ईरान में महंगाई के खिलाफ उग्र आंदोलन: 100 से अधिक शहरों में हिंसा, 538 मौतें; अमेरिका-यूरोप की नजर
प्रदर्शनकारियों ने कई शहरों में सरकारी इमारतों, बैंकों और सुरक्षा प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया। जवाब में सुरक्षाबलों ने भी कड़ी कार्रवाई की, जिसके चलते हालात लगातार बेकाबू होते चले गए।
तेहरान। ईरान में पिछले दो हफ्तों से जारी महंगाई विरोधी आंदोलन अब अभूतपूर्व हिंसा और राजनीतिक उथल-पुथल में बदल चुका है। सरकार की सख्त चेतावनियों के बावजूद शनिवार और रविवार को बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरे और साफ संदेश दे दिया कि वे पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। राजधानी तेहरान सहित देश के 100 से ज्यादा शहरों में प्रदर्शन, फायरिंग, तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाएं सामने आई हैं। इन झड़पों में अब तक 538 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है, जिनमें करीब 200 सुरक्षाकर्मी शामिल बताए जा रहे हैं। केवल इस्फहान क्षेत्र में ही 30 सुरक्षाकर्मियों के मारे जाने की खबर है।
महंगाई से शुरू हुआ आंदोलन, सत्ता विरोध में बदला
ईरान में यह आंदोलन मूल रूप से बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और जीवनयापन की लागत में तेज वृद्धि के खिलाफ शुरू हुआ था। खाद्य पदार्थों, ईंधन और जरूरी वस्तुओं की कीमतों में भारी इजाफे ने आम लोगों की कमर तोड़ दी है। शुरुआत में ये प्रदर्शन शांतिपूर्ण थे, लेकिन धीरे-धीरे इनमें हिंसा घुसपैठ कर गई और अब यह आंदोलन सीधे इस्लामिक सत्ता व्यवस्था के खिलाफ चुनौती बन गया है। प्रदर्शनकारियों ने कई शहरों में सरकारी इमारतों, बैंकों और सुरक्षा प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया। जवाब में सुरक्षाबलों ने भी कड़ी कार्रवाई की, जिसके चलते हालात लगातार बेकाबू होते चले गए।
तेहरान से इस्फहान तक हालात गंभीर
राजधानी तेहरान में हालात सबसे ज्यादा तनावपूर्ण बने हुए हैं। कई इलाकों में कर्फ्यू जैसे हालात हैं, इंटरनेट सेवाएं आंशिक रूप से बंद कर दी गई हैं और सुरक्षा बलों की भारी तैनाती की गई है। इस्फहान, मशहद, तबरीज, शिराज और अहवाज जैसे बड़े शहरों से भी हिंसक झड़पों की खबरें आ रही हैं। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, कई जगहों पर रात के समय गोलीबारी हुई और सरकारी इमारतों को आग के हवाले कर दिया गया। प्रशासन का दावा है कि हिंसा फैलाने में “विदेशी ताकतों” और “संगठित दंगाइयों” की भूमिका है, जबकि प्रदर्शनकारी इसे जनता के गुस्से का विस्फोट बता रहे हैं।
अमेरिका और यूरोप की प्रतिक्रिया
ईरान में बिगड़ते हालात पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें टिकी हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बयान जारी कर कहा है कि वह शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे ईरानी लोगों की मदद के लिए तैयार हैं। ट्रंप के इस बयान को ईरान सरकार ने सीधे हस्तक्षेप के संकेत के रूप में लिया है। ईरान ने चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका ने किसी भी तरह का सैन्य हमला किया, तो वह क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों और इजरायल पर जवाबी कार्रवाई करेगा। इस बयान से पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ गया है।
यूरोपीय संघ की प्रमुख उर्सला वान डेर लिएन ने भी ईरानी जनता के समर्थन में बयान दिया है और मानवाधिकारों का सम्मान करने की अपील की है। इस बीच अमेरिका, जर्मनी और स्पेन समेत कई देशों में ईरान की इस्लामिक सत्ता के खिलाफ प्रदर्शन देखने को मिले हैं।
सरकार की दोहरी रणनीति: बातचीत का संकेत, सख्ती का ऐलान
