सुप्रीम कोर्ट ने पहली नजर में माना ईडी के काम में दखल हुआ, बंगाल सरकार को नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट टिप्पणी की कि ईडी के पास चुनावी कार्यों या पार्टी गतिविधियों में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है, लेकिन इसके साथ ही यह भी कहा कि राज्य सरकार की एजेंसियों को भी केंद्रीय जांच में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है।

Update: 2026-01-15 09:44 GMT

नई दिल्ली। आई-पैक रेड मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को बड़ा फैसला देते हुए माना कि पश्चिम बंगाल सरकार और उसके अधिकारियों ने ईडी की जांच में हस्तक्षेप किया। कोर्ट ने ममता बनर्जी सरकार और राज्य पुलिस अधिकारियों को नोटिस जारी कर दो सप्ताह में जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट टिप्पणी की कि ईडी के पास चुनावी कार्यों या पार्टी गतिविधियों में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है, लेकिन इसके साथ ही यह भी कहा कि राज्य सरकार की एजेंसियों को भी केंद्रीय जांच में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। कोर्ट के अनुसार यह मामला, 'देश में कानून के शासन और संवैधानिक संस्थाओं के स्वतंत्र कामकाज पर गंभीर सवाल उठाता है।'

कोर्ट ने माना- टीएमसी ने बुलाई भीड़

बेंच ने अपने आदेश में ईडी की इस दलील को भी रिकॉर्ड में लिया कि टीएमसी के लीगल सेल ने 9 जनवरी को हाईकोर्ट में भीड़ जुटाने के लिए वाट्सएप मैसेज भेजे, जिसके चलते कोर्ट परिसर में अव्यवस्था जैसी स्थिति बनी। SG तुषार मेहता ने इसे 'गंभीर मसला' बताते हुए कहा कि इस गतिविधि में राज्य के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी शामिल थे, जिसकी जांच सुप्रीम कोर्ट को करनी चाहिए।

'रेड में राज्य सरकार के हस्तक्षेप का मामला बेहद गंभीर'

कोर्ट ने प्राथमिक दृष्टि से स्वीकार किया कि केंद्रीय एजेंसी की रेड में राज्य सरकार के हस्तक्षेप का मामला बेहद गंभीर है, और अगर इस तरह की घटनाओं को रोका नहीं गया तो 'कानूनहीनता बढ़ने का खतरा' है। बेंच ने कहा,'अपराधियों को सिर्फ इसलिए संरक्षण नहीं दिया जा सकता कि वे किसी राज्य की एजेंसी के सदस्य हैं।'

'CCTV फुटेज को संभाल कर रखें'

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को यह भी निर्देश दिया कि सभी CCTV फुटेज और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेज़ को सुरक्षित रखा जाए, ताकि आगे की सुनवाई में कोई साक्ष्य प्रभावित न हो। कोर्ट ने दोहराया कि यह मामला केवल एक रेड या टकराव का नहीं, बल्कि कानून के शासन (Rule of Law) के लिए महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दा है।

इसके साथ ही बेंच ने यह भी जोड़ा कि केंद्रीय एजेंसियां चुनावी गतिविधियों में दखल नहीं दे सकतीं, लेकिन यदि जांच से जुड़े तथ्य सामने आते हैं तो राज्य एजेंसियों का उन्हें रोकना भी अस्वीकार्य है। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, 'ED की जांच और उससे जुड़े मामलों में राज्य एजेंसी की बाधा गंभीर चिंता का विषय है, जिसकी जांच जरूरी है।'

ED अधिकारियों के खिलाफ दर्ज FIR पर रोक

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने ED अधिकारियों के खिलाफ दर्ज FIR और अगली सुनवाई तक ED अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई पर रोक लगा दी है।

मामले की अगली सुनवाई तीन फरवरी को होगी। सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार और पुलिस को सभी सीसीटीवी फुटेज समेत अन्य डिवाइसेज और दस्तावेज सुरक्षित रखने का आदेश दिया है।

इस सुनवाई के दौरान ईडी की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता और बंगाल सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल के बीच तीखी बहस हुई। एसजी ने ममता बनर्जी पर फाइलें चोरी करने का आरोप लगाया तो सिब्बल ने सवाल किया कि चुनाव से पहले ईडी I-PAC क्यों गई?

'भीड़ ऐसे बुला ली गई थी, जैसे कोई प्रदर्शन स्थल जंतर-मंतर हो'

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ ने कहा है कि वह इस मामले में नोटिस जारी कर तथ्यों की जांच करेगी। कोर्ट ने कोलकाता हाईकोर्ट में ईडी की याचिका की सुनवाई के दौरान हुई अव्यवस्था पर भी गंभीर चिंता जताई। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने कहा कि एजेंसी 14 जनवरी को हाईकोर्ट में हुई सुनवाई से संतुष्ट नहीं है। उन्होंने बताया कि सुनवाई के दौरान ईडी को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा। ईडी ने आरोप लगाया कि कोर्ट रूम में बार-बार माइक बंद हो रहा था, जिससे पक्ष रखने में दिक्कत आई। इसके अलावा, सुनवाई के दौरान भीड़ जुटाने के लिए बसों और गाड़ियों की व्यवस्था की गई थी।

ईडी के अनुसार, हालात ऐसे हो गए थे कि कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश को आदेश देना पड़ा कि वकीलों के अलावा किसी अन्य को कोर्ट में प्रवेश न दिया जाए। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि भीड़ ऐसे बुला ली गई थी, जैसे कोई प्रदर्शन स्थल जंतर-मंतर हो। कोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम को गंभीर बताते हुए मामले की जांच का संकेत दिया।

