ईरान-इजरायल संघर्ष के बीच राहत: नया समुद्री रास्ता खुला, तेल-गैस से लदे भारतीय समेत 4 जहाजों ने सुरक्षित पार किया होर्मुज
इस घटनाक्रम में भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण खबर यह रही कि भारतीय ध्वज वाला मालवाहक जहाज भी सुरक्षित रूप से होर्मुज पार करने में सफल रहा। AIS सिग्नल के जरिए इस जहाज की पहचान MSV कुबा (MNV 2183) के रूप में हुई है। यह जहाज 31 मार्च को दुबई से रवाना हुआ था और फिलहाल ओमान के दिब्बा पोर्ट से करीब 40 किलोमीटर दूर समुद्र में देखा गया है।
होर्मुज। ईरान-इजरायल युद्ध के बीच वैश्विक समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर छाए संकट के बीच एक राहत भरी खबर सामने आई है। भारतीय ध्वज वाले एक जहाज सहित कुल 4 बड़े वाणिज्यिक जहाजों ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को सुरक्षित पार कर लिया है। खास बात यह है कि इन जहाजों ने पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय मार्ग के बजाय एक नए समुद्री रास्ते का इस्तेमाल किया, जिसे अब वैश्विक शिपिंग के लिए संभावित विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
नए समुद्री मार्ग से जहाजों की आवाजाही
AIS (ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम) और रिमोट सेंसिंग डेटा के अनुसार, तेल, एलएनजी और सामान्य माल ले जाने वाले चार बड़े जहाज इस नए रास्ते से होकर गुजरे। यह नया मार्ग पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र से बचते हुए ओमान की समुद्री सीमा के भीतर से होकर गुजरता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस रास्ते का इस्तेमाल जोखिम को कम करने और जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए किया जा रहा है।
भारतीय जहाज ‘कुबा’ भी सुरक्षित निकला
इस घटनाक्रम में भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण खबर यह रही कि भारतीय ध्वज वाला मालवाहक जहाज भी सुरक्षित रूप से होर्मुज पार करने में सफल रहा। AIS सिग्नल के जरिए इस जहाज की पहचान MSV कुबा (MNV 2183) के रूप में हुई है। यह जहाज 31 मार्च को दुबई से रवाना हुआ था और फिलहाल ओमान के दिब्बा पोर्ट से करीब 40 किलोमीटर दूर समुद्र में देखा गया है। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि जहाज किस प्रकार का माल लेकर जा रहा था या उसका अंतिम गंतव्य क्या है, लेकिन उसका सुरक्षित पार होना भारत के लिए राहत की बात है।
तेल और गैस से लदे जहाजों की आवाजाही
नए मार्ग से गुजरने वाले जहाजों में दो बड़े कच्चे तेल के टैंकर हब्रुत और धलकुट शामिल हैं, जो मार्शल द्वीप समूह के ध्वज वाले हैं। समुद्री विश्लेषण फर्म टैंकरट्रैकर्स के अनुसार, ये दोनों जहाज सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात से करीब 20 लाख बैरल कच्चा तेल लेकर निकले थे। इसके अलावा, पनामा के ध्वज वाला एलएनजी जहाज सोहार एलएनजी भी इसी मार्ग से गुजरा। यह जहाज 21 मार्च को यूएई के अल हमरिया पोर्ट से रवाना हुआ था। हालांकि इसमें लदे माल की सटीक मात्रा स्पष्ट नहीं है, लेकिन AIS डेटा के अनुसार इसमें कुछ मात्रा में कार्गो मौजूद था।
होर्मुज जलडमरूमध्य का महत्व
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है। यही कारण है कि इस क्षेत्र में किसी भी तरह की अस्थिरता का सीधा असर वैश्विक तेल और गैस बाजार पर पड़ता है। भारत सहित कई एशियाई देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इस मार्ग पर काफी हद तक निर्भर हैं।
संघर्ष के कारण बाधित हुई आपूर्ति
अमेरिका और इजरायल द्वारा 28 फरवरी को शुरू किए गए सैन्य अभियानों के बाद से ईरान ने इस क्षेत्र में अपनी गतिविधियां तेज कर दी हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान ने मिसाइलों और ड्रोन के जरिए कई जहाजों को निशाना बनाया, जिसके कारण यह महत्वपूर्ण जलमार्ग लगभग ठप हो गया। कई तेल और गैस से लदे जहाज बीच रास्ते में ही फंस गए और आगे बढ़ने में असमर्थ रहे। इस स्थिति ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और शिपिंग इंडस्ट्री पर भारी दबाव बना दिया।
ईरान ने खोला वैकल्पिक मार्ग
इसी संकट के बीच ईरान ने जहाजों की आवाजाही के लिए एक वैकल्पिक, लेकिन लंबा समुद्री मार्ग खोल दिया है। यह मार्ग ईरान के प्रादेशिक जलक्षेत्र से होकर क़ेशम और लारक द्वीपों के बीच एक संकरे रास्ते से गुजरता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों को अनुमति देती है और उनकी पहचान की पुष्टि करती है। बताया जा रहा है कि ईरान इस मार्ग से गुजरने वाले कच्चे तेल पर प्रति बैरल एक अमेरिकी डॉलर का शुल्क भी वसूल रहा है।
वैश्विक व्यापार के लिए सकारात्मक संकेत
चार बड़े जहाजों का इस नए मार्ग से सफलतापूर्वक गुजरना वैश्विक समुद्री व्यापार के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। इससे यह उम्मीद जगी है कि आने वाले समय में इस वैकल्पिक मार्ग के जरिए ऊर्जा आपूर्ति को आंशिक रूप से बहाल किया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह मार्ग सुरक्षित और नियमित रूप से उपयोग में लाया जाता है, तो इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल और गैस की कीमतों पर पड़ रहे दबाव को कम किया जा सकता है।