वॉशिंगटन/तेहरान। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव को रोकने के लिए इस सप्ताह चार प्रमुख अरब देशों सऊदी अरब, कतर, ओमान और मिस्र ने गहन कूटनीतिक प्रयास किए। इन देशों को आशंका थी कि यदि अमेरिका ने ईरान पर हमला किया तो इसका असर केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरा पश्चिम एशिया इसकी चपेट में आ जाएगा। सुरक्षा से लेकर वैश्विक अर्थव्यवस्था तक पर इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। एक खाड़ी देश के वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के गुरुवार को अपने रुख में नरमी दिखाने से पहले करीब 48 घंटों तक यह कूटनीतिक कवायद चली। इन चारों देशों ने न सिर्फ वॉशिंगटन से, बल्कि तेहरान से भी लगातार संपर्क बनाए रखा, ताकि हालात को सैन्य टकराव की ओर बढ़ने से रोका जा सके।
अमेरिका को दी गई चेतावनी
खाड़ी देश के अधिकारी ने बताया कि सऊदी अरब, कतर, ओमान और मिस्र ने अमेरिकी प्रशासन को साफ शब्दों में आगाह किया कि ईरान पर किसी भी तरह का सैन्य हमला पूरे क्षेत्र में अस्थिरता फैला सकता है। उन्होंने कहा कि इसका असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, तेल कीमतों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ेगा। इन देशों का तर्क था कि खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य अड्डों की मौजूदगी को देखते हुए किसी भी संघर्ष की आग जल्दी ही फैल सकती है। यदि ईरान ने जवाबी कार्रवाई की, तो क्षेत्र में अमेरिकी हितों को नुकसान पहुंचेगा, जिसका अंततः असर खुद अमेरिका की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।
ईरान को भी दिया गया संदेश
इन चारों अरब देशों ने केवल अमेरिका को ही नहीं, बल्कि ईरान को भी स्पष्ट संदेश दिया। उन्होंने तेहरान को आगाह किया कि यदि उसने खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी अड्डों या ठिकानों पर जवाबी हमला किया, तो इससे ईरान और क्षेत्र के अन्य देशों के रिश्ते गंभीर रूप से प्रभावित होंगे। अधिकारी के मुताबिक, खाड़ी देशों ने ईरान से संयम बरतने और तनाव बढ़ाने वाले किसी भी कदम से बचने की अपील की। उनका कहना था कि क्षेत्र पहले ही कई संकटों से जूझ रहा है और एक नया सैन्य टकराव सभी के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है।
48 घंटे की कूटनीति, बयानबाजी कम करने पर जोर
इस कूटनीतिक पहल का मुख्य उद्देश्य अमेरिका और ईरान के बीच तीखी बयानबाजी को कम करना और किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई से बचना था। अधिकारी ने कहा कि सभी पक्षों को यह समझाने की कोशिश की गई कि युद्ध की स्थिति क्षेत्रीय अस्थिरता को जन्म देगी, जिससे कोई भी देश अछूता नहीं रहेगा। अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल ने भी इस सप्ताह अपनी रिपोर्ट में कहा था कि सऊदी अरब, कतर और ओमान ने अमेरिकी हमले के खिलाफ सक्रिय रूप से लॉबिंग की थी। रिपोर्ट के अनुसार, इन देशों ने पर्दे के पीछे रहकर अमेरिका को संयम बरतने के लिए मनाने की कोशिश की।
परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत की उम्मीद
खाड़ी देश के अधिकारी का कहना है कि इन राजनयिक प्रयासों का अंतिम लक्ष्य केवल तत्काल संकट को टालना नहीं था, बल्कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर दोबारा बातचीत का रास्ता खोलना भी था। उनका मानना है कि सैन्य टकराव के बजाय कूटनीति और संवाद ही इस लंबे समय से चले आ रहे विवाद का समाधान निकाल सकते हैं। अधिकारी के अनुसार, यदि हालात शांत रहते हैं, तो आने वाले समय में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर किसी नए समझौते या वार्ता की संभावनाएं बन सकती हैं।
ईरानी राजदूत का दावा: ट्रंप ने हमला न करने का भरोसा दिया
इसी बीच पाकिस्तान में ईरान के राजदूत रजा अमीरी मोघदम ने गुरुवार को एक बड़ा दावा किया। उन्होंने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तेहरान को भरोसा दिलाया है कि वह ईरान पर हमला नहीं करेंगे। मोघदम के मुताबिक, ट्रंप ने ईरान से संयम बरतने और क्षेत्र में अमेरिकी हितों को निशाना न बनाने की अपील भी की है। मोघदम ने बताया कि उन्हें यह जानकारी रात करीब एक बजे (स्थानीय समय) मिली। इस सूचना से यह संकेत मिला कि ट्रंप युद्ध नहीं चाहते और सैन्य टकराव से बचने के पक्ष में हैं।
तनाव कम करने के संकेत, लेकिन अनिश्चितता बरकरार
हालांकि ट्रंप के कथित आश्वासन और खाड़ी देशों की कूटनीति से तनाव कुछ हद तक कम होता दिख रहा है, लेकिन क्षेत्र में अनिश्चितता अब भी बनी हुई है। अमेरिका और ईरान के बीच भरोसे की कमी गहरी है और किसी भी छोटी घटना से हालात फिर बिगड़ सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा स्थिति में खाड़ी देशों की भूमिका बेहद अहम हो गई है। वे न केवल अमेरिका के करीबी सहयोगी हैं, बल्कि ईरान के साथ भी संवाद के रास्ते खुले रखे हुए हैं। इसी संतुलन के चलते वे इस संकट में मध्यस्थ की भूमिका निभा पा रहे हैं।
क्षेत्रीय स्थिरता के लिए कूटनीति ही एकमात्र रास्ता
फिलहाल यह साफ है कि सऊदी अरब, कतर, ओमान और मिस्र जैसे देश नहीं चाहते कि पश्चिम एशिया एक और बड़े युद्ध की ओर बढ़े। उनके लिए क्षेत्रीय स्थिरता, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक संतुलन सर्वोपरि हैं। यही वजह है कि उन्होंने पर्दे के पीछे रहकर अमेरिका और ईरान दोनों पर संयम बरतने का दबाव बनाया।
आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या यह कूटनीतिक प्रयास केवल अस्थायी राहत साबित होते हैं या फिर अमेरिका–ईरान तनाव को स्थायी रूप से कम करने की दिशा में कोई ठोस पहल सामने आती है। फिलहाल, युद्ध टलने के संकेत जरूर हैं, लेकिन हालात पूरी तरह सामान्य कहे जा सकें, इसमें अभी वक्त लगेगा।