भारत: स्कूलों के 50 मीटर दायरे से दूर होगा जंक फूड?
बच्चों में मोटापा रोकने के लिए भारत सरकार स्कूलों के आसपास हाई फैट, शुगर और नमक वाले खाद्य पदार्थों की बिक्री सीमित करने पर विचार कर रही है;
बच्चों में मोटापा रोकने के लिए भारत सरकार स्कूलों के आसपास हाई फैट, शुगर और नमक वाले खाद्य पदार्थों की बिक्री सीमित करने पर विचार कर रही है. हालांकि इससे छोटे दुकानदारों और बड़ी खाद्य कंपनियों दोनों पर असर पड़ सकता है.
भारत में स्कूलों के 50 मीटर दायरे में जंक फूड की बिक्री पर रोक लगाने की तैयारी हो रही है. सरकार इसे बच्चों में बढ़ते मोटापे से जोड़ रही है, जबकि दुकानदार और खाद्य उद्योग कारोबार पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंतित हैं. प्रस्तावित नियमों के तहत स्कूलों के 50 मीटर के दायरे में हाई फैट, हाई शुगर और हाई सॉल्ट (एचएफएसएस) खाद्य पदार्थों की बिक्री पर रोक लगाई जा सकती है. यह कदम ऐसे समय में उठाया जा रहा है जब देश में बच्चों के बीच मोटापा तेजी से बढ़ रहा है और स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे भविष्य की गंभीर चुनौती मान रहे हैं.
इस प्रस्ताव का सबसे अधिक असर स्कूलों के आसपास स्थित छोटी किराना दुकानों, रेस्तरां और ठेलों पर पड़ सकता है. इन दुकानों पर आमतौर पर कोल्ड ड्रिंक, चिप्स, चॉकलेट, बर्गर, पिज्जा और समोसे जैसे उत्पाद बिकते हैं, जिन्हें बच्चे काफी पसंद करते हैं. अगर नियम लागू होते हैं तो इन उत्पादों की बिक्री सीमित हो जाएगी, जिससे छोटे कारोबारियों की आय प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है.
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यह कानून, जिसे पहली बार 2020 में प्रस्तावित किया गया था, अभी तक लागू नहीं हुआ है और इसकी कोई निश्चित समयसीमा तय नहीं की गई है. देशभर में चल रहे खाद्य सुरक्षा अभियान के बीच संबंधित प्राधिकरण ने इस अगस्त में वसा, नमक और चीनी की ऐसी सीमाएं जारी कीं, जिनसे अधिक मात्रा होने पर उत्पादों की स्कूल परिसरों के भीतर और आसपास बिक्री पर प्रतिबंध लगाया जा सकेगा. इन प्रस्तावित मानकों पर जनता और संबंधित पक्षों से सुझाव व आपत्तियां मांगी गई हैं, जिसके लिए 6 अक्टूबर तक प्रतिक्रिया देने की समयसीमा निर्धारित की गई है. इसके बाद मिले सुझावों की समीक्षा कर नियमों को अंतिम रूप दिया जा सकता है.
छोटे दुकानदारों और खाद्य कंपनियों पर पड़ सकता है असर
खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) का मानना है कि बच्चों में कम उम्र से ही स्वस्थ खानपान की आदत विकसित करना जरूरी है. प्राधिकरण के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रजित पुन्हानी के मुताबिक, "इस पहल का उद्देश्य बच्चों को अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों से दूर रखना और कंपनियों को अपने उत्पादों के फॉर्मूले में सुधार के लिए प्रेरित करना है." उनका कहना है कि दुकानदारों के लिए अन्य स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थ बेचने के पर्याप्त अवसर मौजूद रहेंगे.
दरअसल, भारत में जंक फूड की लोकप्रियता पिछले कुछ सालों में तेजी से बढ़ी है. चिप्स, चॉकलेट, इंस्टेंट नूडल्स और कोल्ड ड्रिंक्स जैसे उत्पाद अब शहरी ही नहीं, ग्रामीण और कम आय वर्ग के उपभोक्ताओं तक भी पहुंच चुके हैं. कई परिवार विदेशी ब्रांडों को बेहतर लाइफस्टाइल का प्रतीक मानते हैं, जबकि सस्ती कीमतें भी इन उत्पादों की मांग बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं.
