चुनावों से पहले नेपाल में उठी राजशाही बहाली की मांग,सड़कों पर उतरे राजपरिवार के समर्थक

प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि 2008 में गणतंत्र लागू होने के बाद से नेपाल राजनीतिक अस्थिरता, भ्रष्टाचार और बार-बार सरकारों के बदलने की समस्या से जूझ रहा है।

Update: 2026-01-12 07:23 GMT
काठमांडू। नेपाल में एक बार फिर राजशाही की बहाली की मांग जोर पकड़ने लगी है। अपदस्थ शाह राजपरिवार के समर्थकों ने रविवार को राजधानी काठमांडू में रैली निकालकर पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह की वापसी और संवैधानिक राजशाही की पुनर्स्थापना की मांग की। यह प्रदर्शन ऐसे समय में हुआ है जब देश मार्च में प्रस्तावित संसदीय चुनावों की तैयारी कर रहा है और सितंबर में हुए हिंसक युवा आंदोलनों के बाद अंतरिम सरकार सत्ता संभाल रही है।

मार्च चुनावों से पहले सड़कों पर उतरे राजशाही समर्थक
रविवार की यह रैली अपदस्थ राजा ज्ञानेंद्र शाह के समर्थकों की ओर से बीते महीनों में किया गया पहला बड़ा सार्वजनिक प्रदर्शन माना जा रहा है। सितंबर में असंतुष्ट युवाओं के नेतृत्व में हुए व्यापक विरोध प्रदर्शनों और हिंसा के बाद देश की राजनीति में उथल-पुथल मची थी। इन घटनाओं के बाद अंतरिम सरकार का गठन हुआ और मार्च में नए संसदीय चुनाव कराने की घोषणा की गई। ऐसे माहौल में राजशाही समर्थकों की यह रैली राजनीतिक रूप से अहम मानी जा रही है।

पृथ्वी नारायण शाह की प्रतिमा के पास जुटी भीड़
रैली में शामिल लोग नेपाल की राजधानी के प्रमुख चौराहों से होते हुए 18वीं शताब्दी में शाह वंश की स्थापना करने वाले राजा पृथ्वी नारायण शाह की प्रतिमा के पास एकत्र हुए। प्रदर्शनकारियों ने वहां नारे लगाए— “हम अपने राजा से प्यार करते हैं”, “राजा को वापस लाओ”, “देश बचाने के लिए राजशाही जरूरी है।”

रैली में नेपाली राष्ट्रीय ध्वज के साथ-साथ पूर्व राजपरिवार के समर्थन में लिखे बैनर और पोस्टर भी देखे गए। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था देश को स्थिरता देने में नाकाम रही है।

गणतंत्र से निराशा, राजशाही में उम्मीद
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि 2008 में गणतंत्र लागू होने के बाद से नेपाल राजनीतिक अस्थिरता, भ्रष्टाचार और बार-बार सरकारों के बदलने की समस्या से जूझ रहा है। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक संस्थाएं जनता की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पाईं और युवाओं में बढ़ता असंतोष इसका प्रमाण है।

रैली में शामिल सम्राट थापा ने कहा, “इस देश के लिए अंतिम और एकमात्र विकल्प राजा और राजशाही ही है। वर्तमान संदर्भ और जेन जी आंदोलन के बाद जिस रास्ते पर देश चल पड़ा है, उसे देखते हुए स्थिति को संभालने के लिए राजशाही की बहाली जरूरी है।” उनका मानना है कि संवैधानिक राजशाही देश को एकजुट रखने और राजनीतिक टकराव को कम करने का काम कर सकती है।

2008 में खत्म हुई थी 240 साल पुरानी राजशाही
नेपाल में शाह वंश की राजशाही का इतिहास करीब ढाई सौ साल पुराना रहा है। राजा पृथ्वी नारायण शाह ने 18वीं शताब्दी में नेपाल का एकीकरण कर शाह वंश की नींव रखी थी। अंतिम शाह राजा ज्ञानेंद्र शाह को 2006 में लोकतांत्रिक आंदोलन के बाद सत्ता छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके बाद 2008 में संविधान सभा ने आधिकारिक तौर पर राजशाही समाप्त कर नेपाल को गणतंत्र घोषित कर दिया। राजा ज्ञानेंद्र के सत्ता से हटने के बाद नेपाल में राष्ट्रपति प्रणाली लागू हुई, लेकिन तब से अब तक देश ने कई राजनीतिक संकट देखे हैं। इसी पृष्ठभूमि में राजशाही समर्थक अब फिर से अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं।

सितंबर के युवा आंदोलन की छाया
विशेषज्ञों का मानना है कि हालिया रैली का सीधा संबंध सितंबर में हुए युवाओं के हिंसक आंदोलनों से है। बेरोजगारी, महंगाई और राजनीतिक अस्थिरता से नाराज युवाओं ने कई शहरों में प्रदर्शन किए थे, जिनमें हिंसा और तोड़फोड़ की घटनाएं भी सामने आई थीं। इन प्रदर्शनों के बाद सरकार पर दबाव बढ़ा और अंततः अंतरिम व्यवस्था तथा नए चुनावों की घोषणा करनी पड़ी। राजशाही समर्थकों का तर्क है कि यह सब इस बात का संकेत है कि मौजूदा व्यवस्था असफल हो रही है और देश को एक “राष्ट्रीय प्रतीक” के रूप में राजा की जरूरत है।

सरकार और प्रमुख दलों की चुप्पी
रैली को लेकर फिलहाल सरकार या प्रमुख राजनीतिक दलों की ओर से कोई तीखी प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों का लंबे समय से यही रुख रहा है कि नेपाल का भविष्य लोकतांत्रिक गणतंत्र में ही सुरक्षित है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राजशाही की बहाली की मांग भले ही सुर्खियों में हो, लेकिन इसके लिए संविधान में बड़े बदलाव की जरूरत होगी, जो मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में आसान नहीं है।

चुनावी माहौल में बढ़ता दबाव
मार्च में होने वाले संसदीय चुनावों से पहले इस तरह के प्रदर्शनों से राजनीतिक दलों पर दबाव बढ़ सकता है। राजशाही समर्थक इसे चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश कर सकते हैं, जबकि गणतंत्र समर्थक दल इसे लोकतंत्र के खिलाफ कदम बता सकते हैं। फिलहाल काठमांडू की रैली ने यह स्पष्ट कर दिया है कि नेपाल में राजशाही का मुद्दा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। देश की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां भविष्य की दिशा को लेकर बहस तेज होती दिख रही है।

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