ईरान जंग ने तोड़ा नाटो और अमेरिका का रिश्ता

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारतीय समयानुसार 2 अप्रैल की सुबह ईरान पर छिड़ी जंग को खत्म करने का ऐलान कर सकते हैं

By :  Deshbandhu
Update: 2026-04-01 22:05 GMT

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारतीय समयानुसार 2 अप्रैल की सुबह ईरान पर छिड़ी जंग को खत्म करने का ऐलान कर सकते हैं। हालांकि ट्रंप ने पिछले 32-33 दिनों में न जाने कितनी बार यह कहा है कि युद्ध कभी भी खत्म हो सकता है और हमने अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया है। दरअसल ट्रंप ईरान में शासन बदलने की बात करते हैं और हाल में उन्होंने बयान दिया है कि ईरान का शासन बदला जा चुका है। अब वहां जो लोग सत्ता में हैं, वो हमारी बात सुन रहे हैं। जबकि ईरान लगातार अमेरिका के दावों को नकार रहा है और उसके पलटवार जारी हैं। इसलिए ट्रंप की बातों पर कितना यकीन किया जाए, यह कहा नहीं जा सकता। अब कल पता चलेगा कि इस जंग को जारी रखने या रोकने को लेकर वे क्या बयान देते हैं। इस बीच ट्रंप के युद्ध रोकने के संकेत देखकर शेयर बाजार में जरूर बढ़त देखी गई। जिससे समझ आता है कि यह सारा खेल असल में चंद व्यापारियों को मुनाफा कमाने का अवसर देने का ही है। बाकी जिन भी कारणों से युद्ध छेड़ा गया, वो सब बहाने से ज्यादा कुछ नहीं थे।

बहरहाल, अब युद्ध खत्म होने की बात जब होने लगी है, तो यह देखना दिलचस्प है कि इसमें अपनी जीत के दावे के बावजूद अमेरिका यह नहीं बता पा रहा है कि उसने ईरान को कैसे हराया है। क्योंकि ईरान की हार के कोई लक्षण अब तक तो नहीं दिखे। दूसरी तरफ अमेरिका जरूर अकेला पड़ता हुआ दिख रहा है। इस युद्ध के बाद वैश्विक व्यवस्था बदलने के जो आसार दिख रहे हैं, उसमें सबसे अहम बदलाव यही है कि अमेरिका और नाटो देशों के बीच बड़ी दरार कायम हो चुकी है। पाठक जानते हैं कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद सोवियत संघ के बढ़ते प्रभाव को रोकने और साम्यवाद के बरक्स पूंजीवादी व्यवस्था को बढ़ाने के लिए 4 अप्रैल 1949 को उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन यानी (एनएटीओ- नाटो) की स्थापना हुई। इसमें अमेरिका के साथ कई यूरोपीय देश शामिल हुए। नाटो के अनुच्छेद 5 में कहा गया है कि यदि किसी एक सदस्य देश पर सशस्त्र हमला होता है, तो उसे सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा और अन्य सदस्य सहायता करेंगे। इसी आधार पर ट्रंप ने यह मान रखा था कि जब ईरान पर हमले में साथ देने की बारी आएगी तो नाटो सहयोगी उसमें कोई आनाकानी नहीं करेंगे। लेकिन ट्रंप यह भूल गए कि अमेरिका पर हमला नहीं हुआ है, बल्कि अमेरिका ने हमला किया है। एक अवांछित लड़ाई ट्रंप ने शुरु की और चाहते हैं कि यूरोप के नाटो देश उसमें साथ दें। लेकिन इटली, जर्मनी, ब्रिटेन, स्पेन जैसे देशों ने जब अमेरिका को दो टूक मना कर दिया कि वो इस लड़ाई का हिस्सा नहीं बनना चाहते तो अब अमेरिका नाटो की अनुपयोगिता साबित करने में लगा है।

