यूपी राज्यसभा चुनाव में टाइट फाइट के आसार, अखिलेश उतार सकते हैं तीसरा कैंडिडेट; 8वीं सीट पर फंसेगा पेंच

यूपी में राज्यसभा की 10 सीटों के चुनाव में भाजपा और सपा के बीच मुकाबला रोचक हो सकता है। अखिलेश यादव के तीसरे उम्मीदवार के दांव से आठवीं सीट पर पेंच फंस सकता है।;

Update: 2026-09-28 10:34 GMT
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की 10 सीटों के लिए होने वाला चुनाव विधानसभा चुनाव से पहले सियासी ताकत का बड़ा परीक्षण बन सकता है। मौजूदा विधानसभा गणित के आधार पर भाजपा सात सीटें जीतने की स्थिति में है, जबकि समाजवादी पार्टी दो सीटों पर अपने उम्मीदवारों को आसानी से राज्यसभा भेज सकती है। सपा की ओर से प्रोफेसर रामगोपाल यादव और आलोक रंजन के नाम संभावित उम्मीदवारों के तौर पर चर्चा में हैं।

हालांकि, सपा प्रमुख अखिलेश यादव की रणनीति यहीं तक सीमित रहने की संभावना नहीं बताई जा रही है। चर्चा है कि पार्टी तीसरा उम्मीदवार भी मैदान में उतार सकती है। ऐसा होने पर मुकाबला आठवीं सीट के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाएगा और दोनों प्रमुख दलों के बीच विधायकों के समर्थन को लेकर खींचतान बढ़ सकती है।

तीसरे उम्मीदवार के लिए सपा को चाहिए अतिरिक्त वोट

उत्तर प्रदेश विधानसभा में वर्तमान में 397 सदस्य हैं। राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए करीब 37 प्रथम वरीयता वोटों की जरूरत होगी। इस गणित के आधार पर सपा अपने दो उम्मीदवारों को तो आसानी से आगे बढ़ा सकती है, लेकिन तीसरे उम्मीदवार के लिए उसे अतिरिक्त समर्थन जुटाना होगा।

सपा के मौजूदा विधायकों की संख्या करीब 101 बताई जा रही है। ऐसे में तीसरे प्रत्याशी की जीत के लिए पार्टी को दूसरे दलों या विधायकों से अतिरिक्त समर्थन की जरूरत पड़ेगी। वरीयता मतदान में दूसरे वरीयता के वोट भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसी वजह से चुनाव के दौरान क्रॉस वोटिंग और विधायकों के रुख को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो सकती हैं।

भाजपा के सामने आठवीं सीट का गणित

भाजपा के पास अपने विधायकों के अलावा सहयोगी दलों का भी समर्थन है। अपना दल (एस), आरएलडी, सुभासपा और निषाद पार्टी के विधायक उसके साथ हैं। इसके अलावा कुछ अन्य विधायकों के समर्थन की संभावना को भी भाजपा के पक्ष में जोड़ा जा रहा है।

इस गणित से भाजपा के पास करीब 294 समर्थक विधायक होने का अनुमान लगाया जा रहा है। 37 वोट के मानक के हिसाब से सात सीटों के बाद आठवीं सीट के लिए उसके पास कुछ वोट कम पड़ सकते हैं। ऐसे में आठवीं सीट का फैसला वरीयता मतदान और अतिरिक्त समर्थन पर निर्भर कर सकता है।

बसपा के पास कोई विधायक नहीं, मुकाबला और रोचक

इस चुनाव में बसपा के पास विधानसभा में कोई विधायक नहीं है। ऐसे में राज्यसभा चुनाव में पार्टी का प्रतिनिधित्व समाप्त होने की संभावना है। बची हुई सीट के लिए भाजपा और सपा दोनों अपने पक्ष में अतिरिक्त विधायकों को साधने की कोशिश कर सकते हैं।

राज्यसभा चुनाव का यह मुकाबला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसके बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का सियासी माहौल और तेज होगा। यदि सपा तीसरा उम्मीदवार उतारती है तो उसके लिए अतिरिक्त वोट जुटाना बड़ी चुनौती होगी। वहीं भाजपा के सामने आठवीं सीट के लिए जरूरी संख्या पूरी करने की चुनौती होगी। ऐसे में वरीयता मतदान, निर्दलीय विधायकों का रुख और संभावित क्रॉस वोटिंग चुनाव की दिशा में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

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