काछन देवी बनी बालिका ने दी दशहरा मनाने की अनुमति

छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध बस्तर दशहरा को विधिवत व प्रतिकात्मक रूप से मनाने की अनुमति काछन गादी देवी ने काछनगुड़ी में राज परिवार को दी है।;

Update: 2019-09-29 14:34 GMT

जगदलपुर । छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध बस्तर दशहरा को विधिवत व प्रतिकात्मक रूप से मनाने की अनुमति काछन गादी देवी ने काछनगुड़ी में राज परिवार को दी है।

इस विधान के साक्षी होने कल शनिवार को बड़ी संख्या में लोग भंगाराम चौक स्थित काछनगुड़ी मंदिर पहुंचे थे। काछनदेवी के रूप में मारेंगा की अबोध बालिका अनुराधा दास बेल कांटों से बने झुले में सवार होकर बस्तर महाराज कमलचंद्र भंजदेव को बस्तर दशहरा धूमधाम से मनाने का आर्शीवाद दिया। जिसके बाद लोगों ने बस्तर दहशरा की बधाई दी।

हर साल पथरागुड़ा जाने वाले मार्ग स्थित भंगाराम चौक के समीप स्थित काछनगुड़ी में काछनगादी विधान संपन्न कराया जाता है। बस्तर दशहरा की शुरूवात काछन देवी की अनुमति के बगैर नहीं हो सकती। इसलिए राज परिवार से महाराज कमलचंद्र भंजदेव काछन देवी से बस्तर दशहरा को विधिवत और हर्षोउल्लास से मनाए जाने हेतु शनिवार की शाम काछन गुड़ी मंदिर पहुंचे थे। उनके साथ जुलुस में बड़ी संख्या में अनुयायी भी शामिल हुए।

दंतेश्वरी मंदिर के प्रधान पुजारी ने राज परिवार की ओर से कार्यक्रम की अगुवाई की। काछनगुड़ी पहुंचने के बाद बस्तर महाराजा कमलचंद्र भंजदेव ने प्रतिवर्ष की भांति काछनदेवी से बस्तर दशहरा मनाने की अनुमति ली। काछनगुड़ी रस्म में काछनदेवी कांटों के झूले में सवार होकर महाराजा को बस्तर दशहरा बनाने की अनुमति देती है।

यह रस्म 700 सालों से चली आ रही है। देवी अगर अनुमति नही देती है तो उस वर्ष बस्तर में दशहरा नही मनाया जाता। काछन देवी को कांटो के झूले में झुलाया जाता है जो बेल के होते है। विधिविधान के साथ राजा उनसे पर्व मनाने की अनुमति लेते है। बस्तर के दशहरा पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। यहां रावण का दहन नही होता। बस्तर के आदिवासी दुमंजिला रथ का परिचालन कर राज परिवार के साथ पर्व मनाते है।

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