क्या ईरान में लागू होगा लीबिया मॉडल ?, 15 शर्तों में छिपा है अमेरिका का जंग के बाद का गेमप्लान
यह प्रस्ताव जितना शांति का रास्ता दिखाता है, उतना ही ईरान के लिए रणनीतिक चुनौती भी बन गया है। सवाल उठ रहा है कि क्या इन शर्तों को स्वीकार करना ईरान के लिए एक तरह का आत्मसमर्पण होगा या फिर यह क्षेत्र में स्थिरता की दिशा में एक जरूरी कदम साबित हो सकता है।
वॉशिंगटन/तेहरान। मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष को थामने के लिए अमेरिका की ओर से एक बड़ा कूटनीतिक प्रस्ताव सामने आया है। इस प्रस्ताव के तहत अमेरिका ने ईरान के सामने 15 सख्त शर्तें रखी हैं, जिनके आधार पर संभावित युद्धविराम और समझौते की बात की जा रही है। हालांकि, यह प्रस्ताव जितना शांति का रास्ता दिखाता है, उतना ही ईरान के लिए रणनीतिक चुनौती भी बन गया है। सवाल उठ रहा है कि क्या इन शर्तों को स्वीकार करना ईरान के लिए एक तरह का आत्मसमर्पण होगा या फिर यह क्षेत्र में स्थिरता की दिशा में एक जरूरी कदम साबित हो सकता है।
क्या हैं अमेरिका की 15 प्रमुख शर्तें?
अमेरिका के प्रस्ताव में सैन्य, परमाणु और क्षेत्रीय नीतियों से जुड़े कई कड़े प्रावधान शामिल हैं।
- एक महीने का तत्काल सीज़फायर लागू करना
- परमाणु कार्यक्रम को लगभग पूरी तरह खत्म करना
- यूरेनियम संवर्धन पर पूर्ण रोक
- सभी परमाणु सामग्री अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) को सौंपना
- नतांज, फोर्डो और इस्फहान जैसे प्रमुख परमाणु केंद्रों को नष्ट करना
- IAEA को देश में बिना रोक-टोक निरीक्षण की अनुमति देना
- हमास, हिज़बुल्लाह और हूती जैसे संगठनों से संबंध खत्म करना
- क्षेत्र में फंडिंग और हथियार सप्लाई बंद करना
- होर्मुज जलडमरूमध्य को अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए खुला रखना
- मिसाइल कार्यक्रम पर भविष्य में सीमाएं तय करना
- सैन्य क्षमता को केवल आत्मरक्षा तक सीमित करना
- बदले में आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने का प्रस्ताव
- सिविल न्यूक्लियर प्रोजेक्ट्स में अंतरराष्ट्रीय सहयोग
- ‘स्नैपबैक’ प्रतिबंध व्यवस्था को समाप्त करना
- भविष्य में परमाणु हथियार न बनाने की औपचारिक गारंटी
इन शर्तों से साफ है कि अमेरिका ईरान की सैन्य और रणनीतिक क्षमता को व्यापक रूप से सीमित करना चाहता है।
ईरान की रणनीतिक ताकत पर सीधा असर
विशेषज्ञों के मुताबिक, इन शर्तों का असर केवल परमाणु कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहेगा। यदि ईरान इन्हें स्वीकार करता है, तो उसे अपनी क्षेत्रीय रणनीति में भी बड़े बदलाव करने होंगे। ईरान का प्रभाव पश्चिम एशिया में काफी हद तक उसके प्रॉक्सी नेटवर्क जैसे हमास, हिज़बुल्लाह और हूती पर आधारित रहा है। इन संगठनों से दूरी बनाने का मतलब होगा कि ईरान का क्षेत्रीय प्रभाव काफी कमजोर पड़ सकता है। इसके अलावा, मिसाइल कार्यक्रम और सैन्य क्षमता पर लगने वाली सीमाएं भी उसकी सुरक्षा रणनीति को प्रभावित करेंगी।
ईरान के भीतर संभावित विरोध
इन शर्तों को लेकर ईरान के भीतर भी असहमति की आशंका जताई जा रही है। खासतौर पर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) जैसी ताकतवर सैन्य इकाइयों का रुख निर्णायक हो सकता है। अगर सरकार इन शर्तों को मानने की दिशा में आगे बढ़ती है, तो उसे अंदरूनी विरोध या दबाव का सामना करना पड़ सकता है। इससे देश के भीतर राजनीतिक और सैन्य संतुलन भी प्रभावित हो सकता है।
बदले में क्या मिलेगा ईरान को?
अमेरिका के प्रस्ताव में कुछ सकारात्मक पहलू भी शामिल हैं। अगर ईरान इन शर्तों को स्वीकार करता है, तो उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने की बात कही गई है। इससे उसकी अर्थव्यवस्था को बड़ा सहारा मिल सकता है, जो लंबे समय से प्रतिबंधों के कारण दबाव में है। इसके अलावा सिविल न्यूक्लियर एनर्जी प्रोजेक्ट्स में अंतरराष्ट्रीय सहयोग मिलने से ऊर्जा क्षेत्र में भी विकास की संभावना है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़े ईरान को वैश्विक मंच पर फिर से जगह मिल सकती है।
लीबिया का उदाहरण: ईरान की बड़ी चिंता
ईरान के लिए सबसे बड़ी चिंता अतीत के अनुभव हैं। वर्ष 2003 में लीबिया के शासक मुअम्मर गद्दाफी ने अमेरिका के साथ समझौता करते हुए अपना परमाणु कार्यक्रम छोड़ दिया था। लेकिन 2011 में नाटो के हस्तक्षेप के बाद उनकी सरकार गिर गई और उनकी हत्या हो गई। इस घटना को ईरान में अक्सर एक चेतावनी के रूप में देखा जाता है। ईरान में यह धारणा मजबूत है कि यदि कोई देश अपनी रणनीतिक ताकत छोड़ देता है, तो उसकी सुरक्षा भी खतरे में पड़ सकती है।
भविष्य को लेकर अनिश्चितता
ईरान की एक और चिंता यह है कि समझौते के बाद भी भविष्य में अमेरिका या इजरायल की ओर से खतरा पूरी तरह खत्म नहीं होगा। अगर किसी भी समय समझौते के उल्लंघन का आरोप लगाया गया, तो फिर से प्रतिबंध या सैन्य कार्रवाई की संभावना बनी रह सकती है। इस अनिश्चितता के कारण ईरान के लिए यह फैसला और भी जटिल हो जाता है।
ईरान के सामने दो रास्ते
वर्तमान स्थिति में ईरान के सामने दो स्पष्ट विकल्प हैं।
पहला, वह इन शर्तों को स्वीकार कर आर्थिक राहत और संभावित शांति की दिशा में कदम बढ़ाए। दूसरा, वह अपनी रणनीतिक और सैन्य ताकत को बरकरार रखते हुए टकराव का रास्ता जारी रखे। दोनों ही विकल्पों के अपने जोखिम और फायदे हैं और यही कारण है कि यह निर्णय बेहद अहम बन गया है।
पूरे क्षेत्र पर पड़ेगा असर
ईरान का फैसला केवल उसके अपने भविष्य तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर पूरे मध्य-पूर्व पर पड़ेगा। अगर समझौता होता है, तो क्षेत्र में तनाव कम हो सकता है और वैश्विक ऊर्जा बाजार को भी स्थिरता मिल सकती है। वहीं, अगर टकराव जारी रहता है, तो इसका प्रभाव और व्यापक हो सकता है।