अमेरिका पर बढ़ता कर्ज बना चिंता का कारण, ईरान युद्ध के बाद पेट्रोडॉलर व्यवस्था पर भी मंडराने लगे सवाल
अमेरिकी अर्थव्यवस्था की एक बड़ी विशेषता उसकी खुली निवेश प्रणाली है। दुनिया का कोई भी देश या निवेशक अमेरिका में आसानी से निवेश कर सकता है और जरूरत पड़ने पर पैसा निकाल भी सकता है। यही व्यवस्था अब अमेरिका के लिए जोखिम का कारण बनती दिख रही है।;
टोरंटो : दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत माने जाने वाले अमेरिका के सामने अब गंभीर वित्तीय चुनौतियां खड़ी होती दिखाई दे रही हैं। पहली बार ऐसा हुआ है जब अमेरिका का सार्वजनिक कर्ज उसकी कुल अर्थव्यवस्था यानी जीडीपी से भी अधिक हो गया है। मार्च 2026 के अंत तक अमेरिकी सार्वजनिक कर्ज करीब 31.27 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच गया, जबकि देश की जीडीपी लगभग 31.22 लाख करोड़ डॉलर रही। इस स्थिति ने वैश्विक बाजारों और निवेशकों के बीच चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल आंकड़ों का अंतर नहीं, बल्कि अमेरिकी आर्थिक ढांचे के लिए एक बड़ा संकेत है। लंबे समय से अमेरिका अपनी मजबूत वित्तीय प्रणाली, डॉलर की वैश्विक ताकत और विदेशी निवेश के दम पर अर्थव्यवस्था को संभालता रहा है, लेकिन अब हालात पहले जैसे नहीं दिख रहे।
खाड़ी देशों का बदलता रुख बढ़ा रहा चिंता
अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चिंता केवल बढ़ता कर्ज नहीं, बल्कि उसके पारंपरिक सहयोगी खाड़ी देशों का बदलता रुख भी है। अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान के खिलाफ बढ़ती सैन्य गतिविधियों और पश्चिम एशिया में तनाव के कारण खाड़ी देशों के भीतर असुरक्षा की भावना बढ़ी है। इसका असर उनके निवेश संबंधी फैसलों पर भी पड़ता दिखाई दे रहा है। खाड़ी देशों ने अमेरिका में करीब दो लाख करोड़ डॉलर का निवेश कर रखा है। इसमें अमेरिकी सरकारी बांड, शेयर बाजार, रियल एस्टेट और रक्षा क्षेत्र तक में बड़ी हिस्सेदारी शामिल है। यदि ये देश अपने निवेश को कम करना शुरू करते हैं, तो अमेरिकी वित्तीय बाजारों पर गहरा असर पड़ सकता है।
निवेश निकासी से बाजारों में उथल-पुथल का खतरा
अमेरिकी अर्थव्यवस्था की एक बड़ी विशेषता उसकी खुली निवेश प्रणाली है। दुनिया का कोई भी देश या निवेशक अमेरिका में आसानी से निवेश कर सकता है और जरूरत पड़ने पर पैसा निकाल भी सकता है। यही व्यवस्था अब अमेरिका के लिए जोखिम का कारण बनती दिख रही है।
आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि अगर खाड़ी देशों ने बड़े पैमाने पर अमेरिकी संपत्तियां बेचनी शुरू कर दीं, तो शेयर बाजार और बांड बाजार में भारी गिरावट आ सकती है। ऐसी स्थिति 2008 की वैश्विक मंदी जैसी आर्थिक उथल-पुथल पैदा कर सकती है। बाजारों में गिरावट आने से अमेरिका की उधारी लागत बढ़ेगी और वैश्विक अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है। क्योंकि अमेरिकी डॉलर अभी भी दुनिया की प्रमुख रिजर्व मुद्रा है, इसलिए अमेरिका में पैदा होने वाला आर्थिक संकट दुनिया के कई देशों तक असर डाल सकता है।
डॉलर को बचाने के लिए नई रणनीति