ईरान सरकार आंदोलन से निपटने के लिए विरोधाभासी संकेत दे रही है। एक ओर राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने कहा है कि सरकार शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों से बातचीत के लिए तैयार है। उन्होंने कहा, “हम उन लोगों से बात करेंगे जो अपनी बात लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से रखना चाहते हैं।” लेकिन दूसरी ओर उन्होंने यह भी साफ किया कि दंगाइयों और हिंसा फैलाने वालों से कोई बातचीत नहीं होगी। पेजेश्कियान ने आरोप लगाया कि इन तत्वों ने देश की सामाजिक एकता को तोड़ने की कोशिश की है और उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने देश में अशांति के लिए अमेरिका और इजरायल को जिम्मेदार ठहराया।
न्यायिक सख्ती और मौत की सजा की चेतावनी
ईरान के प्रोसीक्यूटर जनरल मुहम्मद मुवाहेदी आजाद ने न्यायिक अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि तोड़फोड़ और आगजनी के मामलों में गिरफ्तार लोगों के मुकदमों की सुनवाई तेज की जाए। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में दोषियों को जल्द से जल्द सजा दी जाए। आजाद ने बेहद कड़े शब्दों में कहा कि तोड़फोड़ और आगजनी करने वाले “अल्लाह के दुश्मन” हैं और ईरान के संविधान में ऐसे अपराधों के लिए मौत की सजा का प्रावधान है। इस बयान के बाद मानवाधिकार संगठनों ने चिंता जताई है कि सरकार हिंसा के बहाने व्यापक दमन की तैयारी कर रही है।
रिवोल्यूशनरी गार्ड और सेना का रुख
ईरान की शक्तिशाली एलीट फोर्स इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने प्रदर्शनकारियों को चेतावनी दी है कि वे हिंसा और अराजकता से दूर रहें। गार्ड ने कहा कि देश की सुरक्षा और स्थिरता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। वहीं, ईरानी सेना ने अपेक्षाकृत संतुलित बयान देते हुए कहा है कि अगर आंदोलन और हिंसा बढ़ती है, तो सेना राष्ट्रीय हितों के अनुरूप कदम उठाएगी। इस बयान को इस तरह देखा जा रहा है कि सेना फिलहाल स्थिति पर नजर रखे हुए है, लेकिन हालात बिगड़ने पर हस्तक्षेप से पीछे नहीं हटेगी।
ईरान लौटने की तैयारी में रजा पहलवी, शाह समर्थकों में जोश
ईरान के अपदस्थ शाह के पुत्र और पूर्व क्राउन प्रिंस रजा पहलवी ने मौजूदा हालात को ऐतिहासिक मोड़ बताया है। उन्होंने कहा है कि कट्टरपंथी इस्लामिक सत्ता “अंतिम सांसें” ले रही है। पहलवी के अनुसार, पिछले 46 वर्षों से ईरानी जनता इस शासन को झेल रही है और अब वह बदलाव चाहती है। रजा पहलवी ने कहा कि ईरान के लोग पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था चाहते हैं, जहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानवाधिकारों का सम्मान हो।
ईरान वापसी का संकेत
पूर्व क्राउन प्रिंस ने यह भी घोषणा की है कि वह ईरान लौटने की तैयारी कर रहे हैं। उनके इस बयान ने सरकार के लिए नई चुनौती खड़ी कर दी है। कई शहरों में हो रहे प्रदर्शनों के दौरान शाह की वापसी की मांग वाले पोस्टर और नारे देखे गए हैं। तेहरान सहित कई शहरों में देश के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के खिलाफ खुले तौर पर नारे लगाए जा रहे हैं, जो पहले शायद ही कभी इतने व्यापक स्तर पर सुनाई दिए हों।
1979 की क्रांति की याद
गौरतलब है कि 1979 में इस्लामिक क्रांति के जरिए अयातुल्ला रुहोल्ला खोमेनी ने शाह रजा पहलवी को सत्ता से हटाकर ईरान में इस्लामिक गणराज्य की स्थापना की थी। खोमेनी के निधन के बाद अयातुल्ला अली खामेनेई सर्वोच्च नेता बने और तब से सत्ता पर काबिज हैं। अब मौजूदा आंदोलन को कई विश्लेषक 1979 के बाद ईरान के सबसे बड़े जनआंदोलनों में से एक मान रहे हैं, जो न केवल आर्थिक नीतियों बल्कि पूरे राजनीतिक ढांचे को चुनौती दे रहा है।
बड़े राजनीतिक बदलाव की ओर
ईरान इस समय एक निर्णायक दौर से गुजर रहा है। एक तरफ सरकार सख्ती और दमन के जरिए आंदोलन को कुचलने की कोशिश कर रही है, तो दूसरी तरफ जनता का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा। अंतरराष्ट्रीय दबाव, आंतरिक असंतोष और सत्ता विरोधी नारों के बीच यह सवाल लगातार गूंज रहा है कि क्या यह आंदोलन किसी बड़े राजनीतिक बदलाव की ओर बढ़ रहा है या सरकार एक बार फिर इसे कठोर कदमों से दबाने में सफल होगी। फिलहाल इतना तय है कि ईरान की सड़कों पर उठी यह आवाज अब केवल महंगाई तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरे शासन तंत्र के भविष्य पर सवाल खड़े कर रही है।