प्रदूषण से बढ़ रहा डायबिटीज का संकट, सेहत के साथ जेब और अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा सीधा असर

विशेषज्ञों का कहना है कि यह चेतावनी किसी अनुमान या आशंका पर आधारित नहीं है, बल्कि दशकों के वैज्ञानिक शोध, स्वास्थ्य आंकड़ों और आर्थिक विश्लेषण का नतीजा है। अध्ययन में साफ तौर पर कहा गया है कि वायु प्रदूषण, शहरीकरण, बदलती जीवनशैली और स्वास्थ्य सुविधाओं की असमान उपलब्धता मिलकर डायबिटीज को वैश्विक संकट में बदल रहे हैं।

Update: 2026-01-20 22:27 GMT
नई दिल्ली: वायु प्रदूषण लंबे समय से सांस, फेफड़े और हृदय रोगों के लिए जिम्मेदार माना जाता रहा है, लेकिन अब यह एक और गंभीर बीमारी डायबिटीज को तेजी से बढ़ावा दे रहा है। इसका असर सिर्फ लोगों की सेहत तक सीमित नहीं है, बल्कि उनकी आर्थिक स्थिति और देशों की अर्थव्यवस्था पर भी गहरा पड़ रहा है। प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल नेचर मेडिसिन में प्रकाशित एक व्यापक अध्ययन में विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर मौजूदा हालात पर जल्द नियंत्रण नहीं किया गया, तो वर्ष 2050 तक डायबिटीज दुनिया को 7,10,52,800 हजार करोड़ रुपये से अधिक का प्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान पहुंचा सकती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह चेतावनी किसी अनुमान या आशंका पर आधारित नहीं है, बल्कि दशकों के वैज्ञानिक शोध, स्वास्थ्य आंकड़ों और आर्थिक विश्लेषण का नतीजा है। अध्ययन में साफ तौर पर कहा गया है कि वायु प्रदूषण, शहरीकरण, बदलती जीवनशैली और स्वास्थ्य सुविधाओं की असमान उपलब्धता मिलकर डायबिटीज को वैश्विक संकट में बदल रहे हैं।

अमेरिका, भारत और चीन सबसे ज्यादा प्रभावित

अध्ययन के अनुसार, अमेरिका, भारत और चीन इस आर्थिक मार से सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। इन तीनों देशों में वायु प्रदूषण का स्तर चिंताजनक है और साथ ही डायबिटीज के मरीजों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। सबसे गंभीर तथ्य यह है कि दुनिया भर में डायबिटीज से पीड़ित करीब 45 प्रतिशत लोगों को अपनी बीमारी का पता ही नहीं होता। इनमें से लगभग 90 प्रतिशत मरीज इन्हीं देशों में रहते हैं। यानी वास्तविक संकट सामने दिख रहे आंकड़ों से कहीं बड़ा है।

पीएम 2.5 और डायबिटीज का गहरा संबंध

प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल बीएमजे ओपन डायबिटीज रिसर्च एंड केयर में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में वायु प्रदूषण और टाइप-2 डायबिटीज के बीच सीधा संबंध स्थापित किया गया है। अध्ययन के मुताबिक पीएम 2.5 जैसे बेहद बारीक प्रदूषक कणों के लंबे समय तक संपर्क में रहने से टाइप-2 डायबिटीज का खतरा 22 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। दिल्ली और चेन्नई जैसे महानगरों में 12 हजार से अधिक लोगों पर सात वर्षों तक किए गए अध्ययन में यह सामने आया कि जैसे-जैसे वायु प्रदूषण का स्तर बढ़ता है, वैसे-वैसे लोगों का ब्लड शुगर लेवल भी बढ़ता है। इसका नतीजा यह होता है कि डायबिटीज के नए मरीज लगातार सामने आते हैं और पहले से पीड़ित मरीजों में बीमारी का नियंत्रण बिगड़ जाता है।