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने साफ कर दिया है कि ईरान जंग के बाद नाटो देशों से हिसाब चुकता किया जाएगा। मार्को रुबियो ने कहा- हमें अपने देश के लिए उस गठबंधन में नाटो की अहमियत की दोबारा जांच करनी होगी। रुबियो ने इस बात पर जोर दिया कि अमेरिका अपने नाटो सहयोगियों से ईरान के खिलाफ हवाई हमले करने की मांग नहीं कर रहा है। उन्होंने सवाल उठाया- जब हमें सिर्फ उनके सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल करने की अनुमति चाहिए होती है और उनका जवाब 'नहीं' होता है? तो फिर सवाल उठता है कि आखिर हम नाटो में क्यों हैं? हमें यह सवाल पूछना ही होगा।

हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस विषय पर अंतिम फैसला राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का ही होगा। वैसे ट्रंप पहले से ही नाटो पर भड़के हुए हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग को खोलने के लिए ट्रंप ने नाटो सहयोगियों से अपील की कि वे मदद करें। तो कई देशों ने मना कर दिया। इस पर नाराज ट्रंप ने नाटो देशों को कागजी शेर तक बता दिया और कहा कि अमेरिका सदैव उनकी रक्षा करता है, लेकिन वे अमेरिका के लिए कुछ नहीं करते। हाल ही में ट्रंप ने कहा था कि अगर नाटो सहयोगी मदद नहीं करेंगे तो नाटो का बहुत बुरा भविष्य होगा।

बता दें कि नाटो के सभी सदस्यों का संयुक्त सैन्य खर्च दुनिया के रक्षा व्यय का 70प्रतिशत से अधिक है, जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका अकेले दुनिया का कुल सैन्य खर्च का आधा हिस्सा खर्च करता है और ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और इटली 15प्रतिशत खर्च करते हैं। लेकिन अब ट्रंप नाटो पर किए जाने वाले खर्च से हाथ पीछे खींचने के संकेत दे रहे हैं। ट्रंप ने कहा, 'इससे अमेरिका को बहुत पैसा मिलेगा, क्योंकि हम नाटो पर हर साल सैकड़ों अरब डॉलर खर्च करते हैं।'

दूसरी तरफ, ट्रंप ने कई मध्य पूर्वी देशों के समर्थन की प्रशंसा करते हुए कहा कि वे नाटो सदस्यों की तुलना में अमेरिका के साथ अधिक मजबूती से खड़े रहे। उन्होंने कहा, 'वे नाटो से भी अधिक मजबूती से खड़े रहे,' और यह भी जोड़ा कि वाशिंगटन को 'उन देशों से जबरदस्त समर्थन मिला जो नाटो क्षेत्र में नहीं थे।'

ट्रंप की ये बयानबाजी, नाटो से नाराजगी और मध्यपूर्व के कुछ देशों की तारीफ बता रही है कि अब दुनिया में अमेरिका की वह ताकत नहीं रही जो दूसरे विश्वयुद्ध के बाद बनना शुरु हुई थी और जिसमें सोवियत संघ के विघटन के बाद बहुत इजाफा हो गया था। अब फिर से ताकत के नए केंद्र बनने लगे हैं। जिनमें रूस फिर से अपनी पुरानी जगह पर लौट रहा है, क्योंकि होर्मुज मार्ग बंद होने के बाद भारत समेत कई देश रूस से ही तेल खरीदने पर मजबूर हुए हैं और इसमें उसे लाभ मिला है। इधर चीन को भी अपनी ताकत बढ़ाने का मौका मिला है। रूस और चीन दोनों ही अपनी सामरिक और तकनीकी मदद ईरान तक पहुंचा रहे हैं। अब युद्ध खत्म होने के बाद जो भी वैश्विक समीकरण बदलेंगे, उसमें इन दोनों देशों का नजरिया मायने रखेगा और ट्रंप लाचार नजर आएंगे।

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