वॉशिंगटन : ईरान के खिलाफ जारी सैन्य अभियान के बीच अमेरिका और इजराइल की रणनीतियों में स्पष्ट अंतर सामने आया है। अमेरिका की खुफिया प्रमुख तुलसी गबार्ड ने गुरुवार को सीनेट की खुफिया समिति की वार्षिक सुनवाई के दौरान कहा कि दोनों देशों के उद्देश्य पूरी तरह एक जैसे नहीं हैं। उन्होंने संकेत दिया कि जहां इजराइल ईरान के शीर्ष नेतृत्व को कमजोर करने पर केंद्रित है, वहीं अमेरिका की प्राथमिकता ईरान की सैन्य क्षमताओं खासतौर पर बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और नौसेना को निशाना बनाना है।
रणनीति में अंतर, अलग-अलग लक्ष्य
गबार्ड के बयान से यह स्पष्ट हुआ कि भले ही अमेरिका और इजराइल एक ही मोर्चे पर खड़े हों, लेकिन उनके सैन्य लक्ष्य अलग-अलग हैं। इजराइल ने हाल के हमलों में ईरान के धार्मिक नेताओं और सैन्य कमांडरों को सीधे निशाना बनाया है। इसके उलट, अमेरिकी कार्रवाई मुख्य रूप से उन ठिकानों तक सीमित रही है जो ईरान के मिसाइल कार्यक्रम और सैन्य ढांचे से जुड़े हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह का अंतर भविष्य में अभियान की दिशा और परिणामों को प्रभावित कर सकता है। एक ओर नेतृत्व को खत्म करने की रणनीति है, तो दूसरी ओर सैन्य संसाधनों को निष्क्रिय करने की नीति दोनों का प्रभाव अलग-अलग स्तर पर पड़ता है।
‘इमिनेंट थ्रेट’ पर टला सीधा जवाब
सुनवाई के दौरान गबार्ड से यह अहम सवाल भी पूछा गया कि क्या ईरान से अमेरिका को कोई ‘इमिनेंट थ्रेट’ यानी आसन्न खतरा था, जिसके आधार पर 28 फरवरी को संयुक्त हवाई हमले शुरू किए गए। हालांकि, उन्होंने इस पर कोई सीधा जवाब नहीं दिया। उन्होंने कहा, यह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर निर्भर करता है कि वह यह तय करें कि अमेरिका किसी आसन्न खतरे का सामना कर रहा है या नहीं। उनका यह जवाब ट्रंप प्रशासन के भीतर इस मुद्दे पर चल रहे मतभेदों को उजागर करता है। कुछ अधिकारियों का मानना है कि ईरान परमाणु हथियार बनाने के करीब था, जबकि खुद ट्रंप का दावा है कि पिछले साल के सैन्य अभियान में ही इस कार्यक्रम को काफी हद तक नष्ट कर दिया गया था।
परमाणु कार्यक्रम को लेकर विरोधाभासी दावे
ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी अमेरिकी प्रशासन में एकरूपता नजर नहीं आ रही है। जहां खुफिया और सुरक्षा से जुड़े कुछ अधिकारी इसे अभी भी गंभीर खतरा मान रहे हैं, वहीं ट्रंप का कहना है कि यह खतरा पहले ही काफी कम हो चुका है। गबार्ड ने इस पर विस्तार से टिप्पणी करने से बचते हुए सिर्फ इतना कहा कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के पास ईरान के उच्च संवर्धित यूरेनियम भंडार की सटीक जानकारी है। इससे यह संकेत मिलता है कि अमेरिका इस मुद्दे पर निगरानी बनाए हुए है, लेकिन सार्वजनिक रूप से स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं की जा रही।
ऊर्जा ठिकानों पर हमले से बढ़ा तनाव
इस बीच, ईरान के ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर हुए हमलों ने क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा दिया है। राष्ट्रपति ट्रंप ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि वाशिंगटन को ईरान के ‘साउथ पार्स’ गैस क्षेत्र पर इजराइल के हमले की पहले से जानकारी नहीं थी। जब डेमोक्रेटिक प्रतिनिधि जोकिन कास्त्रो ने पूछा कि ट्रंप की कथित मनाही के बावजूद इजराइल ने ऊर्जा संयंत्रों को क्यों निशाना बनाया, तो गबार्ड ने इस पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया। इस मुद्दे पर उनकी चुप्पी ने दोनों देशों के बीच समन्वय को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। विश्लेषकों का मानना है कि ऊर्जा ठिकानों पर हमले से न केवल ईरान बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार भी प्रभावित हो सकता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव बढ़ने की संभावना है।
ईरानी नेतृत्व को लेकर अनिश्चितता
सुनवाई के दौरान गबार्ड ने ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई की स्थिति को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि इजरायली हमले में खामेनेई गंभीर रूप से घायल हुए हैं और उनकी वर्तमान स्थिति स्पष्ट नहीं है। गबार्ड के अनुसार, यह स्पष्ट नहीं है कि उनकी स्थिति क्या है। मोजतबा खामेनेई को उनके पिता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद ईरान का सर्वोच्च नेता चुना गया था। ऐसे में उनकी स्वास्थ्य स्थिति को लेकर अनिश्चितता ईरान की सत्ता संरचना और निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है।
भविष्य की दिशा पर सवाल
अमेरिका और इजराइल के बीच रणनीतिक मतभेद, ‘इमिनेंट थ्रेट’ पर अस्पष्टता, और ईरानी नेतृत्व की अनिश्चित स्थिति ये सभी कारक इस संघर्ष को और जटिल बना रहे हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर दोनों सहयोगी देशों के बीच स्पष्ट समन्वय नहीं हुआ, तो युद्ध की दिशा अप्रत्याशित हो सकती है।