डोली में दुल्हन की विदाई की परंपरा का क्रेज बढा
पिछले कुछ दशकों के दरम्यान इतिहास के पन्नो में सिमट चुकी डोली में दुल्हन की विदाई की परंपरा के फिर से प्रचलन में आने लगी
लखनऊ । पिछले कुछ दशकों के दरम्यान इतिहास के पन्नो में सिमट चुकी डोली में दुल्हन की विदाई की परंपरा के फिर से प्रचलन में आने लगी है।
सदियों तक शादी ब्याह के मौको पर बेटी की विदाई का एकमात्र जरिया डोली फटाफट जिंदगी के इस दौर में विलुप्त प्राय: हो चुकी थी हालांकि पिछले कुछ सालों से डोली का क्रेज बढा है। धनाड्य वर्ग ने डोली की परंपरा को स्टेटस सिंबल के तौर पर अपनाया है जिसका अनुसरण अब मध्यम वर्ग भी धीरे धीरे करने लगा है।
डोली के बढते प्रचलन ने इस पेशे से जुड़े कहारों की उम्मीदों को हवा दे दी है। करीब चार दशक पहले तक शादियों में डोली कहार का अपना एक अलग महत्त्व होता था| ग्रामीण क्षेत्रों में डोली को म्याना, पीनस,पालकी आदि कई नामों से जाना जाता था| कोई भी बारात जाती थी तो दूल्हे को डोली में बिठाकर चार-पांच कश्यप या निषाद बिरादरी के लोग उठाकर ले जाते थे और जब बारात की विदाई होती थी तो उधर से दुल्हन को डोली में लेकर वर पक्ष के दरवाज़े पर आते थे| इस एवज में कहारों को तयशुदा पारिश्रमिक एवं इनाम-इकराम मिलता था|
लखनऊ के जानेमाने कारोबारी दीपक मल्होत्रा ने कहा कि डोली की बात ही निराली है। महंगी लग्जरी कारों की बजाय डोली में दुल्हन की विदाई न सिर्फ अपनी संस्कृति को जीवंत रखने का एक साधन है बल्कि आकर्षक ढंग से सजी डोली किसी का भी मन मोह लेती है।
मल्होत्रा ने कहा कि हाल ही में उन्होेने अपनी बेटी की विदाई डोली में की। यह परिवार का एक सामूहिक फैसला था जिसे ब्याह में आये मेहमानों ने भी खूब सराहा।