वॉशिगटन। Iran US Israel War: अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध को 25 दिन पूरे हो चुके हैं। इस दौरान लगातार हमले, मिसाइल स्ट्राइक और जवाबी कार्रवाई ने पूरे पश्चिम एशिया को अस्थिर कर दिया है। वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संकट, व्यापार बाधाएं और सुरक्षा चिंताएं बढ़ती जा रही हैं। इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का एक बड़ा बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने खुलासा किया है कि ईरान पर सैन्य कार्रवाई का फैसला किस तरह लिया गया। इस बयान ने न सिर्फ अमेरिकी राजनीति में हलचल मचा दी है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नई बहस छेड़ दी है।
रक्षा मंत्री के कहने पर लिया गया फैसला
एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ईरान पर हमले का आदेश उन्होंने अपने रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के सुझाव पर दिया था। ट्रंप ने सीधे तौर पर हेगसेथ की ओर इशारा करते हुए कहा, “पीटर, मुझे लगता है कि आप सबसे पहले बोलने वाले व्यक्ति थे। आपने कहा था—‘चलिए, यह करते हैं।’” इस बयान से साफ होता है कि अमेरिकी प्रशासन के भीतर सैन्य कार्रवाई को लेकर शुरुआती पहल रक्षा मंत्री की ओर से आई थी, जिसे बाद में राष्ट्रपति ने मंजूरी दी।
ईरान की सैन्य ताकत खत्म करना लक्ष्य
रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने भी इस मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट की है। उनके मुताबिक, अमेरिका का मुख्य उद्देश्य ईरान की सैन्य क्षमताओं खासकर मिसाइल, ड्रोन और नौसेना शक्ति को कमजोर करना है। हेगसेथ का मानना है कि ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना बेहद जरूरी है और इसके लिए सैन्य कार्रवाई एक जरूरी कदम था। हालांकि, उन्होंने यह साफ नहीं किया कि यह युद्ध कब और किन शर्तों पर खत्म होगा। इससे यह संकेत मिलता है कि अमेरिका फिलहाल दीर्घकालिक रणनीति के तहत कार्रवाई कर रहा है, जिसका स्पष्ट टाइमलाइन तय नहीं है।
अमेरिकी प्रशासन में मतभेद के संकेत
ट्रंप के बयान से यह भी साफ हुआ है कि इस सैन्य कार्रवाई को लेकर अमेरिकी प्रशासन के भीतर पूरी सहमति नहीं थी। ट्रंप ने खुद स्वीकार किया कि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस इस फैसले से पूरी तरह सहमत नहीं थे। हालांकि, उन्होंने सार्वजनिक रूप से इसका विरोध भी नहीं किया। यह स्थिति दर्शाती है कि अमेरिकी नेतृत्व के भीतर इस युद्ध को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण मौजूद हैं, कुछ इसे जरूरी रणनीतिक कदम मानते हैं, तो कुछ इसके संभावित दुष्परिणामों को लेकर चिंतित हैं।
परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय तनाव
ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर लंबे समय से अमेरिका और उसके सहयोगियों की चिंता बनी हुई है। अमेरिका का आरोप है कि ईरान गुप्त रूप से परमाणु हथियार विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है, जबकि ईरान इन आरोपों से इनकार करता रहा है। इसी मुद्दे के चलते दोनों देशों के बीच तनाव लगातार बढ़ता गया, जो अंततः सैन्य टकराव में बदल गया। इजरायल, जो पहले से ही ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपनाए हुए है, इस संघर्ष में अमेरिका के साथ खड़ा है।
ऊर्जा संकट और बाजारों में अस्थिरता
इस युद्ध का असर सिर्फ पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कीमतें बढ़ रही हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर भी असर पड़ा है, जिससे वैश्विक व्यापार और शिपिंग पर दबाव बढ़ा है। कई देशों की अर्थव्यवस्था इस अस्थिरता से प्रभावित हो रही है।
कूटनीतिक प्रयास जारी, लेकिन समाधान दूर
हालांकि युद्ध जारी है, लेकिन कूटनीतिक स्तर पर इसे रोकने की कोशिशें भी तेज हो रही हैं। कई देश मध्यस्थता की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि तनाव को कम किया जा सके। फिर भी, अब तक किसी ठोस सीजफायर या समझौते की घोषणा नहीं हुई है। अमेरिका और ईरान दोनों ही अपने-अपने रुख पर अडिग नजर आ रहे हैं।
ट्रंप के बयान का राजनीतिक असर
ट्रंप का यह बयान अमेरिकी राजनीति में भी बहस का विषय बन गया है। आलोचकों का कहना है कि इतनी बड़ी सैन्य कार्रवाई का निर्णय व्यापक सहमति और रणनीतिक चर्चा के बाद होना चाहिए था। वहीं, समर्थकों का मानना है कि ईरान के खतरे को देखते हुए यह कदम जरूरी था और इससे अमेरिका की सुरक्षा मजबूत होगी।