बढ़ते जोखिम को देखते हुए अमेरिका अब वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए ‘स्वैप लाइन’ जैसी व्यवस्थाओं का सहारा ले रहा है। इसके तहत अमेरिकी फेडरल रिजर्व दूसरे देशों के केंद्रीय बैंकों को डॉलर उपलब्ध कराता है ताकि वे अपनी अमेरिकी संपत्तियां बेचने के बजाय डॉलर की तरलता बनाए रख सकें। यह तरीका अमेरिका पहले भी इस्तेमाल कर चुका है। 2008 की आर्थिक मंदी के दौरान भी फेडरल रिजर्व ने कई देशों को डॉलर उपलब्ध कराए थे ताकि वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में भरोसा बना रहे। विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका की पूरी वित्तीय ताकत लंबे समय तक पेट्रोडॉलर व्यवस्था पर आधारित रही है। यही कारण है कि अमेरिका अब उस व्यवस्था को कमजोर होने से बचाने की कोशिश कर रहा है।
क्या है पेट्रोडॉलर व्यवस्था
पेट्रोडॉलर सिस्टम की शुरुआत 1974 में अमेरिका और सऊदी अरब के बीच हुए समझौते से हुई थी। इस समझौते के तहत दुनिया भर में तेल का कारोबार अमेरिकी डॉलर में होने लगा। खाड़ी देशों को तेल बेचने के बदले डॉलर प्राप्त होते थे और वे उसी पूंजी का बड़ा हिस्सा अमेरिका में निवेश कर देते थे। इसके बदले अमेरिका खाड़ी देशों को सुरक्षा और सैन्य सहयोग प्रदान करता था। इस व्यवस्था ने अमेरिकी डॉलर को वैश्विक स्तर पर मजबूत बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाई। दशकों तक यह प्रणाली अमेरिका के लिए आर्थिक ताकत का आधार बनी रही, क्योंकि दुनिया के अधिकांश देशों को तेल खरीदने के लिए डॉलर की जरूरत पड़ती थी।
बदलते हालात से कमजोर पड़ रहा सिस्टम
अब हालात तेजी से बदलते दिखाई दे रहे हैं। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, ईरान से जुड़े खतरे और होर्मुज जलडमरूमध्य में अस्थिरता ने खाड़ी देशों को नई रणनीति अपनाने पर मजबूर कर दिया है। इसी बीच संयुक्त अरब अमीरात के ओपेक से अलग होने की खबरों ने भी बाजारों का ध्यान खींचा है। खाड़ी देश अब अपनी ऊर्जा नीति, निवेश और विदेशी संबंधों में अधिक स्वतंत्रता चाहते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह माना जा रहा है कि कुछ खाड़ी देश चीन के साथ युआन में तेल व्यापार बढ़ाने के संकेत दे रहे हैं। यदि तेल कारोबार में डॉलर की जगह दूसरी मुद्राओं का उपयोग बढ़ता है, तो इससे डॉलर की वैश्विक पकड़ कमजोर हो सकती है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है असर
अमेरिका का बढ़ता कर्ज, खाड़ी देशों का बदलता निवेश रुख और पेट्रोडॉलर व्यवस्था पर उठते सवाल केवल अमेरिकी समस्या नहीं हैं। इसका असर वैश्विक वित्तीय व्यवस्था, ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ सकता है।
आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले वर्षों में दुनिया धीरे-धीरे बहु-मुद्रा प्रणाली की ओर बढ़ सकती है, जहां डॉलर के साथ-साथ युआन और अन्य मुद्राओं की भूमिका भी मजबूत होगी। हालांकि फिलहाल डॉलर की स्थिति मजबूत बनी हुई है, लेकिन बदलते भू-राजनीतिक हालात अमेरिका के लिए नई चुनौतियां जरूर खड़ी कर रहे हैं।