर व्यक्ति राजनीतिक गतिविधियों के दौरान हिंसा या हमले का सामना करे। उन्होंने कहा कि यदि संवैधानिक अदालत के न्यायाधीश विपक्षी नेताओं के खिलाफ इस तरह की टिप्पणी करते हैं तो आम नागरिकों के लिए क्या संदेश जाता है।

सौरभ दास ने भी उठाए न्यायिक आचरण पर सवाल

CJP के सह-संयोजक सौरभ दास ने भी एक्स पर प्रतिक्रिया देते हुए अदालत की टिप्पणी को लेकर नाराजगी जताई। उन्होंने सवाल किया कि क्या संवैधानिक अदालत के न्यायाधीशों से इस तरह की भाषा और व्यवहार की अपेक्षा की जानी चाहिए। दास ने अपने पोस्ट में न्यायिक जवाबदेही की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका जैसी संवैधानिक संस्था के फैसलों और टिप्पणियों को लेकर भी जवाबदेही की व्यवस्था पर चर्चा होनी चाहिए।

'अगर मोइत्रा को कुछ हुआ तो...' दास का बयान

सौरभ दास ने अपने बयान में पश्चिम बंगाल में राजनीतिक माहौल और महुआ मोइत्रा के खिलाफ हुए विरोध का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यदि भविष्य में मोइत्रा को किसी तरह का नुकसान होता है तो अदालत में हुई टिप्पणी को भी संदर्भ के तौर पर देखा जा सकता है। हालांकि, यह CJP नेता की राजनीतिक प्रतिक्रिया है और अदालत ने ऐसा कोई निष्कर्ष नहीं दिया है कि महुआ मोइत्रा को किसी खतरे की स्थिति में सुरक्षा उपलब्ध नहीं होगी या किसी घटना के लिए अदालत जिम्मेदार होगी।

क्या था महुआ मोइत्रा का पूरा मामला?

महुआ मोइत्रा के खिलाफ सोशल मीडिया पर किए गए पोस्ट को लेकर एक मामला दर्ज किया गया था। इसी मामले में जांच अधिकारी ने उन्हें पुलिस के सामने पेश होने के लिए कहा था। मोइत्रा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि पिछली बार उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुआ था और कथित तौर पर अंडे फेंके गए थे। ऐसे में पुलिस स्टेशन में व्यक्तिगत रूप से पेश होने के बजाय वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पूछताछ में शामिल होने की अनुमति दी जाए। वकील ने अदालत को बताया कि उन्हें आशंका है कि पुलिस स्टेशन जाने पर दोबारा विरोध या अप्रिय स्थिति पैदा हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने वर्चुअल पेशी की मांग नहीं मानी

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने वर्चुअल पेशी की मांग पर सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या सांसद होने के कारण उन्हें जांच अधिकारी के सामने व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने से छूट दी जानी चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि कलकत्ता हाईकोर्ट पहले ही उन्हें जांच में सहयोग करने का निर्देश दे चुका है। पीठ के रुख के बाद महुआ मोइत्रा के वकील ने याचिका वापस लेने का अनुरोध किया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को वापस ली गई मानते हुए खारिज कर दिया।

जस्टिस दीपांकर दत्ता का बंगाल से पुराना संबंध

इस मामले में जस्टिस दीपांकर दत्ता का पश्चिम बंगाल से पुराना न्यायिक संबंध भी चर्चा में है। वह पहले कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रह चुके हैं। इसके बाद उन्हें सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किया गया। महुआ मोइत्रा की याचिका पर अदालत के रुख के बाद अब इस मामले ने कानूनी दायरे से बाहर राजनीतिक बहस का रूप ले लिया है। एक तरफ अदालत ने जांच में सहयोग को प्राथमिकता दी है, वहीं CJP ने न्यायिक टिप्पणियों और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही को लेकर सवाल खड़े किए हैं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर चर्चा में रह सकता है।

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