रक्षा आत्मनिर्भरता की ओर बड़ा कदम: 1,000 किलोग्राम स्वदेशी हवाई बम विकसित करेगा भारत, मजबूत होगी वायुसेना

विकसित किए जाने वाले ये बम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित ‘एमके-84’ श्रेणी के बमों के समकक्ष होंगे। एमके-84 अपनी भारी विनाशक क्षमता के लिए जाना जाता है और इसे दुश्मन के मजबूत ठिकानों, बंकरों और सैन्य ढांचों को नष्ट करने के लिए उपयोग किया जाता है।

Update: 2026-04-05 06:52 GMT
नई दिल्ली : भारत ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को मजबूत करने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण पहल की है। रक्षा मंत्रालय ने भारतीय वायुसेना के लिए 1,000 किलोग्राम वजन वाले स्वदेशी हवाई बमों के डिजाइन और विकास की प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह परियोजना न केवल देश की सैन्य क्षमता को बढ़ाएगी, बल्कि विदेशी हथियारों पर निर्भरता कम करने की दिशा में भी अहम भूमिका निभाएगी।

एमके-84 श्रेणी के बराबर होगी क्षमता

सूत्रों के अनुसार, विकसित किए जाने वाले ये बम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित ‘एमके-84’ श्रेणी के बमों के समकक्ष होंगे। एमके-84 अपनी भारी विनाशक क्षमता के लिए जाना जाता है और इसे दुश्मन के मजबूत ठिकानों, बंकरों और सैन्य ढांचों को नष्ट करने के लिए उपयोग किया जाता है। भारत द्वारा इस स्तर के बमों का स्वदेशी विकास एक रणनीतिक उपलब्धि मानी जा रही है। वर्तमान में भारतीय वायुसेना इस श्रेणी के बमों को विदेशी आपूर्तिकर्ताओं से खरीदती है, जिससे न केवल लागत बढ़ती है बल्कि आपूर्ति पर बाहरी निर्भरता भी बनी रहती है।

रूसी और पश्चिमी विमानों में उपयोग की क्षमता

इस परियोजना की सबसे बड़ी विशेषता इसकी बहुमुखी उपयोगिता है। रक्षा अधिकारियों के अनुसार, इन 1,000 किलोग्राम के बमों को इस तरह डिजाइन किया जाएगा कि वे भारतीय वायुसेना के बेड़े में शामिल रूसी और पश्चिमी दोनों मूल के लड़ाकू विमानों के साथ संगत हों। इसका अर्थ है कि चाहे विमान सुखोई, मिग जैसे रूसी प्लेटफॉर्म हों या राफेल और अन्य पश्चिमी विमान सभी पर इन बमों का उपयोग संभव होगा। यह लचीलापन युद्ध के समय संचालन को अधिक प्रभावी और तेज बनाता है, क्योंकि अलग-अलग हथियार प्रणालियों की आवश्यकता कम हो जाती है।

‘मेक-टू’ मॉडल के तहत होगा विकास

यह परियोजना ‘मेक-टू’ श्रेणी के अंतर्गत संचालित की जाएगी, जिसमें उद्योग (खासकर निजी कंपनियां) विकास लागत का वहन करते हैं। इसके बाद जब उत्पाद तैयार हो जाता है, तो सरकार ‘बाय (इंडियन-आईडीडीएम)’ श्रेणी के तहत उसकी खरीद करती है। ‘आईडीडीएम’ (Indigenously Designed, Developed and Manufactured) का उद्देश्य पूरी तरह स्वदेशी डिजाइन और निर्माण को बढ़ावा देना है। यह मॉडल न केवल घरेलू उद्योग को प्रोत्साहित करता है, बल्कि तकनीकी आत्मनिर्भरता को भी मजबूत बनाता है।

600 बमों की खरीद का लक्ष्य

रक्षा मंत्रालय की योजना के अनुसार, इस परियोजना के तहत कुल 600 उच्च क्षमता वाले हवाई बमों की खरीद की जाएगी। ये ‘हाई-कैलिबर म्यूनिशन’ होंगे, जो दुश्मन के महत्वपूर्ण ठिकानों पर सटीक और शक्तिशाली हमले करने में सक्षम होंगे। इन बमों का उपयोग विशेष रूप से सामरिक लक्ष्यों जैसे सैन्य अड्डों, बंकरों, रनवे और हथियार डिपो को नष्ट करने के लिए किया जा सकेगा। इससे भारतीय वायुसेना की मारक क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

ढाई साल में प्रोटोटाइप तैयार करने की योजना

परियोजना को दो प्रमुख चरणों में विभाजित किया गया है। पहले चरण में छह प्रोटोटाइप विकसित किए जाएंगे। इस दौरान यह सुनिश्चित किया जाएगा कि कम से कम 50 प्रतिशत सामग्री और तकनीक स्वदेशी हो। रक्षा अधिकारियों का अनुमान है कि एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) जारी होने से लेकर अंतिम अनुबंध पर हस्ताक्षर तक लगभग ढाई वर्षों का समय लगेगा। इस अवधि में डिजाइन, विकास, परीक्षण और उपयोगकर्ता मूल्यांकन की पूरी प्रक्रिया पूरी की जाएगी।

वायुसेना की सक्रिय भूमिका

भारतीय वायुसेना इस परियोजना में केवल उपयोगकर्ता की भूमिका में नहीं रहेगी, बल्कि विकास प्रक्रिया की निगरानी और तकनीकी मार्गदर्शन भी करेगी। इससे यह सुनिश्चित होगा कि तैयार उत्पाद वायुसेना की वास्तविक परिचालन आवश्यकताओं को पूरा करता हो। वायुसेना की भागीदारी से परीक्षण और मूल्यांकन प्रक्रिया अधिक व्यावहारिक और प्रभावी होगी, जिससे भविष्य में बड़े पैमाने पर इन बमों को शामिल करना आसान होगा।

निजी क्षेत्र के लिए अवसर

यह परियोजना भारतीय निजी क्षेत्र के लिए भी बड़े अवसर लेकर आई है। घरेलू कंपनियां इस विकास कार्यक्रम में भाग ले सकती हैं और जरूरत पड़ने पर विदेशी कंपनियों के साथ तकनीकी सहयोग भी कर सकती हैं। हालांकि, इसमें एक महत्वपूर्ण शर्त यह है कि डिजाइन और निर्माण का मूल ढांचा स्वदेशी होना चाहिए। इससे भारत में रक्षा विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूती मिलेगी और नई तकनीकों का विकास होगा।

रक्षा विनिर्माण में भारत की स्थिति मजबूत होगी

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की परियोजनाएं भारत को वैश्विक रक्षा विनिर्माण हब के रूप में स्थापित करने में मदद करेंगी। स्वदेशी हथियार प्रणालियों के विकास से न केवल घरेलू जरूरतें पूरी होंगी, बल्कि भविष्य में निर्यात के अवसर भी बढ़ेंगे। इसके अलावा, इससे रोजगार सृजन, तकनीकी नवाचार और औद्योगिक विकास को भी बढ़ावा मिलेगा।

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