जमीयत ने 'डेमोग्राफिक जिहाद' के नैरेटिव को बताया भ्रामक, सरकार पर उठाए सवाल

जमीयत उलेमा-ए-हिंद की दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में देशभर से आए 3,000 से अधिक उलमा ने भाग लिया। 30 और 31 अक्टूबर को हरियाणा के नूंह, मेवात में आयोजित बैठक में देश के मौजूदा हालात, संवैधानिक अधिकारों, धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया।;

Update: 2026-11-01 18:47 GMT

नई दिल्‍ली। जमीयत उलेमा-ए-हिंद की दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में देशभर से आए 3,000 से अधिक उलमा ने भाग लिया। 30 और 31 अक्टूबर को हरियाणा के नूंह, मेवात में आयोजित बैठक में देश के मौजूदा हालात, संवैधानिक अधिकारों, धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी ने बैठक को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर सीधा निशाना साधते हुए अवैध घुसपैठ के मुद्दे पर सरकार की जवाबदेही पर सवाल उठाए। उन्होंने सवाल उठाया कि अवैध घुसपैठ रोकने की जिम्मेदारी जिस मंत्रालय की है, उसकी जवाबदेही तय करने के बजाय मुसलमानों को राजनीतिक रूप से निशाना क्यों बनाया जा रहा है।

कार्यकारिणी ने भारत में जनसंख्या और जनसांख्यिकीय बदलावों को लेकर फैलाए जा रहे भ्रामक नैरेटिव, विशेष रूप से 'डेमोग्राफिक जिहाद' के आरोपों के विरुद्ध प्रस्ताव पारित किया। प्रस्ताव में इस दावे को सिरे से खारिज किया गया कि मुसलमान जनसंख्या वृद्धि या अवैध घुसपैठ के माध्यम से देश का जनसांख्यिकीय संतुलन बदलने की कोशिश कर रहे हैं।

जनगणना के आंकड़ों, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) और अन्य वैज्ञानिक साक्ष्यों का हवाला देते हुए प्रस्ताव में कहा गया कि 1981-1991 के दौरान मुस्लिम आबादी की दशकीय वृद्धि दर 32.9 प्रतिशत थी, जो 2001-2011 के दौरान घटकर 24.7 प्रतिशत रह गई। प्रस्ताव के अनुसार जनसंख्या में होने वाले बदलावों का विश्लेषण सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक परिस्थितियों के संदर्भ में किया जाना चाहिए, न कि उन्हें अवैध घुसपैठ से जोड़कर सांप्रदायिक सुरक्षा का मुद्दा बनाया जाना चाहिए।

कार्यकारिणी ने गृह मंत्रालय द्वारा 26 मई 2026 को गठित उच्चस्तरीय जनसांख्यिकी समिति की संरचना और उसके गठन के पीछे मौजूद धारणाओं पर भी गंभीर सवाल उठाए। प्रस्ताव में कहा गया कि समिति में एक भी विशेषज्ञ जनसांख्यिकीविद् शामिल नहीं है और इसका गठन इस पूर्वधारणा के आधार पर किया गया है कि जनसांख्यिकीय बदलावों का प्रमुख कारण अवैध घुसपैठ है।

कार्यकारिणी ने इस दृष्टिकोण को पक्षपातपूर्ण और अवैज्ञानिक बताते हुए मांग की कि सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित विशेषज्ञों को शामिल करके एक स्वतंत्र और निष्पक्ष आयोग गठित करे, जो प्रवासन, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों सहित जनसांख्यिकीय बदलावों के सभी पहलुओं का वैज्ञानिक अध्ययन करे।

कार्यकारिणी ने गुजरात, उत्तराखंड, असम और अन्य राज्यों में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू किए जाने के विरुद्ध भी प्रस्ताव पारित किया। जमीयत ने इसे मुसलमानों की धार्मिक स्वतंत्रता, पारिवारिक मामलों में स्वायत्तता और संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के लिए गंभीर चुनौती बताया।

