बांग्लादेश चुनाव की बिसात बदली: जमात-ए-इस्लामी सत्ता के करीब, तारिक रहमान उभरे पीएम पद के मजबूत दावेदार

बांग्लादेश में 12 फरवरी को 300 सीटों वाली संसद के लिए चुनाव होने हैं। अवामी लीग की नेता और पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के सत्ता से हटने और देश छोड़ने के बाद यह पहला आम चुनाव है। विपक्षी दलों और नए गठबंधनों को मजबूती मिलती दिख रही है।

Update: 2026-01-23 03:24 GMT
ढाका। बांग्लादेश में अगले माह होने वाले आम चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। बुधवार से चुनाव प्रचार औपचारिक रूप से शुरू हो चुका है और इस बार का चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक माना जा रहा है। पहली बार ऐसा हो रहा है जब देश की सबसे प्रभावशाली नेता और अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना चुनावी मैदान से पूरी तरह बाहर हैं। उनके बिना हो रहे इस चुनाव में एक बड़े उलटफेर की संभावनाएं जताई जा रही हैं।

एक न्यूज एजेंसी के अनुसार, हाल ही में कराए गए दो अलग-अलग आंतरिक सर्वेक्षणों में चौंकाने वाले संकेत मिले हैं। लंबे समय तक हाशिये पर रही कट्टरपंथी पार्टी जमात-ए-इस्लामी पहली बार सत्ता के बेहद करीब पहुंचती दिखाई दे रही है। सर्वे में जमात को बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के बाद दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत के रूप में उभरते हुए बताया गया है।

12 फरवरी को 300 सीटों के लिए मतदान

बांग्लादेश में 12 फरवरी को 300 सीटों वाली संसद के लिए चुनाव होने हैं। अवामी लीग की नेता और पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के सत्ता से हटने और देश छोड़ने के बाद यह पहला आम चुनाव है। विपक्षी दलों और नए गठबंधनों को मजबूती मिलती दिख रही है।

जमात-ए-इस्लामी की अप्रत्याशित वापसी

सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक, जमात-ए-इस्लामी न सिर्फ चुनावी मैदान में प्रभावी वापसी कर रही है, बल्कि कई क्षेत्रों में वह बीएनपी को भी कड़ी टक्कर देती नजर आ रही है। जमात को ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान समर्थक पार्टी माना जाता है और उसने 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम का विरोध किया था। इसी कारण आजादी के बाद 1972 में पार्टी पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। हालांकि, 1975 में प्रतिबंध हटाया गया और बाद में 1979 में तत्कालीन राष्ट्रपति जियाउर रहमान के शासनकाल में जमात को चुनावों में हिस्सा लेने की अनुमति मिली। इसके बावजूद, पार्टी लंबे समय तक मुख्यधारा की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने में असफल रही। मौजूदा चुनावी माहौल में उसकी बढ़ती ताकत को एक बड़े राजनीतिक बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

धर्मनिरपेक्ष ढांचे पर खतरे की आशंका

जमात-ए-इस्लामी की मजबूती को लेकर धर्मनिरपेक्ष और उदारवादी समूहों में गहरी चिंता है। आलोचकों का कहना है कि जमात की विचारधारा बांग्लादेश की धर्मनिरपेक्ष बुनियाद को चुनौती देती है, जिस पर देश की स्थापना हुई थी। चुनावी सर्वे में जमात की स्थिति मजबूत होने से यह बहस भी तेज हो गई है कि आने वाले समय में देश की नीतियों और सामाजिक ढांचे पर इसका क्या असर पड़ेगा।

नए गठबंधन और छात्र राजनीति की एंट्री

इस बार चुनाव में केवल पारंपरिक दल ही नहीं, बल्कि जन-आंदोलनों से निकले नए राजनीतिक समूह भी सक्रिय हैं। छात्र नेताओं द्वारा गठित नेशनल सिटिजन पार्टी (एनसीपी) भी एक बड़े गठबंधन का हिस्सा है। एनसीपी ने खुद को भ्रष्टाचार विरोधी और जनहित की राजनीति करने वाली ताकत के रूप में पेश किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन नए दलों की मौजूदगी से वोटों का बंटवारा होगा, जिसका अप्रत्यक्ष लाभ जमात और बीएनपी जैसे संगठित दलों को मिल सकता है।

शेख हसीना के जाने के बाद बदला सत्ता समीकरण

गौरतलब है कि पांच अगस्त 2024 को बड़े पैमाने पर हुए जन-आंदोलन और हिंसक दमन के बीच शेख हसीना देश छोड़कर भारत चली गई थीं। इसके तीन दिन बाद मुहम्मद यूनुस ने अंतरिम भूमिका संभाली। हालांकि, यूनुस पर भी एक पक्ष को तरजीह देने और निष्पक्षता न बरतने के आरोप लगते रहे हैं, जिससे चुनाव की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठे हैं।

तारिक रहमान बने प्रधानमंत्री पद के बड़े दावेदार

इस बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य में बीएनपी अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के पुत्र तारिक रहमान को प्रधानमंत्री पद का सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है। खालिदा जिया की राजनीतिक विरासत और उनकी लोकप्रियता का लाभ बीएनपी को मिल रहा है। खालिदा जिया का पिछले महीने निधन हो गया था, जिसके बाद पार्टी के समर्थकों में भावनात्मक एकजुटता देखने को मिल रही है। इसी बीच, 17 वर्षों के निर्वासन के बाद तारिक रहमान पिछले महीने ब्रिटेन से बांग्लादेश लौटे हैं, जिससे बीएनपी को नया संबल मिला है।

सिलहट से चुनावी आगाज

तारिक रहमान ने बृहस्पतिवार को सिलहट में एक बड़ी रैली को संबोधित कर अपने चुनाव अभियान का आगाज किया। रैली में भारी भीड़ जुटी, जिसे बीएनपी अपनी बढ़ती लोकप्रियता का संकेत बता रही है। रहमान ने अपने भाषण में लोकतंत्र की बहाली, अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और कानून-व्यवस्था सुधारने का वादा किया।

राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में चुनाव

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह चुनाव बांग्लादेश के भविष्य की दिशा तय करेगा। एक ओर जहां बीएनपी सत्ता में वापसी की कोशिश कर रही है, वहीं जमात-ए-इस्लामी का उभार देश की राजनीति में नए और विवादास्पद सवाल खड़े कर रहा है। अब देखना यह होगा कि 12 फरवरी को जनता किसे सत्ता की चाबी सौंपती है- बीएनपी के अनुभवी नेतृत्व को, जमात की उभरती ताकत को, या फिर किसी अप्रत्याशित गठबंधन को।

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