सुप्रीम कोर्ट ने पलटा सरकारी नौकरी पर हाईकोर्ट का आदेश,कहा-हमदर्दी कानून से ऊपर नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी नौकरी में आपराधिक मामलों की जानकारी छिपाने वाले युवक को राहत देने से मना कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सहानुभूति कानून की जगह नहीं ले सकती। युवक को अपनी नौकरी गंवानी पड़ेगी।

Update: 2026-01-13 06:51 GMT

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी नौकरी के आवेदन में आपराधिक मामलों की जानकारी छिपाने वाले युवक को राहत देने से इनकार कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से युवक को अपनी सरकारी नौकरी गंवानी पड़ेगी, क्योंकि उसने भर्ती के समय अपने खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की जानकारी छिपाई थी। कोर्ट ने कहा कि सहानुभूति कानून की जगह नहीं ले सकती। यह जानकारी छिपाना कोई छोटी-मोटी बात नहीं, बल्कि सरकारी नौकरी के लिए एक बुनियादी शर्त है।

जस्टिस संजय करोल और एनके सिंह की बेंच ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा, 'कि कानून भले ही कठोर हो लेकिन कानून तो कानून है।' सर्वोच्च अदालत ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें कहा गया था कि यह जानकारी छिपाना मामूली बात थी और इस आधार पर नियुक्ति रद्द नहीं की जा सकती।

सहानुभूति कानून का विकल्प नहीं हो सकती: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश को रद्द करते हुए कहा कि यह कानून में तय है कि सहानुभूति कानून का विकल्प नहीं हो सकती। हम समझते हैं कि सरकारी नौकरी खोना बहुत मुश्किल होता है, लेकिन अपने कामों के नतीजों को जानना भी जरूरी है। सरकारी नौकरी के आवेदन में पूरी और सही जानकारी देना सिर्फ एक औपचारिकता नहीं है।

यह निष्पक्षता, ईमानदारी और जनता के भरोसे की एक बुनियादी जरूरत है। एक पद के लिए सैकड़ों या हजारों लोग आवेदन करते हैं, सभी एक ही शर्तों पर प्रतिस्पर्धा करते हैं। हर उम्मीदवार की सावधानीपूर्वक जांच करना बहुत जरूरी है ताकि सभी को बराबरी का मौका मिले और चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनी रहे।'

अदालत ने कहा, 'जब कोई उम्मीदवार अपने आपराधिक इतिहास की जानकारी छिपाता है, तो वह इस प्रक्रिया को कमजोर करता है। इससे नियुक्ति करने वाले अधिकारी को उम्मीदवार की उपयुक्तता का पूरी तरह से आकलन करने का मौका नहीं मिल पाता।'

ऐसे मामलों में सख्ती से पेश आना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

कानून यह मानता है कि अपराध की प्रकृति और परिस्थितियों के आधार पर जानकारी न देना हमेशा नौकरी के लिए घातक नहीं हो सकता। फिर भी, यह एक गंभीर चूक बनी रहती है। यह गलती तब और गंभीर हो जाती है जब जानकारी छिपाना बार-बार होता है। तब यह गलती नहीं, बल्कि जानबूझकर की गई धोखाधड़ी लगती है। यह सरकारी सेवा के लिए चुने गए उम्मीदवारों पर भरोसे को ठेस पहुंचाता है, जहां ईमानदारी और पारदर्शिता बहुत जरूरी गुण हैं। ऐसे मामलों में अधिकारियों को और सख्ती से पेश आना चाहिए।

क्या है मामला?

इस मामले में जिस व्यक्ति को सहायक समीक्षा अधिकारी के पद पर नियुक्त किया गया था, उसकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं थी। पता चला कि उसके खिलाफ दो आपराधिक मामले लंबित थे, जिनकी जानकारी उसने आवेदन में नहीं दी थी। सेवाएं समाप्त किए जाने के बाद उसने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां एकल और खंडपीठ दोनों ने उसकी बर्खास्तगी को रद्द कर दिया। इसके बाद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

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