पश्चिम एशिया में बढ़ी बेचैनी: ट्रंप ने ईरान को चेताया, परमाणु समझौता करो, नहीं तो होगा भयानक हमला

पिछले जून में ईरान और इजरायल के बीच 12 दिनों तक चला सैन्य संघर्ष पश्चिम एशिया में तनाव का बड़ा उदाहरण रहा। इस दौरान अमेरिका ने भी ईरान के कई परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया था। ट्रंप अब उसी घटना को याद दिलाते हुए ईरान को चेतावनी दे रहे हैं कि अगली बार कार्रवाई और भी गंभीर हो सकती है।

Update: 2026-01-28 21:04 GMT

वॉशिंगटन/तेहरान। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर एक बार फिर कड़ा और आक्रामक रुख अपनाया है। उन्होंने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि अगर ईरान वार्ता की मेज पर नहीं आता और परमाणु समझौता नहीं करता, तो अमेरिका पहले से कहीं ज्यादा “भयानक” सैन्य कार्रवाई कर सकता है। ट्रंप की इस चेतावनी के बीच ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव और बढ़ गया है। ईरानी मुद्रा रियाल में रिकॉर्ड गिरावट दर्ज की गई है और यह 16 लाख रियाल प्रति डॉलर के ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गई है। ट्रंप की बयानबाजी, पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य तैनाती में इजाफा, कूटनीतिक हलचल और क्षेत्रीय देशों की सतर्कता इन सबने मिलकर पूरे क्षेत्र में तनाव का माहौल और गहरा कर दिया है।

इंटरनेट मीडिया पोस्ट से सख्त संदेश

राष्ट्रपति ट्रंप ने बुधवार को इंटरनेट मीडिया पर एक पोस्ट के जरिए ईरान को चेताया। उन्होंने लिखा, “उम्मीद है कि ईरान जल्द ही बातचीत के लिए आगे आएगा और एक निष्पक्ष एवं न्यायसंगत समझौता करेगा, जो सभी पक्षों के लिए अच्छा होगा।” हालांकि इसी पोस्ट में उन्होंने यह भी जोड़ा कि अगर ईरान नहीं माना, तो अगला हमला पहले से कहीं अधिक विनाशकारी होगा। ट्रंप ने बीते जून में हुए सैन्य हमलों का हवाला देते हुए संकेत दिया कि अमेरिका अपनी सैन्य ताकत के इस्तेमाल से पीछे नहीं हटेगा।

2015 के परमाणु समझौते की पृष्ठभूमि


गौरतलब है कि ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान 2018 में अमेरिका को 2015 के ईरान परमाणु समझौते (JCPOA) से बाहर कर लिया था। यह समझौता ईरान और विश्व की प्रमुख शक्तियों के बीच हुआ था, जिसके तहत ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करता और बदले में उस पर लगे प्रतिबंधों में राहत मिलती। समझौते से बाहर निकलने के बाद अमेरिका ने ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए, जिससे ईरानी अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई। अब ट्रंप एक नए समझौते की बात कर रहे हैं, लेकिन उनकी भाषा कूटनीति से ज्यादा दबाव और धमकी की झलक देती है।

जून का संघर्ष और परमाणु ठिकानों पर हमले

पिछले जून में ईरान और इजरायल के बीच 12 दिनों तक चला सैन्य संघर्ष पश्चिम एशिया में तनाव का बड़ा उदाहरण रहा। इस दौरान अमेरिका ने भी ईरान के कई परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया था। ट्रंप अब उसी घटना को याद दिलाते हुए ईरान को चेतावनी दे रहे हैं कि अगली बार कार्रवाई और भी गंभीर हो सकती है।

‘आर्माडा’ बयान: शक्ति प्रदर्शन और कूटनीति का संकेत


आयोवा के क्वाइव में एक चुनावी कार्यक्रम के दौरान ट्रंप ने पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी का जिक्र करते हुए कहा, “एक और खूबसूरत आर्माडा ईरान की तरफ बढ़ रहा है। मुझे उम्मीद है कि वे एक समझौता करेंगे।” यह बयान अमेरिकी सैन्य शक्ति के खुले प्रदर्शन के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि ट्रंप ने इसमें कूटनीति के लिए दरवाजा खुला रखने का संकेत भी दिया। इससे पहले भी उन्होंने कहा था कि अमेरिका के पास एक आर्माडा है, जो उस दिशा में बढ़ रहा है और शायद उसका इस्तेमाल न करना पड़े।


क्या है आर्माडा?

