भारत-EU की डील अमेरिका की नाराजगी, यूरोप के रुख को बताया ‘निराशाजनक’

स्कॉट बेसेंट ने इंटरव्यू में कहा, “वे जो अपने लिए बेहतर समझें, वही करें, लेकिन मैं कहना चाहूंगा कि यूरोपीय देशों का रुख बहुत निराश करने वाला है, क्योंकि वे यूक्रेन-रूस युद्ध में अग्रिम मोर्चे पर हैं।” उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत और ईयू ने नई दिल्ली में एक व्यापक मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं।

Update: 2026-01-30 06:04 GMT
वॉशिंगटन/नई दिल्ली। भारत और यूरोपीय यूनियन (ईयू) के बीच हाल ही में हुए मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर अमेरिका ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। अमेरिकी प्रशासन ने इस समझौते को लेकर असंतोष जताते हुए कहा है कि यूरोपीय देशों का रुख “बेहद निराशाजनक” है, क्योंकि वे रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर भारत के खिलाफ सख्त टैरिफ लगाने में वाशिंगटन का साथ नहीं दे रहे हैं। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने बुधवार को सीएनबीसी को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि यूरोपीय देश अपने व्यापारिक हितों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जबकि वे यूक्रेन-रूस युद्ध में अग्रिम मोर्चे पर होने का दावा करते हैं।

‘यूरोप का रुख समझ से परे’ : बेसेंट

स्कॉट बेसेंट ने इंटरव्यू में कहा, “वे जो अपने लिए बेहतर समझें, वही करें, लेकिन मैं कहना चाहूंगा कि यूरोपीय देशों का रुख बहुत निराश करने वाला है, क्योंकि वे यूक्रेन-रूस युद्ध में अग्रिम मोर्चे पर हैं।” उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत और ईयू ने नई दिल्ली में एक व्यापक मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते के तहत दोनों पक्षों ने व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने, शुल्क कम करने और बाजार पहुंच आसान बनाने पर सहमति जताई है। बेसेंट से जब पूछा गया कि क्या भारत-ईयू एफटीए अमेरिका के लिए चुनौती है, क्योंकि यह समझौता वाशिंगटन की सहमति के बिना आगे बढ़ाया गया, तो उन्होंने संकेत दिया कि इससे अमेरिका की रणनीतिक कोशिशों को झटका लगा है।

रूसी तेल को लेकर यूरोप पर निशाना

अमेरिकी वित्त मंत्री ने विशेष रूप से रूस से तेल खरीद के मुद्दे को उठाया। उन्होंने कहा, “भारत ने प्रतिबंधित रूसी तेल खरीदना शुरू किया था और अनुमान लगाइए कि परिष्कृत उत्पाद कौन खरीद रहा था? यूरोपीय देश।” उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह यूरोपीय देश अप्रत्यक्ष रूप से उसी युद्ध को वित्तपोषित कर रहे हैं, जिसका वे सार्वजनिक रूप से विरोध करते हैं। बेसेंट ने कहा, “यूरोपीय देश अपने ही खिलाफ युद्ध को फंडिंग कर रहे हैं और यह कुछ ऐसा है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।” अमेरिका लंबे समय से रूस के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंधों को सख्ती से लागू करने की वकालत करता रहा है। वाशिंगटन का मानना है कि रूस की ऊर्जा बिक्री उसके युद्ध प्रयासों के लिए महत्वपूर्ण वित्तीय स्रोत है।

भारत पर टैरिफ और प्रतिबंध का जिक्र

बेसेंट ने यह भी कहा कि अमेरिका ने भारत पर रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर प्रतिबंध और 25 प्रतिशत तक का टैरिफ लगाया था। उनका कहना था कि यूरोपीय देश इस नीति का समर्थन करने को तैयार नहीं हैं। उन्होंने कहा, “जब भी आप किसी यूरोपीय को यूक्रेन के लोगों का हिमायती बनते देखें तो याद रखें कि उन्होंने व्यापार को यूक्रेन के लोगों से ऊपर रखा। यूरोपीय व्यापार यूक्रेन में युद्ध खत्म करने से ज्यादा महत्वपूर्ण है।” यह बयान अमेरिका और यूरोप के बीच बढ़ते रणनीतिक मतभेदों को उजागर करता है, खासकर ऊर्जा और व्यापार नीति के सवाल पर।

ऊर्जा जरूरत बनाम प्रतिबंध नीति

जब उनसे पूछा गया कि क्या यूरोपीय देशों की ऊर्जा जरूरतें उनकी नीतियों को प्रभावित कर रही हैं, तो बेसेंट ने कहा, “वे सस्ती ऊर्जा चाहते हैं, लेकिन अगर हम प्रतिबंधित रूसी तेल खरीदने को तैयार होते तो हमें भी सस्ती ऊर्जा मिल सकती थी।” यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के बाद यूरोप को ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ा था। रूस से गैस आपूर्ति घटने के बाद कई यूरोपीय देशों ने वैकल्पिक स्रोतों की तलाश की। इसी दौरान भारत ने रियायती दरों पर रूसी कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई और उसे परिष्कृत कर वैश्विक बाजारों, जिनमें यूरोप भी शामिल है, को निर्यात किया। अमेरिका का तर्क है कि इस प्रक्रिया ने रूस को आर्थिक लाभ पहुंचाया, जबकि यूरोपीय देश सार्वजनिक रूप से रूस के खिलाफ सख्त रुख अपनाने की बात करते रहे।

नई दिल्ली में हुआ था समझौते पर हस्ताक्षर

भारत और ईयू के बीच एफटीए पर हस्ताक्षर मंगलवार को नई दिल्ली में हुए थे। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वान डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा मौजूद थे। दोनों पक्षों ने इस समझौते को ऐतिहासिक बताया और कहा कि इससे व्यापार, निवेश, तकनीकी सहयोग और आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूती मिलेगी। यह समझौता ऐसे समय आया है जब वैश्विक व्यापार पर भू-राजनीतिक तनावों का प्रभाव बढ़ रहा है।

ट्रांस-अटलांटिक संबंधों में दरार?

अमेरिका की ताजा टिप्पणी से संकेत मिलता है कि भारत-ईयू एफटीए को केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से भी देखा जा रहा है। वाशिंगटन चाहता है कि उसके सहयोगी रूस के खिलाफ एकजुट रुख अपनाएं, जबकि यूरोप अपने आर्थिक हितों और ऊर्जा सुरक्षा को भी ध्यान में रख रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद ट्रांस-अटलांटिक संबंधों में बढ़ती जटिलताओं को दर्शाता है। यूक्रेन युद्ध के मुद्दे पर सार्वजनिक एकजुटता के बावजूद, ऊर्जा और व्यापार जैसे मामलों में मतभेद सामने आ रहे हैं।

अंतरराष्ट्रीय बहस का विषय

भारत-ईयू एफटीए से जहां दोनों पक्षों को आर्थिक लाभ की उम्मीद है, वहीं अमेरिका की प्रतिक्रिया ने इस समझौते को अंतरराष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि क्या अमेरिका यूरोप पर रूस से जुड़े प्रतिबंधों को लेकर और दबाव बनाता है या फिर व्यापारिक हित कूटनीतिक प्राथमिकताओं पर भारी पड़ते हैं। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि यूक्रेन युद्ध की पृष्ठभूमि में वैश्विक व्यापार समझौते अब केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक और राजनीतिक महत्व भी रखते हैं।

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