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भारत में बच्चों के बीच बढ़ता मोटापा
वर्ल्ड ओबेसिटी फेडरेशन के आंकड़े इस चिंता को और गंभीर बनाते हैं. फेडरेशन के मुताबिक, भारत में 5 से 19 वर्ष आयु वर्ग के अधिक वजन या मोटापे से ग्रस्त बच्चों की संख्या 2015 में 2.8 करोड़ थी, जो 2025 में बढ़कर 4.1 करोड़ हो गई है. अनुमान है कि 2040 तक यह संख्या 5.6 करोड़ तक पहुंच सकती है. स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि बचपन में बढ़ता मोटापा भविष्य में मधुमेह, हृदय रोग और अन्य गंभीर बीमारियों का जोखिम बढ़ाता है.
इस बीच, महाराष्ट्र ने इस दिशा में पहले ही सख्त रुख अपनाया है. राज्य सरकार ने स्कूलों के 50 मीटर के भीतर स्थित दुकानों में एचएफएसएस उत्पाद रखने पर रोक लगाने की नीति लागू की है. राज्य के खाद्य सुरक्षा विभाग के निरीक्षण में कई दुकानों में नियमों के उल्लंघन के मामले सामने आए हैं, जिसके बाद कुछ प्रतिष्ठानों के खिलाफ कार्रवाई भी की गई है. राज्य के खाद्य सुरक्षा आयुक्त तुकाराम मुंडे ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया कि स्कूलों के 50 मीटर के दायरे में स्थित किसी भी दुकान में ऐसे उत्पाद रखे ही नहीं जा सकते. मुंडे ने कहा, "स्कूलों के आसपास ऐसी सैकड़ों दुकानें मौजूद हैं. यह कैसे नियंत्रित किया जाएगा कि वे ये उत्पाद स्कूली बच्चों को बेच रही हैं या नहीं? इसलिए दुकानों में इन चीजों को रखा ही नहीं जा सकता."
रॉयटर्स द्वारा देखे गए राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार, निरीक्षकों ने अब तक स्कूलों के 50 मीटर के दायरे में स्थित 133 दुकानों में नियमों के उल्लंघन के मामले पाए हैं. इसके बाद 51 दुकानों को अपना व्यवसाय बंद करने के आदेश दिए गए हैं.
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नियम को लेकर चिंता में दुकानदार
पूर्वी भारत के भुवनेश्वर शहर में स्कूलों के आसपास स्थित कई छोटे कारोबारी और किराना दुकानदार इस नियम को लेकर चिंता जता रहे हैं. करीब एक दर्जन दुकानदारों का कहना है कि अगर एचएफएसएस (हाई-फैट, हाई-शुगर और हाई-सॉल्ट) उत्पादों की बिक्री पर सख्ती से रोक लागू हुई, तो उनकी बिक्री में एक-तिहाई या उससे अधिक की गिरावट आ सकती है.
उद्योग जगत और व्यापारिक संगठनों ने इस प्रस्ताव पर चिंता जताई है. उनका तर्क है कि भारत के अधिकांश स्कूल घनी आबादी वाले बाजार क्षेत्रों में स्थित हैं, जहां यह तय करना मुश्किल होगा कि उत्पाद बच्चों के लिए खरीदे जा रहे हैं या आम ग्राहकों के लिए. फिर भी, स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह नीति प्रभावी ढंग से लागू हुई तो भारत बच्चों के स्वास्थ्य की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठा सकेगा, जैसा कि चिली सहित कई देशों में ऐसे नियमों के बाद सकारात्मक नतीजे देखने को मिले हैं.
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साल 2016 में चिली ने पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर अनिवार्य चेतावनी लेबल लगाने के नियम लागू किए और स्कूलों में जंक फूड की बिक्री व उसके प्रचार-प्रसार पर प्रतिबंध लगा दिया. इस साल प्रकाशित 'द लांसेट' की एक रिसर्च रिपोर्ट में पाया गया कि कानून लागू होने के 18 महीनों के भीतर लड़कियों में ओवरवेट होने की संभावना 2.85 प्रतिशत और लड़कों में 2.4 प्रतिशत कम हो गई.
इस कानून का एक और महत्वपूर्ण प्रभाव यह रहा कि चिली में कई खाद्य एवं पेय पदार्थ निर्माताओं को अपने उत्पादों के फॉर्मूले में बदलाव करना पड़ा. स्वास्थ्य मानकों के अनुरूप बनाने के लिए कंपनियों ने कई उत्पादों में चीनी, नमक और वसा की मात्रा घटाते हुए उनकी रेसिपी में सुधार किया.