ग्रीनलैंड पर कब्जे की तैयारी में जुटे ट्रंप, सैन्य उपयोग समेत विभिन्न विकल्पों पर कर रहे चर्चा

व्हाइट हाउस की ओर से जारी आधिकारिक बयान में कहा गया कि राष्ट्रपति ट्रंप ग्रीनलैंड के अधिग्रहण के विभिन्न विकल्पों पर चर्चा कर रहे हैं और इसे अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा की प्राथमिकता मानते हैं।

Update: 2026-01-07 23:53 GMT
वॉशिंगटन/कोपेनहेगन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर ग्रीनलैंड को लेकर आक्रामक रुख अपनाते हुए वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है। व्हाइट हाउस के ताजा बयानों से संकेत मिले हैं कि ट्रंप प्रशासन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इस आर्कटिक द्वीप पर नियंत्रण के लिए सेना के इस्तेमाल से लेकर उसे खरीदने तक, सभी विकल्पों पर गंभीरता से विचार कर रहा है। हालांकि, इस कदम का डेनमार्क समेत कई यूरोपीय देशों ने तीखा विरोध किया है, जिससे अमेरिका और उसके पारंपरिक सहयोगियों के रिश्तों में तनाव बढ़ता नजर आ रहा है।

डेनमार्क के सांसद रासमुस जार्लोव ने ट्रंप प्रशासन की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि अमेरिका ग्रीनलैंड पर कब्जे की तैयारी में एक सहयोगी देश के साथ लगभग युद्ध जैसी स्थिति पैदा कर रहा है। उन्होंने इसे नाटो और यूरोपीय सुरक्षा ढांचे के लिए खतरनाक करार दिया।

व्हाइट हाउस का बयान: सेना भी एक विकल्प
मंगलवार को व्हाइट हाउस की ओर से जारी आधिकारिक बयान में कहा गया कि राष्ट्रपति ट्रंप ग्रीनलैंड के अधिग्रहण के विभिन्न विकल्पों पर चर्चा कर रहे हैं और इसे अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा की प्राथमिकता मानते हैं। बयान में साफ कहा गया, “राष्ट्रपति और उनकी टीम इस अहम विदेश नीति लक्ष्य को हासिल करने के लिए सभी विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। इस प्रक्रिया में कमांडर-इन-चीफ के पास अमेरिकी सेना का उपयोग भी हमेशा एक विकल्प रहेगा।”

इसके एक दिन बाद व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने कहा कि राष्ट्रपति और उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा टीम ग्रीनलैंड को खरीदने के विकल्प पर सक्रिय रूप से विचार कर रही है। हालांकि, उन्होंने यह भी दोहराया कि प्रशासन बातचीत के रास्ते को प्राथमिकता देना चाहता है।

ग्रीनलैंड और डेनमार्क का स्पष्ट इनकार
डेनमार्क के नियंत्रण वाले ग्रीनलैंड ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि वह अमेरिका का हिस्सा नहीं बनना चाहता। ग्रीनलैंड की स्थानीय सरकार और डेनमार्क, दोनों का कहना है कि द्वीप की संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता। ट्रंप के बयानों के बाद फ्रांस, जर्मनी और कनाडा समेत कई यूरोपीय देशों ने ग्रीनलैंड के समर्थन में एकजुटता दिखाई है। इन देशों का मानना है कि किसी भी तरह का दबाव या सैन्य धमकी अंतरराष्ट्रीय कानून और सहयोगी संबंधों के खिलाफ होगी।

क्यों ग्रीनलैंड चाहते हैं ट्रंप?
राष्ट्रपति ट्रंप ने सोमवार को कहा था कि अमेरिका को राष्ट्रीय सुरक्षा कारणों से ग्रीनलैंड की जरूरत है। उनके मुताबिक, आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की गतिविधियां तेजी से बढ़ रही हैं और ग्रीनलैंड रणनीतिक दृष्टि से बेहद अहम है।
ट्रंप ने कहा, “ग्रीनलैंड चारों ओर से रूसी और चीनी जहाजों से घिरा हुआ है। डेनमार्क अकेले इसकी सुरक्षा करने में सक्षम नहीं होगा।”
विशेषज्ञों के अनुसार, ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति यूरोप और उत्तरी अमेरिका के बीच एक अहम कड़ी है। अमेरिका वहां अपने बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम को मजबूत करना चाहता है। इसके अलावा, यह द्वीप दुर्लभ खनिज संसाधनों और भविष्य की आर्कटिक शिपिंग रूट्स के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

विदेश मंत्री का नरम रुख
आईएएनएस के अनुसार, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने सांसदों को बताया कि राष्ट्रपति ट्रंप सैन्य कार्रवाई के बजाय बातचीत के जरिये ग्रीनलैंड को हासिल करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि व्हाइट हाउस के सख्त बयानों का मतलब यह नहीं है कि अमेरिका तुरंत कोई सैन्य कदम उठाने जा रहा है। रूबियो ने स्पष्ट किया कि प्रशासन का उद्देश्य डेनमार्क पर बातचीत के लिए दबाव बनाना है, ताकि ग्रीनलैंड के भविष्य को लेकर कोई समझौता किया जा सके। उनके मुताबिक, ट्रंप “कब्जा” नहीं बल्कि “खरीद” के विकल्प को तरजीह दे रहे हैं।

डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने वार्ता का प्रस्ताव रखा

एपी की रिपोर्ट के अनुसार, व्हाइट हाउस के हालिया बयान के बाद डेनमार्क और ग्रीनलैंड दोनों ने अमेरिकी विदेश मंत्री के साथ वार्ता की इच्छा जताई है। मार्को रूबियो ने कहा है कि वह अगले सप्ताह डेनमार्क के अधिकारियों से मुलाकात करेंगे। इससे पहले डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेट्टे फ्रेडरिकसन ने चेतावनी देते हुए कहा था कि अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की कोशिश की, तो इसका सीधा असर नाटो सैन्य गठबंधन पर पड़ेगा और यह उसके अंत की ओर ले जा सकता है।

यूरोप की कड़ी प्रतिक्रिया
फ्रांस, जर्मनी, इटली, पोलैंड, स्पेन और ब्रिटेन के नेताओं ने संयुक्त बयान में कहा कि खनिज संपदा से भरपूर ग्रीनलैंड वहां के लोगों का है और किसी बाहरी ताकत को उस पर दावा करने का अधिकार नहीं है। वहीं स्विट्जरलैंड ने भी कहा कि ग्रीनलैंड की स्थिति में किसी भी बदलाव के लिए डेनमार्क और ग्रीनलैंड की सहमति अनिवार्य है।

बढ़ता वैश्विक तनाव
विश्लेषकों का मानना है कि ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप प्रशासन की आक्रामक रणनीति अमेरिका और उसके पारंपरिक सहयोगियों के बीच भरोसे को कमजोर कर सकती है। नाटो, यूरोप और आर्कटिक क्षेत्र की स्थिरता पर इसके दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या बातचीत के जरिए समाधान निकलेगा या यह विवाद वैश्विक कूटनीति में एक नए टकराव का रूप ले लेगा।

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