11 साल बाद अमेरिका पहुंचे चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग... प्रोटोकॉल तोड़ खुद एयरपोर्ट लेने पहुंचे ट्रंप

ट्रंप और शी जिनपिंग की बातचीत में व्यापार और टैरिफ प्रमुख मुद्दों में शामिल रह सकते हैं। पिछले कुछ समय से अमेरिका और चीन के बीच टैरिफ को लेकर तनाव बना हुआ है। दोनों देशों ने एक-दूसरे के उत्पादों पर अतिरिक्त शुल्क लगाए हैं, जिसका असर द्विपक्षीय व्यापार के साथ वैश्विक सप्लाई चेन पर भी पड़ा है।;

Update: 2026-09-24 00:59 GMT

वॉशिंगटन: चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग करीब 11 साल बाद अपनी पत्नी पेंग लियुआन के साथ अमेरिका पहुंचे हैं। तीन दिवसीय दौरे पर पहुंचे चीनी राष्ट्रपति का अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने परंपरागत प्रोटोकॉल से अलग अंदाज में स्वागत किया। ट्रंप खुद मैरीलैंड स्थित ज्वाइंट बेस एंड्रयूज पहुंचे और वहां शी जिनपिंग तथा पेंग लियुआन की अगवानी की। किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष के स्वागत के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति का सीधे एयरबेस पहुंचना सामान्य प्रोटोकॉल का हिस्सा नहीं माना जाता, इसलिए इस मुलाकात ने शुरुआत से ही ध्यान खींचा है। शी जिनपिंग का यह दौरा ऐसे समय हो रहा है, जब दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापार और टैरिफ से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रूस से ऊर्जा खरीद और ताइवान तक कई संवेदनशील मुद्दे मौजूद हैं। ऐसे में ट्रंप और शी की आमने-सामने की बातचीत को दोनों देशों के रिश्तों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

एयरबेस पर ट्रंप और मेलानिया ने किया स्वागत

शी जिनपिंग के विमान के एंड्रयूज एयरबेस पहुंचने पर राष्ट्रपति ट्रंप अपनी पत्नी और अमेरिका की फर्स्ट लेडी मेलानिया ट्रंप के साथ वहां मौजूद रहे। दोनों नेताओं के बीच मुलाकात के दौरान औपचारिक स्वागत कार्यक्रम हुआ। ट्रंप ने मीडिया से बातचीत में कहा कि चीनी राष्ट्रपति के सम्मान में आयोजित होने वाले स्टेट डिनर में कारोबारी, बैंकिंग और तकनीकी क्षेत्र से जुड़े कई प्रमुख लोग शामिल होंगे। उन्होंने कहा कि इस आयोजन में बड़ी संख्या में लोगों की दिलचस्पी है। ट्रंप ने शी के स्वागत को लेकर सकारात्मक टिप्पणी करते हुए एयरबेस की लोकेशन का भी जिक्र किया। ईरान के मुद्दे पर शी से होने वाली बातचीत से जुड़े सवाल पर उन्होंने कहा कि वह इस विषय समेत कई दूसरे मुद्दों पर चीनी राष्ट्रपति के साथ चर्चा करेंगे।

व्हाइट हाउस में होगा स्टेट डिनर

शी जिनपिंग के सम्मान में व्हाइट हाउस में राजकीय भोज का आयोजन किया जाना है। इस कार्यक्रम में अमेरिका के राजनीतिक और कारोबारी जगत के अलावा टेक्नोलॉजी सेक्टर की प्रमुख हस्तियों के शामिल होने की उम्मीद जताई जा रही है। एनवीडिया के सीईओ जेन्सेन हुआंग और स्पेसएक्स के एलन मस्क जैसे नामों का भी उल्लेख किया गया है। दौरे के दौरान दोनों नेताओं की द्विपक्षीय बैठक भी प्रस्तावित है। इसके अलावा शी जिनपिंग के शुक्रवार को नेशनल आर्काइव्स जाने का कार्यक्रम बताया गया है। हालांकि, यात्रा के अलग-अलग कार्यक्रमों में बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

ट्रेड और टैरिफ पर सबसे ज्यादा नजर

ट्रंप और शी जिनपिंग की बातचीत में व्यापार और टैरिफ प्रमुख मुद्दों में शामिल रह सकते हैं। पिछले कुछ समय से अमेरिका और चीन के बीच टैरिफ को लेकर तनाव बना हुआ है। दोनों देशों ने एक-दूसरे के उत्पादों पर अतिरिक्त शुल्क लगाए हैं, जिसका असर द्विपक्षीय व्यापार के साथ वैश्विक सप्लाई चेन पर भी पड़ा है। अब बातचीत का एक अहम हिस्सा टैरिफ को कम रखने और व्यापारिक संबंधों को स्थिर करने से जुड़ा हो सकता है। दोनों पक्षों के बीच कुछ उत्पादों पर शुल्क घटाने और ऊर्जा तथा कृषि उत्पादों के व्यापार को लेकर भी चर्चा की संभावना है। टैरिफ से जुड़ी मौजूदा व्यवस्था की समयसीमा भी इस बातचीत को महत्वपूर्ण बनाती है। ऐसे में दोनों देशों के बीच आगे की व्यापार नीति को लेकर किसी समझ या अस्थायी व्यवस्था पर नजर रहेगी।