प्रस्ताव में कहा गया कि विरासत, विवाह और तलाक से संबंधित इस्लामी सिद्धांत पवित्र कुरआन और हदीस में स्पष्ट रूप से निर्धारित हैं। ये दैवीय निर्देश हैं, जिनका पालन प्रत्येक मुसलमान के लिए धार्मिक दायित्व है। जमीयत के अनुसार यूसीसी के माध्यम से इन धार्मिक सिद्धांतों में हस्तक्षेप शरीयत के मामलों में सीधा दखल है, जिसे मुसलमान स्वीकार नहीं कर सकते।

कार्यकारिणी ने यूसीसी के प्रावधानों में भेदभाव का आरोप लगाते हुए कहा कि उत्तराखंड और गुजरात में अनुसूचित जनजातियों (एसटी) को उनके रीति-रिवाजों और परंपराओं की रक्षा के नाम पर कानून के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा गया है, जबकि मुसलमानों को अनिवार्य रूप से इसके दायरे में लाया गया है। प्रस्ताव के अनुसार यह दोहरा रवैया गंभीर संवैधानिक प्रश्न खड़े करता है और अल्पसंख्यकों को उनकी धार्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान से अलग करने की आशंका पैदा करता है।

इस मुद्दे पर कार्यकारिणी ने कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए। उसने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और अन्य मुस्लिम संगठनों के साथ-साथ सिख, ईसाई, दलित, आदिवासी तथा अन्य अल्पसंख्यक संगठनों के साथ समन्वय स्थापित कर संविधान की रक्षा के लिए व्यापक राष्ट्रीय और लोकतांत्रिक आवाज बुलंद करने का आह्वान किया।

कार्यकारिणी ने उत्तराखंड, गुजरात और असम में लागू यूसीसी कानूनों को उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने वाली कानूनी कार्रवाइयों को अधिक प्रभावी और समन्वित ढंग से आगे बढ़ाने तथा संविधान पीठ के समक्ष इनके निरस्तीकरण की मांग रखने का निर्णय भी लिया।

इसके अतिरिक्त राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केंद्रीय कानून मंत्री तथा संबंधित राज्यों के राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों को विस्तृत ज्ञापन सौंपे जाएंगे। इनमें जनजातीय समुदायों को दी गई छूट से उत्पन्न असमानता, संविधान के अनुच्छेद 14, 25 और 26 से जुड़े सवालों तथा मुस्लिम पर्सनल लॉ के धार्मिक आधार को दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ प्रस्तुत किया जाएगा।

कार्यकारिणी ने देशभर के मुसलमानों से इस्लामी शरीयत के प्रति दृढ़ प्रतिबद्धता बनाए रखने की अपील करते हुए विशेष रूप से परिवारों में महिलाओं के साथ न्याय सुनिश्चित करने पर जोर दिया। प्रस्ताव में कहा गया कि तलाक, भरण-पोषण और मेहर से संबंधित मामलों को पूरी ईमानदारी के साथ शरीयत के सिद्धांतों के अनुसार निपटाया जाना चाहिए, ताकि मुस्लिम परिवारों में न्याय और संतुलन कायम रहे तथा मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप का कोई नैतिक या कानूनी आधार न बने।

मौलाना मदनी ने बहुसंख्यक समुदाय के खतरे में होने के राजनीतिक नैरेटिव को भी चुनौती दी। उन्होंने कहा, “आजादी से पहले, जब देश औपनिवेशिक शासन के अधीन था, तब किसी ने यह दावा नहीं किया कि बहुसंख्यक समुदाय खतरे में है लेकिन आजादी और धर्मनिरपेक्ष संविधान अपनाए जाने के बाद अचानक यह अभियान शुरू हो गया कि बहुसंख्यक समुदाय खतरे में है। सच्चाई यह है कि खतरे में बहुसंख्यक समुदाय नहीं, बल्कि सत्ता और राजनीतिक पदों की भूख है।

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