लद्दाख के न्योमा एयरबेस पर उतरा वायुसेना का ‘गजराज’, 13,629 फीट की ऊंचाई पर IL-76MD की ऐतिहासिक लैंडिंग

भारतीय वायुसेना के IL-76MD ‘गजराज’ ने लद्दाख के न्योमा एयरबेस पर 13,629 फीट की ऊंचाई पर सफल लैंडिंग की। चीन सीमा से 23 किमी दूर स्थित यह एयरबेस सामरिक रूप से बेहद अहम है।;

Update: 2026-11-07 11:19 GMT
लद्दाख। भारतीय वायुसेना ने लद्दाख में अपनी सामरिक क्षमता का एक और बड़ा प्रदर्शन किया है। शनिवार को वायुसेना के भारी मालवाहक विमान IL-76MD ने पूर्वी लद्दाख के न्योमा एयरबेस पर सफल लैंडिंग की। करीब 13,629 फीट की ऊंचाई पर हुई इस लैंडिंग को वायुसेना ने इस विमान की दुनिया में अब तक की सबसे ऊंची लैंडिंग बताया है। चीन की वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) से लगभग 23 किलोमीटर दूर स्थित यह एयरबेस भारत की सैन्य तैयारियों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है।

दुनिया के सबसे ऊंचे एयरबेस पर उतरा भारी विमान

न्योमा एयरबेस को मुध-न्योमा के नाम से भी जाना जाता है। यह पूर्वी लद्दाख में सिंधु नदी के किनारे स्थित है। भारतीय वायुसेना के अनुसार, IL-76MD की यहां लैंडिंग एक बड़ी परिचालन उपलब्धि है। न्योमा को दुनिया का सबसे ऊंचा फाइटर-कैपेबल एयरफील्ड भी बताया जाता है।

इससे पहले नवंबर 2025 में एयरबेस के अपग्रेडेशन के बाद तत्कालीन एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने C-130J विमान से यहां उतरकर इसका उद्घाटन किया था। अगस्त 2013 में भी C-130J ने न्योमा में लैंडिंग की थी। हालांकि, वह अलग विमान था और IL-76MD की यह उपलब्धि अपने आप में नया रिकॉर्ड है।

क्या है वायुसेना का ‘गजराज’ IL-76MD?

IL-76MD रूस में निर्मित चार इंजन वाला भारी परिवहन विमान है। भारतीय वायुसेना में इसे ‘गजराज’ कहा जाता है। यह लगभग 40 से 50 टन तक माल ले जाने में सक्षम है। इसके जरिए सैनिकों, सैन्य वाहनों, हथियारों, राशन और अन्य जरूरी उपकरणों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाया जा सकता है।

13 हजार फीट पर लैंडिंग क्यों है चुनौतीपूर्ण?

इतनी ऊंचाई पर हवा का घनत्व कम और ऑक्सीजन की उपलब्धता सीमित होती है। इसका असर विमान के इंजनों और पंखों की कार्यक्षमता पर पड़ता है। ऐसे में भारी विमान को सुरक्षित उतारने के लिए विशेष तकनीकी गणना, सटीक नियंत्रण और पायलटों के अनुभव की जरूरत होती है।

न्योमा की भौगोलिक स्थिति भी इसे रणनीतिक रूप से अहम बनाती है। यहां बड़े मालवाहक विमान उतरने से सैनिकों और सैन्य साजो-सामान की आवाजाही में मदद मिल सकती है। इससे सीमावर्ती इलाकों में जरूरत के समय रसद पहुंचाने की क्षमता मजबूत होगी।

1962 के युद्ध के बाद बंद हुआ था एयरबेस

न्योमा एयरफील्ड की शुरुआत 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौर में हुई थी, लेकिन युद्ध के बाद इसे बंद कर दिया गया। सितंबर 2009 में वायुसेना के AN-32 विमान ने यहां लैंडिंग की थी। इसके बाद एयरबेस को आधुनिक सुविधाओं से लैस करने की योजना पर काम आगे बढ़ा।

करीब 218 करोड़ रुपये की लागत से विकसित इस एयरबेस पर लगभग 2.7 किलोमीटर लंबा रनवे तैयार किया गया है। लद्दाख में लेह, कारगिल और थोईस के अलावा न्योमा वायुसेना का एक महत्वपूर्ण परिचालन केंद्र है। सर्दियों में यहां तापमान माइनस 20 डिग्री तक गिर सकता है, इसलिए रखरखाव और संचालन के लिए विशेष इंतजाम जरूरी हैं।

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