'सेकेंड क्लास यात्री' शब्द पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, कहा- खर्च नहीं, कोच से तय होगी श्रेणी; रेलवे को 8 लाख मुआवजा देने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने 'सेकेंड क्लास यात्री' शब्द पर आपत्ति जताते हुए कहा कि यात्री की श्रेणी खर्च से नहीं बल्कि कोच से तय होनी चाहिए। कोर्ट ने एमपी हाईकोर्ट का फैसला पलटते हुए रेलवे को 8 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश भी दिया।;

Update: 2026-07-17 10:37 GMT

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रेलवे में यात्रियों की गरिमा, सुरक्षा और मुआवजा व्यवस्था को लेकर अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने रेलवे के दस्तावेजों में इस्तेमाल होने वाले 'सेकेंड क्लास पैसेंजर' (द्वितीय श्रेणी यात्री) जैसे शब्दों पर आपत्ति जताते हुए कहा कि किसी व्यक्ति की पहचान उसके द्वारा खर्च किए गए किराये से नहीं होनी चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि भविष्य में श्रेणी का उल्लेख यात्री के बजाय केवल कोच या डिब्बे के संदर्भ में किया जाना चाहिए। इसी मामले में कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट और रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल के फैसले को पलटते हुए मृत यात्री की पत्नी को 8 लाख रुपये मुआवजा ब्याज सहित देने का निर्देश भी दिया।

'सेकेंड क्लास यात्री' कहना संविधान की भावना के विपरीत

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि भारत के सामाजिक इतिहास और वर्ग विभाजन की पृष्ठभूमि को देखते हुए किसी व्यक्ति को "सेकेंड क्लास यात्री" कहना उचित नहीं है। अदालत ने कहा कि रेलवे को अपनी शब्दावली में बदलाव करना चाहिए ताकि यात्रियों की गरिमा और समानता के संवैधानिक सिद्धांतों का सम्मान बना रहे।

पीठ ने सुझाव दिया कि टिकट या यात्रा श्रेणी का उल्लेख केवल संबंधित कोच के आधार पर किया जाए, न कि यात्री की सामाजिक या आर्थिक स्थिति दर्शाने वाले शब्दों से।

रेलवे में कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने की जरूरत

सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था और संचालन पर भी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि रेलवे मैनुअल के कई प्रावधान प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो पा रहे हैं क्योंकि कर्मचारियों की संख्या पर्याप्त नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि रेलवे स्टेशनों और ट्रेनों में अधिक स्टाफ की नियुक्ति से न केवल यात्रियों की सुरक्षा बेहतर होगी बल्कि युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। आधुनिक रेलवे व्यवस्था के लिए मजबूत मानव संसाधन भी उतना ही आवश्यक है जितना तकनीकी विकास।

टिकट न मिलने का मतलब गैर-टिकट यात्री नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दुर्घटना के बाद मृतक के पास से टिकट बरामद न होने मात्र से उसे गैर-टिकट यात्री नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि यदि परिजन शपथपत्र के माध्यम से यह बताते हैं कि मृतक के पास वैध टिकट था और दुर्घटना में उसका सामान खो गया, तो ऐसे दावे को गंभीरता से देखा जाना चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि यदि टिकट जांच की निर्धारित प्रक्रिया का सही तरीके से पालन किया गया होता तो यात्रा का रिकॉर्ड उपलब्ध रहता और ऐसे विवाद की नौबत नहीं आती।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का फैसला पलटा

यह मामला वर्ष 2015 का है। चंद्रकांत ठक्कर रायपुर से अहमदाबाद जाने के दौरान चलती ट्रेन से गिर गए थे, जिससे उनकी मौत हो गई। उनकी पत्नी ने रेलवे दावा अधिकरण में मुआवजे की मांग की थी, लेकिन टिकट बरामद न होने के आधार पर दावा खारिज कर दिया गया। बाद में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भी उसी निर्णय को बरकरार रखा।

अब सुप्रीम कोर्ट ने दोनों फैसलों को निरस्त करते हुए कहा कि उपलब्ध तथ्यों और पत्नी के हलफनामे के आधार पर मृतक को वैध यात्री माना जाएगा। अदालत ने रेलवे को मृतक की पत्नी को 8 लाख रुपये मुआवजा ब्याज सहित देने का आदेश दिया।

भीड़भाड़ और सुरक्षा पर भी जताई चिंता

शीर्ष अदालत ने रेलवे में बढ़ती भीड़भाड़ पर भी चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने कहा कि सुरक्षा केवल रेलवे प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं बल्कि यात्रियों की भी है। यात्रियों को चलती ट्रेन में चढ़ने, फुटबोर्ड पर यात्रा करने या अन्य जोखिम भरे व्यवहार से बचना चाहिए।

साथ ही अदालत ने रेलवे अधिकारियों को सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन करने और यात्रियों की सुविधा व सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक सुधार तेज करने की सलाह दी।

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