ट्रंप की गाजा शांति परिषद पर वैश्विक असहमति: चीन ने बनाई दूरी, यूरोप के बड़े देशों का इनकार
अमेरिका का कहना है कि इजरायल-हमास युद्ध के बाद गाजा पट्टी में सामान्य स्थिति बहाल करने, सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने और पुनर्निर्माण कार्यों के समन्वय के लिए इस शांति परिषद का गठन किया जा रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप ने इसे एक वैकल्पिक वैश्विक मंच के रूप में पेश किया है, जो भविष्य में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को भी चुनौती दे सकता है।
ट्रंप का यूएन को किनारे करने का संकेत
ट्रंप का यह बयान कि शांति परिषद भविष्य में संयुक्त राष्ट्र का विकल्प बन सकती है, कई देशों को असहज कर गया है। कूटनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान अमेरिका की उस सोच को दर्शाता है, जिसमें वह बहुपक्षीय संस्थाओं की जगह अपने नेतृत्व वाले मंचों को तरजीह देना चाहता है। चीन, रूस और कई यूरोपीय देश इसे वैश्विक शासन व्यवस्था के लिए खतरनाक मान रहे हैं। यूरोप का खुला विरोध: फ्रांस, नॉर्वे और स्वीडन का इनकार
यूरोप के कई प्रमुख देशों ने शांति परिषद से दूरी बनाकर ट्रंप की पहल को बड़ा झटका दिया है। फ्रांस, नॉर्वे और स्वीडन ने स्पष्ट रूप से कहा है कि वे इस परिषद का हिस्सा नहीं बनेंगे। इन देशों का तर्क है कि गाजा जैसे संवेदनशील और जटिल मुद्दे पर कोई भी पहल संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से ही होनी चाहिए, न कि किसी एक देश के नेतृत्व वाले मंच के जरिए। इटली का रुख चौंकाने वाला, संविधान का हवाला
जर्मनी भी पीछे हटता नजर आया
जर्मनी के प्रतिष्ठित अखबार डेर स्पीगल ने भी संकेत दिए हैं कि बर्लिन सरकार शांति परिषद में शामिल होने के प्रति इच्छुक नहीं है। जर्मनी, जो परंपरागत रूप से अमेरिका का मजबूत सहयोगी रहा है, इस मुद्दे पर सतर्क रुख अपना रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जर्मनी किसी भी ऐसे मंच का हिस्सा नहीं बनना चाहता, जो संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को कमजोर करे। नेतन्याहू का समर्थन, लेकिन तुर्किये पर आपत्ति
इस बीच इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने दावोस रवाना होने से पहले शांति परिषद में शामिल होने की घोषणा कर दी है। हालांकि शुरुआत में नेतन्याहू के कार्यालय ने परिषद की कार्यकारी समिति में तुर्किये को शामिल करने पर आपत्ति जताई थी। बाद में इजरायल ने स्पष्ट किया कि वह परिषद में शामिल रहेगा, लेकिन उसकी संरचना और भूमिका को लेकर उसकी अपनी चिंताएं हैं। भारत की चुप्पी, कूटनीतिक संतुलन की कोशिश
भारत को भी राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से शांति परिषद में शामिल होने का औपचारिक आमंत्रण मिला है। हालांकि नई दिल्ली ने अभी तक इस पर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, भारत इस मुद्दे पर बेहद सावधानी से कदम रख रहा है। एक ओर भारत अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी को महत्व देता है, वहीं दूसरी ओर वह संयुक्त राष्ट्र आधारित वैश्विक व्यवस्था का भी समर्थक रहा है। पाकिस्तान समेत 13 देशों ने दी सहमति
अमेरिका के दावे के अनुसार, अब तक 14 देशों ने शांति परिषद में शामिल होने के ट्रंप के आमंत्रण को स्वीकार कर लिया है। इनमें शामिल हैं—
पाकिस्तान, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), वियतनाम, हंगरी, रूस, कजाखस्तान, मोरक्को, मिस्र, बेलारूस, बहरीन, अजरबैजान, आर्मेनिया, कोसोवो, अर्जेंटीना। जिन देशों ने अब तक फैसला नहीं लिया
अभी तक कई प्रमुख देशों ने इस आमंत्रण पर न तो सहमति दी है और न ही इनकार किया है। इनमें शामिल हैं—भारत, जर्मनी, इटली, तुर्किये, यूक्रेन, परागुए, स्लोवेनिया। इन देशों की चुप्पी यह संकेत देती है कि शांति परिषद को लेकर वैश्विक स्तर पर गहरी असमंजस की स्थिति बनी हुई है। 30 देशों की सहमति, 50 को भेजा गया न्योता
व्हाइट हाउस के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप अब तक 50 देशों के नेताओं को शांति परिषद में शामिल होने का आमंत्रण पत्र भेज चुके हैं। अमेरिका का दावा है कि इनमें से करीब 30 देश सैद्धांतिक रूप से परिषद में शामिल होने के लिए सहमत हो चुके हैं। ट्रंप ने इस परिषद में शामिल होने के लिए ईसाई धर्मगुरु पोप लियो को भी औपचारिक आमंत्रण भेजा है, जिसे अमेरिका इस पहल के नैतिक समर्थन के रूप में देख रहा है। शांति परिषद या समानांतर व्यवस्था?
कूटनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप की शांति परिषद केवल गाजा तक सीमित नहीं है। यह पहल संयुक्त राष्ट्र के समानांतर एक वैकल्पिक वैश्विक ढांचा खड़ा करने की कोशिश के रूप में देखी जा रही है। यूरोप और चीन का विरोध इस बात का संकेत है कि दुनिया के बड़े हिस्से अभी भी संयुक्त राष्ट्र आधारित व्यवस्था को ही वैध मानते हैं। ट्रंप की पहल पर बढ़ती दरार
गाजा शांति परिषद को लेकर बढ़ता विरोध यह साफ करता है कि ट्रंप की विदेश नीति एक बार फिर वैश्विक ध्रुवीकरण को जन्म दे रही है। जहां कुछ देश अमेरिका के नेतृत्व को स्वीकार करने को तैयार हैं, वहीं कई बड़ी शक्तियां इसे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए चुनौती मान रही हैं। आने वाले दिनों में भारत, रूस और जर्मनी जैसे देशों के फैसले यह तय करेंगे कि ट्रंप की यह पहल वैश्विक समर्थन हासिल कर पाएगी या नहीं।