मानसून सत्र में फिर आ सकता है महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक, बदले राजनीतिक समीकरणों से सरकार को उम्मीद
सरकार संसद के आगामी मानसून सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक को दोबारा पेश करने की तैयारी में है। तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के चुनावी परिणामों के बाद बदले राजनीतिक हालात से सरकार को आवश्यक समर्थन मिलने की उम्मीद बढ़ी है।;
नई दिल्ली। संसद के आगामी मानसून सत्र में महिला आरक्षण विधेयक और उससे जुड़े परिसीमन विधेयक को एक बार फिर पेश किए जाने की संभावना तेज हो गई है। राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, हाल ही में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों, विशेष रूप से तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के परिणामों के बाद बदले राजनीतिक समीकरणों ने सरकार का आत्मविश्वास बढ़ाया है। माना जा रहा है कि सरकार अब इन महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने के लिए नई रणनीति के साथ आगे बढ़ सकती है।
पिछली बार नहीं मिल पाया था आवश्यक बहुमत
गौरतलब है कि अप्रैल में आयोजित संसद के विशेष सत्र के दौरान महिला आरक्षण विधेयक को पारित कराने का प्रयास किया गया था। प्रस्तावित विधेयक में 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन कराने और वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव से संसद एवं राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण देने का प्रावधान शामिल था।
हालांकि संविधान संशोधन से जुड़े इस विधेयक के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल सका। लोकसभा में हुई वोटिंग के दौरान पक्ष में 298 और विरोध में 230 मत पड़े थे। कुल 528 सांसदों द्वारा मतदान किए जाने के बावजूद आवश्यक समर्थन का आंकड़ा पूरा नहीं हो पाया था, जिसके चलते विधेयक पारित नहीं हो सका।
बदले राजनीतिक हालात से बढ़ी उम्मीद
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव परिणामों के बाद विपक्षी दलों की स्थिति पहले जैसी मजबूत नहीं रही है। कई राज्यों में सत्ता परिवर्तन और विपक्षी दलों के भीतर उभरे मतभेदों ने संसद में नए समीकरण पैदा किए हैं।
सरकार का मानना है कि महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे मुद्दों को महिलाओं के राजनीतिक सशक्तीकरण और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व से जोड़कर विपक्षी दलों को समर्थन के लिए तैयार किया जा सकता है। खासकर दक्षिण भारत के राज्यों को यह समझाने की कोशिश होगी कि परिसीमन प्रक्रिया उनके हितों को ध्यान में रखकर आगे बढ़ाई जाएगी।
तृणमूल और द्रमुक पर टिकी निगाहें
पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु की राजनीति में हालिया बदलावों ने भी सरकार की रणनीति को प्रभावित किया है। बंगाल में चुनावी झटकों और संगठनात्मक चुनौतियों के कारण तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष की चर्चाएं तेज हैं। राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि संसद में महत्वपूर्ण मतदान के दौरान कुछ सांसद अलग रुख अपना सकते हैं।
वहीं द्रमुक लंबे समय से परिसीमन के मुद्दे पर चिंता जताती रही है। पार्टी का तर्क रहा है कि नई जनसंख्या आधारित परिसीमन प्रक्रिया से दक्षिणी राज्यों की संसदीय सीटों की संख्या प्रभावित हो सकती है। हालांकि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में पार्टी के रुख पर भी नजर बनी हुई है।
संसद में बदलते गठबंधन समीकरण
इस बीच लोकसभा में द्रमुक को कांग्रेस से अलग बैठने की मंजूरी मिलने को भी राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों के बाद दोनों दलों के संबंधों में दूरी बढ़ने की चर्चा है। इससे संसद में विपक्षी एकजुटता की तस्वीर भी बदल सकती है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि सरकार मानसून सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक दोबारा लाती है, तो यह सत्र काफी महत्वपूर्ण और राजनीतिक रूप से बेहद चर्चित साबित हो सकता है। सभी दलों की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि संसद में इन विधेयकों पर होने वाली बहस और मतदान के दौरान कौन-सा राजनीतिक समीकरण उभरकर सामने आता है।
महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर केंद्रित बहस
महिला आरक्षण विधेयक लंबे समय से भारतीय राजनीति का अहम मुद्दा रहा है। समर्थकों का कहना है कि इससे संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी, जबकि विपक्षी दल परिसीमन और सीटों के पुनर्गठन से जुड़े कुछ पहलुओं पर सवाल उठाते रहे हैं। ऐसे में मानसून सत्र में यह मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीतिक बहस के केंद्र में रहने की संभावना है।