ट्रंप की ग्रीनलैंड की दावेदारी से जानें चीन क्‍यों नाराज है लेकिन रूस है खुश?

रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने संकेतों में ट्रंप के दावे का समर्थन करते हुए कहा है कि ग्रीनलैंड प्राकृतिक रूप से डेनमार्क का हिस्सा नहीं है और उपनिवेश काल से ही इसके स्वामित्व को लेकर सवाल उठते रहे हैं।

Update: 2026-01-20 23:31 GMT
मास्को/वॉशिंगटन। ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आक्रामक रुख के बीच अब रूस के बयान ने इस वैश्विक विवाद को और जटिल बना दिया है। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने संकेतों में ट्रंप के दावे का समर्थन करते हुए कहा है कि ग्रीनलैंड प्राकृतिक रूप से डेनमार्क का हिस्सा नहीं है और उपनिवेश काल से ही इसके स्वामित्व को लेकर सवाल उठते रहे हैं। रूस के इस बयान को अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक अहम घटनाक्रम माना जा रहा है, क्योंकि यह ऐसे समय आया है जब अमेरिका, यूरोप और चीन के बीच ग्रीनलैंड को लेकर तनातनी बढ़ती जा रही है। वहीं चीन के विदेश मंत्रालय ने अमेरिका से कहा है कि वह अपने हित साधने के लिए तथाकथित ‘चीनी खतरे’ को बहाने के तौर पर इस्तेमाल करना बंद करे।

ट्रंप का तर्क: सुरक्षा के लिए जरूरी है नियंत्रण

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार यह तर्क देते रहे हैं कि ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण राष्ट्रीय और वैश्विक सुरक्षा के लिहाज से बेहद जरूरी है। उनका दावा है कि अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर अपनी पकड़ मजबूत नहीं की, तो रूस और चीन वहां सैन्य और रणनीतिक रूप से अपनी मौजूदगी बढ़ा सकते हैं। ट्रंप ने हाल ही में कहा था कि ग्रीनलैंड क्षेत्र में रूसी विध्वंसक लड़ाकू विमान और पनडुब्बियां मौजूद हैं, जबकि चीन भी वहां अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। ट्रंप के अनुसार, आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती गतिविधियां अमेरिका की सुरक्षा के लिए सीधी चुनौती हैं।

रूस का बयान: डेनमार्क का प्राकृतिक हिस्सा नहीं

मास्को में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने कहा कि रूस की ग्रीनलैंड में कोई दिलचस्पी नहीं है और यह बात वाशिंगटन भी अच्छी तरह जानता है। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि वास्तविकता यह है कि ग्रीनलैंड न तो प्राकृतिक रूप से डेनमार्क का हिस्सा है और न ही नार्वे का। लावरोव ने कहा, "ग्रीनलैंड उपनिवेश काल से ही एक विवादित इलाका रहा है। इसके स्वामित्व को लेकर ऐतिहासिक रूप से सवाल उठते रहे हैं।" उनके इस बयान को ट्रंप के दावे के समर्थन के रूप में देखा जा रहा है, भले ही रूस ने सीधे तौर पर अमेरिकी नियंत्रण का समर्थन न किया हो।

उपनिवेशवाद पर टिप्पणी और ब्रिटेन पर तंज

लावरोव ने अपने बयान में उपनिवेश काल के अवशेषों के खात्मे की बात करते हुए ब्रिटेन पर भी कटाक्ष किया। उन्होंने कहा कि वह दिन ज्यादा दूर नहीं जब ब्रिटेन को "ग्रेट ब्रिटेन" कहा जाना बंद हो जाएगा। उल्लेखनीय है कि ब्रिटेन दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जिसके नाम के आगे ‘ग्रेट’ शब्द जुड़ा हुआ है। रूसी विदेश मंत्री का यह बयान उस व्यापक बहस की ओर इशारा करता है, जिसमें पुराने उपनिवेशवादी ढांचे और मौजूदा वैश्विक व्यवस्था पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

