जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पेश हुआ कश्मीरी पंडित पुनर्एकीकरण विधेयक 2026
जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के विधायक आगा सैयद मुंतजिर मेहदी ने एक निजी सदस्य विधेयक प्रस्तुत किया है
पीडीपी विधायक मुंतज़िर मेहदी की पहल – विस्थापितों की सुरक्षित और सम्मानजनक वापसी का प्रस्ताव
- नया आयोग बनेगा पुनर्एकीकरण का आधार, सामाजिक-सांस्कृतिक समावेशन पर जोर
- विधेयक में मानसिक स्वास्थ्य, सांस्कृतिक बहाली और स्थायी आजीविका पर विशेष ध्यान
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के विधायक आगा सैयद मुंतजिर मेहदी ने एक निजी सदस्य विधेयक प्रस्तुत किया है जिसमें कश्मीरी पंडितों और अन्य विस्थापित समुदायों के पुनर्एकीकरण के लिए एक व्यापक कानूनी संरचना तैयार करने की मांग की गई है।
बडगाम के विधायक मुंतज़िर द्वारा पेश किए गए इस विधेयक का शीर्षक "कश्मीरी पंडित एवं प्रवासी पुनर्एकीकरण विधेयक, 2026" है। इसमें 1989-90 में उग्रवाद के कारण विस्थापित हुए प्रवासियों की सुरक्षित, स्वैच्छिक एवं सम्मानजनक वापसी को सुगम बनाने के लिए एक वैधानिक जम्मू-कश्मीर पुनर्एकीकरण आयोग की स्थापना की मांग की गई है।
विधेयक के अनुसार आयोग पुनर्एकीकरण नीतियों की देखरेख करने, सुलह बढ़ाने देने और विस्थापित समुदायों, विशेष रूप से कश्मीरी पंडितों के दीर्घकालिक सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक समावेशन को सुनिश्चित करने के लिए एक स्थायी संस्थागत तंत्र के रूप में कार्य करेगा।
इस विधेयक में पुनर्एकीकरण को एक स्वैच्छिक, सुरक्षित, गरिमामय एवं सतत प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसमें भौतिक पुनर्वास, सामाजिक स्वीकृति, सांस्कृतिक बहाली, मनोवैज्ञानिक उपचार और आर्थिक भागीदारी शामिल है। इसमें कश्मीरी पंडितों, प्रवासी कश्मीरी समुदाय, कश्मीरी मुस्लिम नागरिक समाज, संघर्ष समाधान विशेषज्ञ और सरकारी अधिकारियों को आयोग में प्रतिनिधित्व देने का भी प्रस्ताव है।
प्रस्तावित निकाय के प्रमुख दायित्वों में अंतर-सामुदायिक संवाद को सुगम बनाना, आघात-उपचार एवं मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों को डिजाइन करना, अल्पसंख्यक सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण करना और वास्तविक जीवन के अनुभवों का दस्तावेजीकरण तथा सुलह प्रयासों जैसी पहलों का समर्थन करना शामिल है। विधेयक का उद्देश्य राहत वाले मौजूदा दृष्टिकोण को दीर्घकालिक पुनर्एकीकरण संरचना में परिवर्तित करना है। इसमें राहत एवं पुनर्वास विभाग का पुनर्गठन करके उसे पुनर्एकीकरण आयोग बनाने का प्रस्ताव है, जिसके अंतर्गत सभी परिसंपत्तियों, कर्मचारियों और योजनाओं को मौजूदा लाभों को जारी रखते हुए नए निकाय को हस्तांतरित किया जाएगा।
इस विधेयक में विश्वास निर्माण, सांस्कृतिक पुनर्स्थापना, स्थायी आजीविका और सुरक्षा एवं समानता की संस्थागत गारंटी पर केंद्रित मध्यम एवं दीर्घकालिक रणनीतियों की रूपरेखा भी प्रदान की गई है। विधेयक में इस बात पर बल दिया गया है कि 1980 के दशक अंत और 1990 के दशक के प्रारंभ में कश्मीरी पंडितों के विस्थापन से न केवल क्षेत्रीय विस्थापन हुआ बल्कि सदियों पुराने सामाजिक एवं सांस्कृतिक बंधन भी टूट गए, जिसके लिए एक संरचित और सुलह-उन्मुख प्रतिक्रिया की आवश्यकता है।
विधेयक में कहा गया है कि केवल राहत प्रदान करने वाली व्यवस्था के लंबे समय तक जारी रहने से समय के साथ निर्भरता, अलगाव और कठोर सामाजिक अलगाव उत्पन्न हुआ है लेकिन इससे गरिमा, स्वायत्तता या साझा भविष्य की प्राप्ति नहीं हुई है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, उग्रवाद भड़कने के बाद घाटी में 62,000 से अधिक परिवार अपना घर छोड़कर चले गए जिनमें अधिकांश कश्मीरी पंडित थे। इनमें से लगभग 40,000 परिवार जम्मू में बसे हुए हैं जबकि लगभग 20,000 परिवार दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में रहते हैं।
जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा 2010 में विधानसभा में प्रस्तुत आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, तीन दशकों में 219 कश्मीरी पंडितों की हत्या हुई है।