आज नाटकों और रंगमंच में कम होता जा रहा है शोध का रुझान : प्रो. स्वाति पाल

इस संगोष्ठी में देश के विविध महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों के लगभग 200 अध्यापकों शोधार्थियों एवं प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं के साथ हुआ। स्वागत भाषण में संगोष्ठी की संयोजिका प्रो.संध्या गर्ग ने भारतीय ज्ञान परंपरा की समृद्धि, उसकी समकालीन प्रासंगिकता तथा शोध की नई दिशाओं पर प्रकाश डाला ।

Update: 2026-04-03 12:18 GMT

नई दिल्ली: दिल्ली विश्वविद्यालय के जानकी देवी मेमोरियल महाविद्यालय में “भारतीय ज्ञान परंपरा: शोध संभावनाएं” विषय पर एक भव्य अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह आयोजन महाविद्यालय की भारतीय भाषा समिति एवं ज्ञान मंजूषा (हिंदी विभाग) द्वारा आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ (IQAC) के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हुआ। इस संगोष्ठी में देश-विदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों से आए लगभग 200 शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यक्रम ने भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध आयामों पर गंभीर अकादमिक विमर्श का मंच प्रदान किया।




 


दीप प्रज्वलन के साथ हुआ शुभारंभ

संगोष्ठी का शुभारंभ पारंपरिक दीप प्रज्वलन के साथ हुआ, जिसने भारतीय सांस्कृतिक विरासत की गरिमा को दर्शाया। स्वागत भाषण में संगोष्ठी की संयोजिका प्रो. संध्या गर्ग ने भारतीय ज्ञान परंपरा की समृद्धि और उसकी समकालीन प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली केवल ऐतिहासिक धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के शोध के लिए भी महत्वपूर्ण आधार प्रस्तुत करती है। साथ ही उन्होंने शोध के क्षेत्र में नई संभावनाओं को तलाशने की आवश्यकता पर बल दिया।





 


आधुनिक संदर्भों में ज्ञान परंपरा की उपयोगिता

संगोष्ठी के प्रथम सत्र की अध्यक्षता दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की प्रो. सुधा सिंह ने की। अपने अध्यक्षीय संबोधन में उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक संदर्भों में पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारतीय चिंतन की उपयोगिता को नए दृष्टिकोण से समझना समय की मांग है। इस सत्र में कई प्रतिष्ठित विद्वानों ने मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार प्रस्तुत किए। इनमें पेंसिल्वेनिया से प्रो. सुरेंद्र गंभीर, जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के अध्यक्ष प्रो. जय प्रकाश नारायण, वेंकटेश्वर महाविद्यालय से सेवानिवृत्त प्रो. पुनीता शर्मा और केंद्रीय हिंदी संस्थान के पूर्व निदेशक प्रो. अनिल शर्मा जोशी शामिल रहे। इन विद्वानों ने अपने व्याख्यानों में भारतीय ज्ञान परंपरा के दार्शनिक, सांस्कृतिक और भाषिक आयामों पर गहन चर्चा की। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय चिंतन परंपरा केवल अतीत तक सीमित नहीं है, बल्कि वर्तमान और भविष्य के शोध के लिए भी यह एक सशक्त आधार प्रदान करती है।

शोधार्थियों और विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी

संगोष्ठी के द्वितीय सत्र में प्राध्यापकों, शोधार्थियों और चतुर्थ वर्ष के विद्यार्थियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। इस दौरान भारतीय साहित्य, संस्कृति, दर्शन और सामाजिक मूल्यों से जुड़े विविध विषयों पर विचार प्रस्तुत किए गए। प्रतिभागियों के शोध पत्रों में मौलिकता, विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण और समकालीन संदर्भों की स्पष्ट झलक देखने को मिली। विशेष रूप से विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी ने कार्यक्रम को जीवंत और सार्थक बना दिया। उनके शोध प्रस्तुतिकरणों ने यह संकेत दिया कि नई पीढ़ी भारतीय ज्ञान परंपरा को नए दृष्टिकोण से समझने और आगे बढ़ाने के लिए तैयार है।

समापन सत्र: व्यापक महत्व पर जोर

संगोष्ठी के समापन सत्र की अध्यक्षता प्रो. पूरनचंद टंडन ने की। उन्होंने अपने संबोधन में पूरे आयोजन की सराहना करते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा के व्यापक महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि इस तरह के अकादमिक आयोजन न केवल शोध को प्रोत्साहित करते हैं, बल्कि ज्ञान के आदान-प्रदान के लिए भी महत्वपूर्ण मंच प्रदान करते हैं। कार्यक्रम के अंत में महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. स्वाति पाल ने अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने इस विषय की वर्तमान समय में प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए सभी प्रतिभागियों को शुभकामनाएं दीं।

शोध के बदलते रुझानों पर चिंता

प्रो. स्वाति पाल ने अपने संबोधन में एक महत्वपूर्ण चिंता भी व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आज शोध के क्षेत्र में नाटकों और रंगमंच जैसे विषयों के प्रति शोधकर्ताओं का रुझान कम होता जा रहा है। उन्होंने इस प्रवृत्ति को संतुलित करने और इन विषयों पर भी गंभीर शोध को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता बताई।

सफल मंच साबित हुई संगोष्ठी

समग्र रूप से यह अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न आयामों को समझने और शोध की नई संभावनाओं को तलाशने में अत्यंत सफल रही। विद्वानों के सारगर्भित व्याख्यान और विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी ने इसे एक यादगार और ज्ञानवर्धक अकादमिक आयोजन बना दिया। इस आयोजन ने यह स्पष्ट किया कि भारतीय ज्ञान परंपरा आज भी प्रासंगिक है और वैश्विक स्तर पर शोध एवं चिंतन के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करती है।

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