प्रदूषण वाले दिन, बढ़ती परेशानी

डॉक्टरों के अनुसार, अत्यधिक प्रदूषण वाले दिनों में डायबिटीज से जूझ रहे मरीजों में शुगर लेवल असंतुलित हो जाता है। ऐसे समय में दवाइयों की खुराक बढ़ानी पड़ती है और अतिरिक्त जांच करानी जरूरी हो जाती है। इससे इलाज का खर्च अचानक बढ़ जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि प्रदूषण शरीर में सूजन (इंफ्लेमेशन) और इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ाता है, जो टाइप-2 डायबिटीज की प्रमुख वजहों में शामिल है। इस कारण प्रदूषण न केवल बीमारी बढ़ा रहा है, बल्कि इलाज को भी लगातार महंगा बना रहा है।

भारत में डायबिटीज और जेब पर बोझ

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) और पब्लिक हेल्थ स्टडीज के अनुसार, भारत में एक डायबिटीज मरीज पर औसतन 15 से 20 हजार रुपये सालाना निजी खर्च आता है। महानगरों, विशेषकर दिल्ली जैसे शहरों में यह खर्च 25 हजार रुपये से ऊपर पहुंच जाता है। देश की कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था के चलते करीब 98 प्रतिशत मरीजों को इलाज का खर्च अपनी जेब से उठाना पड़ता है। नेशनल हेल्थ अकाउंट्स के आंकड़ों के मुताबिक भारत में इलाज पर होने वाले कुल खर्च का लगभग आधा हिस्सा लोगों को खुद वहन करना पड़ता है। डायबिटीज जैसी नॉन-कम्युनिकेबल बीमारी कई परिवारों की सालाना आय का 10 से 20 प्रतिशत तक खर्च करवा रही है, जिससे मध्यम और निम्न आय वर्ग पर आर्थिक दबाव लगातार बढ़ रहा है।

बीमारी एक, नुकसान कई

डायबिटीज केवल ब्लड शुगर बढ़ने तक सीमित बीमारी नहीं है। इससे पीड़ित व्यक्ति को समय से पहले मृत्यु का खतरा रहता है। यह बीमारी हृदय, आंखों, गुर्दों, त्वचा और नसों को गंभीर रूप से प्रभावित करती है। साथ ही यह रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर देती है, जिससे अन्य बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। नेचर मेडिसिन अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2001 में दुनिया भर में करीब 53 करोड़ 70 लाख लोग डायबिटीज से पीड़ित थे। इनमें से तीन-चौथाई से अधिक मरीज निम्न और मध्यम आय वाले देशों में रहते हैं। यह आंकड़ा साफ बताता है कि डायबिटीज का सबसे बड़ा बोझ उन देशों पर है, जहां स्वास्थ्य सुविधाएं पहले से ही सीमित हैं।

भारत पर बढ़ता आर्थिक दबाव

अध्ययन में 204 देशों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है। इसके अनुसार, वर्ष 2020 से 2050 के बीच भारत को अकेले डायबिटीज के कारण लगभग 1.32 लाख अरब रुपये का आर्थिक नुकसान हो सकता है। इस नुकसान में इलाज, दवाइयों, नियमित जांच, समय से पहले मृत्यु और कामकाजी क्षमता में कमी से जुड़ा खर्च शामिल है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह आर्थिक नुकसान केवल स्वास्थ्य बजट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश की उत्पादकता, श्रम शक्ति और विकास दर पर भी नकारात्मक असर डालेगा।

वैश्विक स्तर पर बढ़ता संकट

डायबिटीज का यह संकट सिर्फ भारत या दिल्ली तक सीमित नहीं है। वर्ष 2025 में नेचर मेडिसिन जर्नल में प्रकाशित एक वैश्विक अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2050 तक डायबिटीज दुनिया को करीब 83 लाख करोड़ रुपये का प्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान पहुंचा सकती है। अध्ययन बताता है कि अगर मरीजों की देखभाल, इलाज, कामकाजी नुकसान और समय से पहले मृत्यु से होने वाले नुकसान को जोड़ा जाए, तो यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 7,10,52,800 हजार करोड़ रुपये से अधिक हो सकता है।

समाधान की जरूरत

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वायु प्रदूषण पर सख्त नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में डायबिटीज के मरीजों की संख्या और तेजी से बढ़ेगी। इससे आम आदमी का स्वास्थ्य बजट और ज्यादा बिगड़ेगा और सरकारों पर भी आर्थिक दबाव बढ़ेगा। विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि प्रदूषण नियंत्रण, समय पर जांच, जनजागरूकता और मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था ही इस बढ़ते संकट से निपटने का एकमात्र रास्ता है।


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