यूरोप का विरोध और सैन्य एकजुटता

ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की धमकियों और दावों का डेनमार्क और उसके यूरोपीय सहयोगियों ने कड़ा विरोध किया है। फ्रांस, ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देशों ने एकजुटता दिखाते हुए सांकेतिक रूप से ग्रीनलैंड क्षेत्र में अपने सैनिकों की तैनाती भी की है। यूरोपीय देशों का कहना है कि ग्रीनलैंड डेनमार्क का अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र है और उसके भविष्य पर कोई भी फैसला अंतरराष्ट्रीय कानून और स्थानीय आबादी की इच्छा के अनुसार होना चाहिए।

टैरिफ की धमकी से बढ़ा तनाव

यूरोप के विरोध से नाराज ट्रंप ने उन देशों के उत्पादों पर आयात शुल्क यानी टैरिफ बढ़ाने की घोषणा कर दी है, जो उनके ग्रीनलैंड प्लान का विरोध कर रहे हैं। इस कदम से अमेरिका और यूरोप के बीच पहले से मौजूद व्यापारिक तनाव और गहराने की आशंका है। विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रीनलैंड का मुद्दा अब केवल भू-राजनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह वैश्विक व्यापार और आर्थिक संबंधों को भी प्रभावित कर सकता है।

चीन की कड़ी प्रतिक्रिया

ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की धमकियों पर चीन ने भी सख्त प्रतिक्रिया दी है। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने प्रेस ब्रीफिंग में कहा, "संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय कानून मौजूदा वैश्विक व्यवस्था की बुनियाद हैं और इन्हें बनाए रखा जाना चाहिए।"

आर्कटिक में वर्चस्व की कोशिश

चीनी सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने 12 जनवरी को प्रकाशित अपने एक संपादकीय में अमेरिका और यूरोप के बयानों की कड़ी आलोचना की। अखबार ने चीन को ‘खतरा’, ‘संसाधनों का लुटेरा’ या ‘नियम तोड़ने वाला’ बताने के आरोपों को खारिज किया। संपादकीय में कहा गया कि ऐसे बयान दशकों से आर्कटिक क्षेत्र की जलवायु के संरक्षण में चीन की सक्रिय भूमिका को नजरअंदाज करते हैं। लेख में यह भी तर्क दिया गया कि अमेरिका चीन को आर्कटिक के लिए खतरे के रूप में पेश कर रहा है, ताकि उसकी आड़ में वह क्षेत्र में अपने सैन्य विस्तार, एकतरफा संसाधन दोहन और वर्चस्व की कोशिशों को छिपा सके।

ग्रीनलैंड क्यों है इतना अहम?

विशेषज्ञों के अनुसार ग्रीनलैंड रणनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टियों से बेहद महत्वपूर्ण है। आर्कटिक क्षेत्र में स्थित यह द्वीप प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है और जलवायु परिवर्तन के चलते यहां नए समुद्री मार्ग खुलने की संभावना भी बढ़ रही है। इसी वजह से अमेरिका, यूरोप, रूस और चीन सभी की नजरें इस क्षेत्र पर टिकी हुई हैं।

वैश्विक राजनीति में नया मोड़

ग्रीनलैंड को लेकर रूस के ताजा बयान और चीन की प्रतिक्रिया ने यह साफ कर दिया है कि यह मुद्दा आने वाले समय में वैश्विक राजनीति का एक बड़ा केंद्र बनने वाला है। जहां अमेरिका इसे सुरक्षा का सवाल बता रहा है, वहीं यूरोप अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता की बात कर रहा है। रूस और चीन अपने-अपने तर्कों के साथ इस बहस को और व्यापक बना रहे हैं। राजनयिक हलकों में माना जा रहा है कि ग्रीनलैंड विवाद आने वाले महीनों में अमेरिका-यूरोप संबंधों, नाटो की एकता और आर्कटिक क्षेत्र की राजनीति को गहराई से प्रभावित करेगा।

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