उपस्थित अधिकारियों को निलंबित किया जाए

ईडी ने कोर्ट में आरोप लगाया कि रेड के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मौके पर पहुंचीं और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों व अहम दस्तावेजों को जबरन अपने साथ ले गईं। ईडी की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस. वी. राजू ने जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और विपुल पंचोली की पीठ को बताया कि कहा कि मुख्यमंत्री के साथ बंगाल के डीजीपी और बड़ी पुलिस टीम भी मौजूद थी। ईडी का दावा है कि पुलिस ने एजेंसी के अधिकारियों के मोबाइल फोन तक छीन लिए, जिससे जांच में बाधा आई और एजेंसी का मनोबल गिरा।

सॉलिसिटर जनरल ने इस तरह के हस्तक्षेप से केवल ऐसी घटनाओं को बढ़ावा मिलेगा और केंद्रीय बलों का मनोबल टूटेगा। उन्होंने चेतावनी दी कि राज्य सरकारों को लगेगा कि वे हस्तक्षेप कर सकती हैं, अनियमितताएं कर सकती हैं और फिर धरने पर बैठ सकती हैं। साथ ही कोर्ट से अपील की कि स्पष्ट रूप से उपस्थित अधिकारियों को निलंबित किया जाए ताकि उदाहरण स्थापित हो। उन्होंने कहा कि आई-पैक कार्यालय में आपत्तिजनक सामग्री मिलने के सबूत मौजूद थे। साथ ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया कि प्रत्यक्ष अधिकार रखने वाले अधिकारियों को कार्रवाई के लिए निर्देशित किया जाए और जो कुछ हो रहा है उसका संज्ञान लिया जाए।

सुप्रीम कोर्ट जारी करेगी नोटिस?

वहीं, पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने ईडी के आरोपों को गलत बताया। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री केवल प्रतीक जैन का लैपटॉप और उनका निजी आईफोन लेकर गई थीं, क्योंकि उसमें चुनाव से जुड़ा संवेदनशील डेटा था। सिब्बल ने कहा कि मुख्यमंत्री ने रेड में कोई रुकावट नहीं डाली। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार का यह दावा सही नहीं लगता। कोर्ट ने टिप्पणी की कि अगर ईडी दस्तावेज जब्त करना चाहती, तो वह ऐसा कर सकती थी। कोर्ट ने साफ कहा हमें इस मामले की जांच करनी होगी। सरकार हमें नोटिस जारी करने से नहीं रोक सकती।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने ईडी से पूछा कि वह वहां किस जांच के सिलसिले में गई थी। इस पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि ईडी अवैध कोयला घोटाले की जांच कर रही थी, न कि किसी चुनावी डेटा को जब्त करने। उन्होंने बताया कि जांच में हवाला चैनल और करीब 20 करोड़ रुपये की नकद लेन-देन के सबूत मिले हैं, जिसके चलते 8 जनवरी को I-PAC से जुड़े 10 ठिकानों पर तलाशी ली गई।

चुनाव के समय अचानक रेड क्यों- कपिल सिब्बल

कपिल सिब्बल ने सवाल उठाया कि अगर कोयला घोटाले की जांच पहले से चल रही थी, तो चुनाव के समय अचानक रेड क्यों की गई। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल में चुनाव I-PAC नहीं, बल्कि चुनाव आयोग कराता है। ईडी का आरोप है कि रेड के दौरान सबूतों से छेड़छाड़ की गई, अहम दस्तावेज छीने गए और अधिकारियों को धमकाया गया। इसी आधार पर ईडी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और दस्तावेजों को जब्त कर सील करने की मांग की है।

याचिका में लगाए गए आरोप गलत- अभिषेक सिंघवी

राज्य सरकार और डीजीपी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट में ईडी की याचिका की सुनवाई योग्य होने पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि यदि कोर्ट नोटिस जारी करता भी है, तो यह साफ किया जाए कि यह उनकी आपत्ति के अधीन होगा। सिंघवी ने दलील दी कि ईडी का सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुंचना केवल असाधारण परिस्थितियों में ही सही ठहराया जा सकता है, जब कोई और प्रभावी कानूनी उपाय उपलब्ध न हो। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि ईडी फोरम शॉपिंग कर रही है, क्योंकि इसी तरह की राहत पहले ही हाईकोर्ट से मांगी जा चुकी है।

वरिष्ठ वकील ने कहा कि ईडी की याचिका में लगाए गए आरोप और पंचनामा एक-दूसरे से मेल नहीं खाते। उनके मुताबिक, या तो याचिका में लगाए गए आरोप गलत हैं या फिर पंचनामा ही गलत है, दोनों बातें एक साथ सही नहीं हो सकतीं। उन्होंने यह भी कहा कि जांच में रुकावट और तलाशी न हो पाने के दावे पंचनामा के सामने टिकते नहीं हैं।

सॉलिसिटर जनरल के इस बयान पर कि राज्य सरकार को जानकारी दी गई थी, सिंघवी ने कहा कि राज्य को केवल सुबह करीब 11:30 बजे एक सामान्य ईमेल मिला, जबकि तलाशी सुबह 6:45 बजे ही शुरू हो चुकी थी। अंत में सिंघवी ने ईडी से अनुरोध किया कि वह स्पष्ट निर्देशों को रिकॉर्ड पर रखे। उन्होंने आरोप लगाया कि यह पूरी कवायद सिर्फ रिकॉर्ड तैयार करने और अपनी कार्रवाई को सही ठहराने की कोशिश है।

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