रूस से तेल खरीद पर अमेरिका का दबाव

रूस से चीन की ऊर्जा खरीद भी ट्रंप-शी वार्ता का संवेदनशील विषय बन सकती है। अमेरिका लंबे समय से रूस की ऊर्जा आय को सीमित करने के लिए उस पर दबाव बढ़ाने की कोशिश करता रहा है। ट्रंप प्रशासन की ओर से रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने की चेतावनी भी दी गई है। चीन रूस से बड़ी मात्रा में ऊर्जा खरीदता है और मॉस्को के साथ अपने आर्थिक संबंधों में तीसरे देशों के हस्तक्षेप का विरोध करता रहा है। ऐसे में रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिकी नीति और चीन की प्रतिक्रिया दोनों नेताओं के बीच चर्चा का हिस्सा बन सकती हैं।

ताइवान पर दोनों देशों की अलग-अलग नीति

ताइवान लंबे समय से अमेरिका और चीन के संबंधों का सबसे संवेदनशील भू-राजनीतिक मुद्दा रहा है। चीन ताइवान को अपने क्षेत्र का हिस्सा मानता है, जबकि अमेरिका ताइवान को सुरक्षा और सैन्य सहयोग उपलब्ध कराता रहा है। बीजिंग चाहता है कि वॉशिंगटन ताइवान के मामले में चीन की स्थिति का सम्मान करे और द्वीप को सैन्य समर्थन देने से दूरी बनाए। दूसरी ओर, अमेरिका ताइवान के साथ अपने संबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा नीति को बनाए रखना चाहता है। ताइवान का महत्व केवल सुरक्षा के लिहाज से ही नहीं है। यह क्षेत्र वैश्विक सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन में भी महत्वपूर्ण भूमिका रखता है। इसलिए दोनों नेताओं की बातचीत में ताइवान से जुड़े मुद्दे पर किसी बड़े समझौते की संभावना पर भी नजर रहेगी, हालांकि उपलब्ध जानकारी के आधार पर किसी निश्चित समझौते का दावा नहीं किया जा सकता।

AI और चिप टेक्नोलॉजी पर नई बातचीत

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा का एक प्रमुख क्षेत्र बन चुका है। अमेरिका को चिंता है कि अत्याधुनिक AI तकनीक और चिप्स का इस्तेमाल चीन की सैन्य या रणनीतिक क्षमता बढ़ाने में हो सकता है। इसी वजह से अमेरिका ने चीन को उन्नत सेमीकंडक्टर और कुछ AI तकनीकों की आपूर्ति पर प्रतिबंध और निर्यात नियंत्रण लगाए हैं। चीन इन प्रतिबंधों का विरोध करता रहा है और इन्हें तकनीकी तथा कारोबारी प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करने वाला कदम बताता है। बताया गया है कि न्यूयॉर्क में हुई पिछली बातचीत के दौरान दोनों देशों ने AI से संबंधित अलग संवाद की दिशा में आगे बढ़ने पर सहमति जताई थी। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े AI जोखिमों और तकनीकी सुरक्षा को लेकर सूचनाओं के आदान-प्रदान का प्रस्ताव भी चर्चा में रहा है।

ईरान और पश्चिम एशिया भी बातचीत में शामिल

अमेरिका और चीन के बीच बातचीत का दायरा केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं रह सकता। ईरान और पश्चिम एशिया की स्थिति भी चर्चा का हिस्सा बन सकती है। ट्रंप से जब ईरान के मुद्दे पर शी से बातचीत को लेकर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि वह इस विषय पर बात करेंगे। चीन पश्चिम एशिया में एक महत्वपूर्ण आर्थिक और कूटनीतिक भूमिका रखता है। इसलिए अमेरिका की क्षेत्रीय नीति और चीन के रुख के बीच किसी तरह के समन्वय या मतभेद पर भी नजर रहेगी।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है ट्रंप-शी संवाद?

अमेरिका और चीन के रिश्तों में बदलाव का असर भारत सहित वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। अगर दोनों देशों के बीच टैरिफ कम होते हैं और व्यापारिक तनाव घटता है, तो वैश्विक कंपनियों की सप्लाई चेन रणनीति प्रभावित हो सकती है। वहीं, यदि तकनीकी प्रतिबंध और व्यापारिक प्रतिस्पर्धा बढ़ती है, तो सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स और AI से जुड़ी वैश्विक आपूर्ति पर असर पड़ सकता है। रूसी तेल भी भारत के लिए महत्वपूर्ण पहलू है। भारत भी रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है। इसलिए रूस की ऊर्जा बिक्री पर अमेरिकी दबाव की दिशा में होने वाला कोई बदलाव भारतीय ऊर्जा आयात और व्यापारिक गणित को प्रभावित कर सकता है।

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