जलावन के लिए हर साल काट दिये जाते हैं साढ़े आठ करोड़ टन जंगल

जलावन के लिए जंगलों पर निर्भरता में महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान और मध्य प्रदेश सबसे आगे हैं।

Update: 2020-01-07 11:50 GMT

नयी दिल्ली । उज्ज्वला योजना के तहत सरकार द्वारा साढ़े तीन साल में आठ करोड़ से ज्यादा रसोई गैस कनेक्शन दिये जाने के बावजूद घोषित वन क्षेत्रों के आसपास रहने वाले लोग जलावन के लिए हर साल आठ करोड़ 50 लाख टन से ज्यादा लकड़ी का इस्तेमाल करते हैं।

भारतीय वन सर्वेक्षण की हाल ही में जारी रिपोर्ट में यह बात कही गयी है। घोषित वन क्षेत्र के पाँच किलोमीटर के दायरे में बसे गाँवों में सर्वेक्षण के आधार पर तैयार इस रिपोर्ट के अनुसार, जंगल से प्राप्त आठ करोड़ 52 लाख 90 हजार टन लकड़ी हर साल आसपास के गाँव वालों का जलावन बन जाती है। जलावन के लिए जंगलों पर निर्भरता में महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान और मध्य प्रदेश सबसे आगे हैं। शीर्ष 10 में इनके बाद क्रमश: झारखंड, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, गुजरात, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ का स्थान है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि जंगलों से प्राप्त लकड़ी के प्रति व्यक्ति इस्तेमाल पर्वतीय राज्य आगे हैं। इसमें नगालैंड पहले, हिमाचल प्रदेश दूसरे, त्रिपुरा तीसरे और उत्तराखंड चौथे स्थान पर है। इनके बाद सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, ओडिशा, केरल, मिजोरम और झारखंड का स्थान है।

महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 95,39,130 टन, ओडिशा में 91,85,830 टन और राजस्थान में 85,59,580 टन लकड़ी इन गाँवों के लोगों हर साल जलावन के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। मध्य प्रदेश में यह आँकड़ा 76,63,130 टन, झारखंड में 73,72,340 टन, कर्नाटक में 63,23,070 टन, उत्तर प्रदेश में 51,40,780 टन, गुजरात में 49,83,290 टन, उत्तराखंड में 40,75,980 टन और छत्तीसगढ़ में 36,08,450 टन है।

नगालैंड में प्रति व्यक्ति 830 किलोग्राम, हिमाचल प्रदेश में 759 किलोग्राम, त्रिपुरा में 714 किलोग्राम, उत्तराखंड में 659 किलोग्राम और सिक्किम में 588 किलोग्राम लकड़ी का हर साल जलावन के रूप में इस्तेमाल हो रहा है। अरुणाचल प्रदेश में यह आँकड़ा 502 किलोग्राम, ओडिशा में 468 किलोग्राम, केरल में 465 किलोग्राम, मिजोरम में 461 किलोग्राम और झारखंड में 391 किलोग्राम है।
 

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