पत्नी को ‘बेवकूफ’ और ‘बेकार’ कहना अपराध नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने पति और ससुराल वालों के खिलाफ केस किया रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी की आत्महत्या के मामले में पति और उसके परिवार को राहत दी। अदालत ने कहा कि पत्नी को मूर्ख या बेकार कहना अपने आप में आपराधिक क्रूरता नहीं है।;
नई दिल्ली। पति-पत्नी के बीच होने वाले विवाद और आपसी कहासुनी कब आपराधिक मामले का आधार बन सकते हैं? इस सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने कनाडा के टोरंटो में पत्नी की आत्महत्या से जुड़े मामले में पति और उसके परिवार के खिलाफ दर्ज आपराधिक केस रद्द कर दिया। पीठ ने कहा कि पत्नी को ‘स्टुपिड’ (बेवकूफ) और ‘यूजलेस’ (बेकार) कहना अपने आप में आपराधिक क्रूरता या धमकी का अपराध नहीं है। किसी व्यक्ति को पत्नी की आत्महत्या के लिए जिम्मेदार ठहराने के लिए ठोस सबूत जरूरी हैं।
22वीं मंजिल से कूदकर पत्नी ने दी थी जान
मामले के मुताबिक, शादी के करीब एक साल बाद फरवरी 2022 में पति-पत्नी कनाडा के टोरंटो चले गए थे। दोनों वहां एक अपार्टमेंट में रह रहे थे। 11 जून 2023 को पत्नी ने अपार्टमेंट की 22वीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली।
घटना के बाद पुलिस को घर से महिला का हाथ से लिखा सुसाइड नोट मिला। इसमें उसने अपनी जिंदगी में असफल महसूस करने की बात कही थी। महिला ने लिखा था कि एक साल से अधिक समय बीतने के बावजूद उसे नौकरी नहीं मिल सकी थी, जिसके कारण वह खुद को असफल मान रही थी।
पिता ने लगाए थे दहेज और प्रताड़ना के आरोप
बेटी की मौत के बाद उसके पिता ने पति और ससुराल वालों के खिलाफ औरंगाबाद के सातारा पुलिस स्टेशन में 30 जून 2023 को शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में दहेज की मांग, मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना, मारपीट तथा अपमानित करने के आरोप लगाए गए थे।
पुलिस ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304B, 323, 498A और 504 के अलावा दहेज निषेध अधिनियम की धाराओं 3 और 4 के तहत मामला दर्ज किया था। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने शिकायत और उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा की।
‘गुस्सैल स्वभाव को अपराध नहीं माना जा सकता’
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने कहा कि पति द्वारा पत्नी को बेवकूफ या बेकार कहने के आरोप को सही मान भी लिया जाए, तब भी केवल इस आधार पर आपराधिक क्रूरता या धमकी का अपराध नहीं बनता। अदालत के अनुसार, यह अधिक से अधिक पति के गुस्सैल स्वभाव को दर्शाता है।
पीठ ने स्पष्ट किया कि छोटी-छोटी बातों पर डांटना या गुस्सा करना अपने आप में ऐसा गंभीर आपराधिक कृत्य नहीं है, जिसके आधार पर पत्नी की आत्महत्या का पूरा जिम्मा पति पर डाल दिया जाए।
दहेज मांगने और आत्महत्या से संबंध का सबूत जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 304B के तहत दहेज मृत्यु का मामला बनाने के लिए यह साबित करना आवश्यक है कि महिला की मौत से ठीक पहले उसे दहेज की मांग को लेकर प्रताड़ित किया गया था। इस मामले में ऐसी मांग और प्रताड़ना के समर्थन में पर्याप्त ठोस सबूत नहीं मिले।
अदालत ने महिला के माता-पिता के दुख को स्वीकार करते हुए कहा कि बेटी को खोने का दर्द बेहद बड़ा है, लेकिन केवल इस त्रासदी के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। पीठ ने पति और उसके परिवार के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही रद्द करते हुए कहा कि सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर किसी को मुकदमे में फंसाए रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग हो सकता है।