सिर्फ महिला पत्रकारों की संस्था 'खबर लहरिया' पर फिल्म ऑस्कर के लिए मनोनीत

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Update: 2022-02-09 13:45 GMT

'राइटिंग विद फायर' नाम की इस डॉक्यूमेंट्री को रिंटू थॉमस और सुष्मित घोष ने बनाया है. इसे 'सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री फीचर' के ऑस्कर पुरस्कार के लिए मनोनीत किया गया है. फिल्म में 'खबर लहरिया' की टीम के अखबार से डिजिटल मीडिया बनने के सफर को दिखाया गया है. यह ऑस्कर के लिए मनोनीत होने वाली पहली भारतीय फीचर डॉक्यूमेंट्री है.

'खबर लहरिया' उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश दोनों राज्यों में फैले बुंदेलखंड इलाके में ग्रामीण मुद्दों पर ध्यान केंद्रित रखने वाला एक मीडिया संगठन है जिसमें सिर्फ महिलाएं काम करती हैं. इसमें पत्रकारों की एक टीम है जिसके सदस्य ग्रामीण इलाकों की महिलाओं को पत्रकारिता का प्रशिक्षण भी देते हैं.

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2002 में हुई शुरुआत

यही महिलाएं फिर अपने और अपने समाज की कहानियां बयां करती हैं. इस तरह स्थानीय भाषाओं में स्थानीय मुद्दों पर रिपोर्टिंग करने के लिए स्थानीय महिलाओं को ही पत्रकारिता का प्रशिक्षण दे कर एक संस्था चलाने के इस मॉडल को 2009 में संयुक्त राष्ट्र का यूनेस्को किंग सेजोंग पुरस्कार दिया गया था.

'खबर लहरिया' की शुरुआत 2002 में एक अखबार के रूप में हुई थी. 2013 में इसकी वेबसाइट शुरू की गई, 2015 में यूट्यूब चैनल और फिर 2019 में सब्सक्रिप्शन आधारित सेवाएं. संस्था का दावा है कि इसकी डिजिटल सेवाएं हर महीने करीब एक करोड़ लोगों तक पहुंचती हैं.

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संस्था की वेबसाइट के मुताबिक "खबर लहरिया खासतौर पर सरकार की ग्रामीण विकास और सशक्तिकरण के लिए बनाई गई योजनाओं के दावों और उनकी हकीकत के बीच के अंतर को उजागर करता है." कुछ मीडिया रिपोर्टों में यह भी बताया जा रहा है कि यह दलित महिलाओं का संगठन है. हालांकि खुद 'खबर लहरिया' की वेबसाइट पर ऐसा दावा नहीं किया गया है.

पुरस्कृत फिल्मकार

'राइटिंग विद फायर' डॉक्यूमेंट्री को बनने में पांच साल लगे. इसे पहली बार 2021 में अमेरिका के प्रतिष्ठित सनडांस फिल्म फेस्टिवल में दिखाया गया था. यह सुष्मित की पहली डॉक्यूमेंट्री फीचर फिल्म है.

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रिंटू भी सुष्मित की ही तरह फिल्में बनाती हैं.उन्होंने ट्विटर पर एक वीडियो साझा किया है जिसमे ऑस्कर के लिए मनोनीत होने की घोषणा पर उनकी पहली प्रतिक्रिया स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है.

रिंटू और सुष्मित ने साथ मिल कर 2009 में ब्लैक टिकट फिल्म्स नाम की कंपनी की शुरुआत की थी जिसके बैनर तले उन्होंने 'मिरेकल वॉटर विलेज', 'दिल्ली' और 'टिम्बकटू' जैसी लघु फिल्में बनाईं. 'टिम्बकटू' आंध्र प्रदेश में ऑर्गेनिक खेती पर काम कर रहे लोगों की कहानी है. इसे 2012 में सर्वश्रेष्ठ पर्यावरण फिल्म का राष्ट्रीय परस्कार दिया गया था.

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