जब कई युद्धपोत एक साथ किसी सैन्य मिशन या युद्ध के लिए रवाना होते हैं, तो उसे ‘आर्माडा’ कहा जाता है। ट्रंप का यह शब्द चयन खुद में एक सख्त संदेश माना जा रहा है।

ईरानी मुद्रा रियाल की ऐतिहासिक गिरावट


ट्रंप की धमकियों और बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच ईरान की अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगा है। ईरानी मुद्रा रियाल रिकॉर्ड गिरावट के साथ 16 लाख रियाल प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंच गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी प्रतिबंधों, युद्ध के खतरे और राजनीतिक अनिश्चितता ने ईरान के बाजारों में डर का माहौल पैदा कर दिया है। आम लोगों की क्रयशक्ति घट रही है और महंगाई लगातार बढ़ रही है।

प्रदर्शनकारियों पर चेतावनी और मानवाधिकार का मुद्दा

ट्रंप ने ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शनों को लेकर भी कई बार कड़ी चेतावनी दी है। उन्होंने कहा था कि अगर ईरान में प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई गई, तो अमेरिका उनकी मदद के लिए आगे आएगा। इस बयान को ईरान ने अपने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करार दिया था। इसके जवाब में ईरानी नेतृत्व ने भी अमेरिका को चेतावनी दी कि किसी भी बाहरी दखल का कड़ा जवाब दिया जाएगा।

ईरान की प्रतिक्रिया

ईरान की ओर से भी ट्रंप की बयानबाजी का जवाब तीखे शब्दों में दिया गया है। ईरानी अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका या उसके सहयोगी देशों ने हमला किया, तो पूरे पश्चिम एशिया में उसके गंभीर परिणाम होंगे। बुधवार को ईरानी अधिकारियों ने दावा किया कि अमेरिका पूरे क्षेत्र में सैन्य हमले की तैयारी कर रहा है, जिससे हालात और तनावपूर्ण हो गए हैं।

कूटनीतिक प्रयास तेज, मिस्र की पहल


तनाव के इस माहौल के बीच कूटनीतिक प्रयास भी तेज हो गए हैं। मिस्र ने बताया कि उसने शांति प्रयासों के तहत ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरागची और अमेरिकी दूत स्टीव विटकाफ से अलग-अलग बातचीत की है। मिस्र, जो लंबे समय से क्षेत्रीय मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है, हालात को युद्ध की ओर बढ़ने से रोकने की कोशिश कर रहा है।

सऊदी अरब और यूएई का साफ संदेश

इस पूरे घटनाक्रम में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने भी अहम रुख अपनाया है। दोनों देशों ने साफ कर दिया है कि वे किसी भी संभावित हमले के लिए अपने वायु क्षेत्र का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं देंगे। यह बयान अमेरिका के लिए एक कूटनीतिक झटका माना जा रहा है, क्योंकि पश्चिम एशिया में सैन्य अभियानों के लिए इन देशों का सहयोग अहम माना जाता है।

ईरान बातचीत के लिए तैयार होने का संकेत

तनाव के बीच ईरान की ओर से एक नरम संकेत भी सामने आया है। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने कहा है कि उनका देश अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत शांति और युद्ध रोकने की किसी भी प्रक्रिया का स्वागत करता है। उन्होंने यह बात सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से फोन पर बातचीत के दौरान कही। पेजेश्कियान ने जोर देकर कहा कि ईरान अपने नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ क्षेत्रीय शांति का समर्थक है।

ट्रंप की इराक को चेतावनी

इसी बीच ट्रंप ने इराक को भी चेतावनी दी है। ट्रंप ने कहा है कि अगर इराक में पूर्व प्रधानमंत्री नूरी अल-मलिकी दोबारा सत्ता में लौटते हैं, तो अमेरिका इराक का समर्थन नहीं करेगा। यह बयान ऐसे समय आया है, जब इराक की शिया पार्टियों के एक बड़े राजनीतिक गुट ने नूरी अल-मलिकी के नामांकन का समर्थन किया है। ट्रंप प्रशासन नूरी को ईरान का करीबी मानता है और यही वजह है कि अमेरिका इस पर नाराजगी जता रहा है।

दबाव, कूटनीति और अनिश्चित भविष्य

कुल मिलाकर, ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है। ट्रंप की आक्रामक भाषा और सैन्य शक्ति का प्रदर्शन जहां दबाव की रणनीति को दर्शाता है, वहीं कूटनीतिक प्रयास यह संकेत देते हैं कि अभी युद्ध को टाला जा सकता है। ईरान की आर्थिक हालत, क्षेत्रीय देशों की सतर्कता और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता ये सभी आने वाले दिनों में यह तय करेंगे कि यह टकराव वार्ता की मेज तक पहुंचेगा या किसी नए संकट में बदल जाएगा।

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