ओबीसी क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, वेतन और कृषि आय अकेले नहीं होंगे आधार; केंद्र की अर्जी खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने OBC क्रीमी लेयर मामले में केंद्र सरकार को झटका दिया है। माता-पिता की सैलरी और कृषि आय को अकेले आधार बनाकर क्रीमी लेयर तय नहीं की जा सकती। पात्र अभ्यर्थियों को नियुक्ति देने का निर्देश।;

Update: 2026-11-06 07:00 GMT

नई दिल्ली। अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण में क्रीमी लेयर तय करने के मानकों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने केंद्र की स्पष्टीकरण और फैसले में बदलाव की मांग वाली अर्जी खारिज करते हुए 11 मार्च 2026 के अपने फैसले को बरकरार रखा है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि OBC क्रीमी लेयर निर्धारित करने के लिए माता-पिता की सैलरी और कृषि से होने वाली आय को अकेले आधार नहीं बनाया जा सकता। इस फैसले से उन अभ्यर्थियों को राहत मिलने का रास्ता साफ हुआ है, जिन्होंने सिविल सेवा परीक्षा पास की थी, लेकिन क्रीमी लेयर के गलत निर्धारण के कारण उन्हें नियुक्ति या सेवा आवंटन से वंचित कर दिया गया।

जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि अदालत के तय मानकों के तहत ओबीसी नॉन-क्रीमी लेयर के पात्र पाए गए अभ्यर्थियों को नियुक्ति दी जाए। इनमें आईएएस, आईपीएस, आईआरएस सहित अन्य केंद्रीय सेवाओं के चयनित उम्मीदवार शामिल हैं।

क्या है ओबीसी क्रीमी लेयर का पूरा विवाद?

यह मामला उन ओबीसी उम्मीदवारों से जुड़ा है, जिन्होंने यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा पास की थी। उनके माता-पिता सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU), बैंकों और निजी संस्थानों में कार्यरत थे। कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने माता-पिता की सैलरी और आय को आधार बनाकर इन उम्मीदवारों को क्रीमी लेयर में मान लिया था।

इसके कारण उन्हें ओबीसी नॉन-क्रीमी लेयर आरक्षण का लाभ नहीं मिला और कुछ उम्मीदवारों को उनकी योग्यता के बावजूद मनचाही सेवा या नियुक्ति नहीं मिल सकी। अभ्यर्थियों ने इस फैसले को केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण और विभिन्न हाईकोर्ट में चुनौती दी। मद्रास, दिल्ली और केरल हाईकोर्ट से राहत मिलने के बाद केंद्र सरकार ने इन आदेशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?

11 मार्च 2026 को यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोहित नाथन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की अपील खारिज कर दी थी। अदालत ने कहा था कि क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल माता-पिता की कुल आय देखकर नहीं किया जा सकता।

पीठ ने 1993 के सरकारी कार्यालय ज्ञापन और 2004 के स्पष्टीकरण पत्र की व्याख्या करते हुए कहा कि माता-पिता की सैलरी और कृषि भूमि से होने वाली आय को अन्य आय के साथ जोड़कर स्वत: क्रीमी लेयर का निर्धारण नहीं किया जा सकता। इसके लिए माता-पिता के पद और सेवा की श्रेणी को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि सरकारी कर्मचारियों, PSU और निजी क्षेत्र में काम करने वाले अभिभावकों के बच्चों के लिए अलग-अलग मानक अपनाकर समान स्थिति वाले उम्मीदवारों के साथ भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।

केंद्र सरकार ने फैसले में बदलाव क्यों मांगा?

11 मार्च के फैसले के बाद केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्पष्टीकरण और संशोधन की अर्जी दाखिल की थी। सरकार का कहना था कि फैसले को पहले से पूरी हो चुकी नियुक्तियों पर लागू करने से प्रशासनिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं। सेवा आवंटन, कैडर और वरिष्ठता जैसे मामलों में भी जटिलताएं आने की आशंका जताई गई थी।

केंद्र ने फैसले के प्रभाव को स्पष्ट करने और उसे लागू करने के लिए अतिरिक्त समय देने की मांग की थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की दलीलों को स्वीकार नहीं किया और पुराना फैसला बरकरार रखा।

किन अभ्यर्थियों को मिलेगा नियुक्ति का लाभ?

इस फैसले से उन ओबीसी उम्मीदवारों को राहत मिल सकती है, जिन्हें माता-पिता की सैलरी के आधार पर क्रीमी लेयर में रखकर आरक्षण से वंचित किया गया था। पात्रता की अन्य शर्तें पूरी करने वाले अभ्यर्थियों को नियुक्ति देने के लिए जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त यानी सुपरन्यूमेरेरी पद भी बनाए जा सकते हैं।

मामले में पैरवी कर रहे अधिवक्ता शशांक रत्नू ने फैसले को ओबीसी वर्ग के लिए बड़ी जीत बताया। उनके मुताबिक, इससे करीब एक दशक से चले आ रहे अन्याय को खत्म करने में मदद मिलेगी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से सिविल सेवा अभ्यर्थियों के बीच क्रीमी लेयर निर्धारण को लेकर महत्वपूर्ण स्पष्टता आई है।

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