नई दिल्ली: भारत के राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर देश में एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। गीत के कितने छंद सार्वजनिक कार्यक्रमों में गाए जाने चाहिए, इसे लेकर कांग्रेस और बीजेपी के बीच मतभेद सामने आ रहे हैं। इसी बहस के बीच दिग्गज अभिनेत्री शर्मिला टैगोर ने वंदे मातरम् को लेकर अपनी राय रखी है। उनका कहना है कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में सभी धर्मों और समुदायों की भावनाओं को ध्यान में रखना जरूरी है। उनके मुताबिक गीत के शुरुआती दो छंद ऐसे हैं, जिन्हें व्यापक रूप से स्वीकार किया जा सकता है।
शर्मिला टैगोर ने क्या कहा?
एक न्यूज एजेंसी को दिए इंटरव्यू में शर्मिला टैगोर ने कहा कि भारत में अलग-अलग धर्मों और धार्मिक मान्यताओं को मानने वाले लोग रहते हैं। उन्होंने वंदे मातरम् के बाद के छंदों में देवी-देवताओं के उल्लेख का जिक्र करते हुए कहा कि एकेश्वरवाद में विश्वास रखने वाले लोगों के लिए ऐसे शब्दों को स्वीकार करना सहज नहीं हो सकता। अभिनेत्री के मुताबिक, यदि देश के अलग-अलग धार्मिक समुदायों को साथ लेकर चलना है तो वंदे मातरम् के पहले दो छंद उपयुक्त विकल्प हैं। उन्होंने इसे विविधता और धार्मिक संवेदनशीलता के संदर्भ में देखने की बात कही।
कंगना रनौत ने किया पलटवार
शर्मिला टैगोर के इंटरव्यू का वीडियो अभिनेत्री और बीजेपी सांसद कंगना रनौत ने इंस्टाग्राम स्टोरी पर साझा किया। इसके साथ उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया भी लिखी। कंगना ने कहा कि वह शर्मिला टैगोर के अपनी आपत्ति जाहिर करने के अधिकार की सराहना करती हैं, लेकिन एक कलाकार के तौर पर उन्हें उनकी कला और कविता की व्याख्या कुछ सीमित लगी। कंगना ने तर्क दिया कि कविता और कला में शब्दों का इस्तेमाल कई बार रूपक और प्रतीकों के तौर पर किया जाता है। उनके अनुसार, किसी रचना में देवी या शक्ति का उल्लेख केवल धार्मिक कर्मकांड के अर्थ में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने वंदे मातरम् को स्वतंत्रता आंदोलन की भावना से जोड़ते हुए कहा कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की रचना का उद्देश्य देशवासियों के भीतर शक्ति और आत्मविश्वास की भावना जगाना था। कंगना ने अपने संदेश में हिंदू-मुस्लिम विभाजन की सोच से आगे बढ़कर एक-दूसरे को अपनाने की अपील भी की।
वंदे मातरम् पर कांग्रेस-बीजेपी में मतभेद
वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस और बीजेपी के बीच राजनीतिक बहस भी तेज है। कांग्रेस की ओर से यह रुख सामने आया है कि सार्वजनिक तौर पर गीत के शुरुआती दो छंदों को गाया जाना पर्याप्त है। वहीं बीजेपी का कहना है कि वंदे मातरम् को पूरा न गाना उसके ऐतिहासिक और राष्ट्रीय महत्व को कम करना है। बीजेपी की दलील है कि वंदे मातरम् भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से गहराई से जुड़ा रहा है और इसे केवल धार्मिक संदर्भ में देखना उचित नहीं है। दूसरी ओर, कांग्रेस और उसके समर्थक इस मुद्दे को देश की धार्मिक विविधता और सभी समुदायों की संवेदनशीलता से जोड़कर देख रहे हैं।
क्या है वंदे मातरम् का ऐतिहासिक महत्व?
वंदे मातरम् की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। यह गीत भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रवादी चेतना का महत्वपूर्ण प्रतीक बना। बाद में इसके शुरुआती दो छंदों को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया गया। यही वजह है कि गीत के धार्मिक और राष्ट्रवादी अर्थों को लेकर समय-समय पर बहस होती रही है। एक पक्ष इसे मातृभूमि के प्रति सम्मान और राष्ट्रभक्ति की अभिव्यक्ति मानता है, जबकि दूसरा पक्ष इसके कुछ धार्मिक प्रतीकों को लेकर सवाल उठाता है।
मुकेश खन्ना ने भी उठाया था सवाल
इस विवाद के बीच अभिनेता मुकेश खन्ना का बयान भी चर्चा में रहा। उन्होंने मौजूदा राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ की जगह ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान बनाने की मांग की थी। खन्ना ने ‘जन गण मन’ की रचना और उसके ऐतिहासिक संदर्भ को लेकर भी दावा किया था। हालांकि, ‘जन गण मन’ और ‘वंदे मातरम्’ दोनों का भारत के राष्ट्रीय इतिहास में अपना अलग स्थान और संवैधानिक महत्व है। ऐसे में इन दोनों को लेकर सार्वजनिक बहस एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का हिस्सा बन गई है।