यूजीसी नियमों पर अगड़ों-पिछड़ों के बीच फंसी भाजपा, चुनाव से पहले समीक्षा कमेटी बनाने की तैयारी; सवर्णों की नाराजगी बनी चुनौती

यूजीसी के 2026 समता नियमों पर विवाद के बीच केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में समीक्षा समिति बनाने की बात कही। सवर्णों की नाराजगी और ओबीसी-एससी वर्ग के समर्थन के बीच भाजपा के सामने चुनावी चुनौती बढ़ी।;

Update: 2026-11-07 07:51 GMT

नई दिल्ली।विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के 2026 के समता नियमों को लेकर देश में सियासी घमासान तेज हो गया है। उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के उद्देश्य से लाए गए इन नियमों का सवर्ण समाज के एक वर्ग ने विरोध किया है। बढ़ते विवाद के बीच केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में नियमों की समीक्षा के लिए उच्चस्तरीय समिति गठित करने की जानकारी दी है। सरकार के इस कदम को आगामी विधानसभा चुनावों, खासकर उत्तर प्रदेश की राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।

इस विवाद ने भाजपा के सामने बड़ी राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। एक तरफ सवर्ण मतदाताओं की नाराजगी है, तो दूसरी तरफ दलित, आदिवासी और पिछड़ा वर्ग नए नियमों को अपने अधिकारों की सुरक्षा से जोड़कर देख रहा है।

यूजीसी के नए नियम क्यों बने राजनीतिक संकट?

UGC के 2012 के पुराने नियमों में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के विद्यार्थियों के लिए जातिगत भेदभाव से सुरक्षा के प्रावधान थे। वहीं, 2026 के नए नियमों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को भी शामिल किया गया। इससे भेदभाव के खिलाफ शिकायतों का दायरा बढ़ा है।

हालांकि, विरोध करने वाले सवर्ण संगठनों और विद्यार्थियों की प्रमुख आपत्ति यह है कि झूठी शिकायतों के खिलाफ पर्याप्त कार्रवाई और दंड का स्पष्ट प्रावधान नहीं है। उन्हें आशंका है कि इन नियमों का दुरुपयोग हो सकता है।

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक, ओबीसी वर्ग को सुरक्षा के दायरे में शामिल करने पर मुख्य आपत्ति नहीं थी, बल्कि शिकायतों के दुरुपयोग को रोकने की व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे थे। यही वजह है कि यह मुद्दा पार्टी के लिए राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील बन गया है।

उत्तर प्रदेश में जातीय समीकरण बिगड़ने का डर

यूजीसी विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक असर उत्तर प्रदेश में देखने को मिल सकता है। राज्य में सवर्ण मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 22 प्रतिशत, ओबीसी की 43 प्रतिशत और अनुसूचित जाति की लगभग 21 प्रतिशत बताई जाती है।

भाजपा के लिए इन तीनों सामाजिक वर्गों का समर्थन महत्वपूर्ण है। पार्टी अपनी सोशल इंजीनियरिंग के जरिए लंबे समय से अलग-अलग जातीय समूहों को साथ लाने की कोशिश करती रही है। ऐसे में किसी एक वर्ग की नाराजगी चुनावी समीकरण प्रभावित कर सकती है।

2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा की सीटें 62 से घटकर 33 रह गई थीं। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन के बेहतर प्रदर्शन के बाद पार्टी पहले से ही अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने की चुनौती का सामना कर रही है।

उपचुनावों के नतीजों ने बढ़ाई भाजपा की चिंता

हालिया चुनावी झटकों और सवर्ण समाज में बढ़ती नाराजगी ने भाजपा नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है। पार्टी को आशंका है कि UGC नियमों पर सख्ती से सवर्ण मतदाताओं में असंतोष बढ़ सकता है। वहीं, समीक्षा समिति के गठन को लेकर पिछड़े और दलित वर्ग में यह संदेश जाने का खतरा है कि सरकार उनके अधिकारों से पीछे हट रही है।

यूपी भाजपा प्रभारी विनोद तावड़े ने सोशल मीडिया के जरिए सफाई देते हुए कहा कि समिति का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी वर्ग के विद्यार्थियों के साथ अन्याय या भेदभाव न हो।

आरएसएस ने भी नियमों को बताया असंतुलित

इस विवाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण रही है। संघ के राष्ट्रीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने कहा कि UGC का सर्कुलर असंतुलित था। उन्होंने बताया कि जमीनी स्तर से मिले फीडबैक के आधार पर सरकार का ध्यान इस मुद्दे की ओर दिलाया गया था। अब सरकार समीक्षा समिति बनाने जा रही है और मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।

विपक्ष ने चुनावी मजबूरी बताया फैसला

विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार के फैसले को चुनावी राजनीति से प्रेरित बताया है। शिवसेना (UBT) की राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की चिंता के कारण सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पड़े हैं।

फिलहाल UGC नियमों की समीक्षा के लिए समिति बनाने के फैसले ने विवाद को नया राजनीतिक मोड़ दे दिया है। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह सामाजिक न्याय और सभी वर्गों के बीच संतुलन बनाते हुए अपने चुनावी समर्थन को कैसे बरकरार रखती है।

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